कूटनीतिक दायरे में पाकिस्तान की अचानक बढ़ी मौजूदगी भारत की स्थिति को लेकर असहज करने वाले सवाल खड़े करती है। ऐसे में हमें अपनी विदेश नीति, संबंधों और स्थिति पर आत्म-मंथन की जरूरत है। यह भी कि अदना सा देश युद्धरत अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश करके भारत से आगे कैसे निकल गया व दुनिया उसकी सुन क्यों रही है?
विदेश मंत्री एस. जयशंकर बिल्कुल सही थे जब उन्होंने गत सप्ताह की शुरुआत में पश्चिम एशिया संकट पर हुई सर्वदलीय बैठक में कहा था कि ‘भारत कोई दलाल देश नहीं है’। जयशंकर, जो खुद एक पूर्व राजनयिक हैं और शब्दों का महत्व समझते हैं, उन्होंने हिंदी शब्द ‘दलाल’ का उपयोग किया, जिसका अर्थ है बिचौलिया, जब विपक्षी नेताओं ने उनसे ईरान के खिलाफ़ अमेरिका और इस्राइल के