गुजरात में नये राजनीतिक समीकरणों की दस्तक

गुजरात में नये राजनीतिक समीकरणों की दस्तक

अशोक उपाध्याय

गुजरात के युवा पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया है। गुजरात के विधानसभा चुनाव होने में महज छह महीने बचे हैं, ऐसे में हार्दिक पटेल के गुजरात प्रदेश के कार्यकारी अध्‍यक्ष पद से इस्‍तीफा दे देने से कांग्रेस की अंतर्कलह खुलकर सामने आ गयी है। हार्दिक पटेल ने कांग्रेस के पूर्व राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधा है और उनका नाम लिये बगैर उन पर निजी आक्षेप लगाये हैं। इसकी बड़ी वजह एक हो सकती है कि अब उन्‍हें आगे की राजनीति करने के लिये राहुल गांधी और पूरी कांग्रेस की खिलाफत करनी पड़ेगी। पार्टी छोड़ने या बदलने के बाद हर नेता को अपने पुराने सिद्धांतों के साथ समझौता करना पड़ता है, यहां तक कि उसकी तिलांजलि भी देनी पड़ती है।

पिछले कुछ महीनों से हार्दिक पटेल की कांग्रेस के गुजरात के नेताओं से खटपट चल रही थी और निमंत्रण भेजे जाने के बाद भी वह कांग्रेस के उदयपुर नव संकल्‍प शिविर में हिस्‍सा लेने नहीं गये। कुछ दिन पहले उन्‍होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों की जमकर सराहना की थी और कांग्रेस से जाते-जाते उन्‍होंने अपना मंतव्‍य यह कहकर और साफ कर दिया है कि चाहे अयोध्‍या में राम मंदिर हो, जम्‍मू-कश्‍मीर में अनुच्‍छेद 370 हटाना हो, जीएसटी लागू करना हो, भारत लंबे समय से इन मुद्दों का समाधान चाहता था लेकिन कांग्रेस ने एक अवरोधक की भूमिका निभाई है।

कांग्रेस के लिये हार्दिक पटेल का पार्टी छोड़कर जाना निश्चित तौर पर बड़ा झटका है। उनके इस्‍तीफे से गुजरात में कांग्रेस की युवा टीम बिखर गई है। हार्दिक पटेल, अल्‍पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी के साथ मिलकर कांग्रेस पिछले विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को कड़ी चुनौती देने में कामयाब रही थी और उसने भाजपा को सौ का आंकड़ा छूने से रोक दिया था। गुजरात विधानसभा की कुल 182 सीटों में भाजपा को 99 सीटें और कांग्रेस को 77 सीटें मिली थीं और सबने महसूस किया था कि कांग्रेस भाजपा को कांटे की टक्कर देने में कामयाब रही। विधानसभा चुनावों के बाद 2019 में हार्दिक पटेल कांग्रेस में शामिल हुए और उनके बढ़ते कद को ध्‍यान में रखते हुये सीधे पार्टी की प्रदेश इकाई का कार्यकारी अध्‍यक्ष नियुक्‍त कर दिया था। पाटीदार आरक्षण आंदोलन से जन्‍मे इस युवा नेता के लिये राजनीति में यह लंबी छलांग थी।

हार्दिक पटेल को एकाएक इतना बड़ा ओहदा दिये जाने से गुजरात के पुराने कांग्रेसी नेता अंदरखाने नाराज रहे और गांधी परिवार के करीबी अहमद पटेल तक इस निर्णय से खुश नहीं थे। उनके बेटे फैजल पटेल ने पिछले दिनों गांधी परिवार पर निशाना साधते हुये कहा था कि वह इंतजार करते-करते तंग आ गये हैं। लेकिन बदले हालात के बाद कांग्रेस हाईकमान से नाराज चल रहे प्रदेश के नेता अब पार्टी के नये ढांचे में अपनी जगह बनाने की कोशिश करेंगे। तमाम अवरोधों के बाद भी राहुल गांधी ने पिछले दिनों कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले आदिवासी क्षेत्र दाहोद से आदिवासी सत्‍याग्रह की शुरुआत की और जनता से वडगाम के विधायक जिग्नेश मेवाणी से प्रेरणा लेने की अपील की थी। इस दौरे में एक और चौंकाने वाली बात यह देखने को मिली थी कि राहुल गांधी ने हार्दिक पटेल को झिड़क दिया था और उनसे अकेले में बातचीत करने के आग्रह को ठुकरा दिया था। दरअसल, हार्दिक ने जिस तरह पिछले दिनों पहली बार कांग्रेस हाईकमान की आलोचना की थी उससे राहुल गांधी नाराज थे और आदिवासी सत्‍याग्रह के दौरान हुई उपेक्षा से हार्दिक पटेल भी जान गये थे कि अब उनके लिये कांग्रेस में बने रहना मुनासिब नहीं है।

हार्दिक पटेल के कांग्रेस छोड़ने से गुजरात की राजनीति में नये समीकरण बनना तय है। उनके बयानों को देखें और हाल की राजनीतिक गतिविधियों को देखें तो उनके भाजपा से नाता जोड़ने के संकेत मिलते हैं। नयी राजनीतिक उथल-पुथल के बाद कांग्रेस को फिर से गुजरात में संगठन को नया रूप देना होगा। गुजरात विधानसभा में उसके 77 विधायक हैं और उसके पास नये चुनावी गणित साधने के लिये बहुत कम समय बचा है और ऐसे में सबकी निगाहें कांग्रेस हाईकमान पर टिकी रहेंगी कि वह कितनी जल्‍दी गुजरात में पार्टी में बदलाव के काम को पूरा करती है। कांग्रेस के उदयपुर अधिवेशन ने पार्टी नेतृत्व को प्रदेश स्‍तर से जिला स्‍तर तक संगठन को मजबूत करने के लिये एक खाका तैयार करके दिया है, जिसमें चुनावी तैयारियों से लेकर संगठन में हर किसी से संवाद को सरल और सहज बनाने के उपाय सुझाये गये हैं।

गुजरात को भाजपा का गढ़ माना जाता है और केशुभाई पटेल के बाद नरेंद्र मोदी की अगुआई में इस राज्‍य में पार्टी निरंतर मजबूत होती चली गई। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद विधानसभा चुनाव के लिहाज से उसकी स्थिति कुछ कमजोर हुई और 2017 के नतीजों पर गौर करने से इसकी पुष्टि हो जाती है। एक पक्ष यह भी है कि पिछले दो लोकसभा चुनावों में भाजपा गुजरात की सारी 26 सीटें जीतने में कामयाब रही है। वहां पर नरेंद्र मोदी का करिश्‍मा बदस्‍तूर जारी है लेकिन विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी पूरी तरह सतर्क है। पिछले पांच राज्‍यों के चुनावों में मिली शानदार सफलता के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात दौरा किया और ताबड़तोड़ तीन रोड शो किये थे। अब किसी न किसी बहाने उनका अक्‍सर गुजरात जाने का कार्यक्रम बनने लगा है।

पंजाब में कांग्रेस समेत सभी दलों का सूपड़ा साफ करने से उत्‍साहित आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल गुजरात का निरंतर दौरा कर रहे हैं और वहां पर पार्टी को मजबूत करने की कवायद में लगे हैं। अरविंद केजरीवाल की लोकलुभावन योजनाओं और वादों की राजनीति का असर दिल्‍ली के बाद पंजाब के चुनावों में देखने को मिला और अब जिस तरह से घर पर राशन पहुंचाने, मुफ्त बिजली, किसानों की समस्‍याओं का हल करने, नये रोजगार के सृजन के लिये किये गये वादों को पूरा करने के लिये पंजाब में सरकारी घोषणाएं हो रही हैं, उसका एक ही मकसद है कि आम आदमी पार्टी कथनी और करनी में अंतर के आरोप को अपने सिरे नहीं मढ़ने देना चाहती है। वह दिल्‍ली और पंजाब की मिसाल देकर गुजरात के अगले चुनाव में उतरने की तैयारी में जुटी है। पंजाब की पराजय से सबक लेते हुये खासतौर से कांग्रेस को भाजपा के साथ-साथ आम आदमी पार्टी से अपने संगठन को बचाये रखने के लिये पूरा जोर लगाना होगा।

लेखक यूनीवार्ता के संपादक रहे हैं।

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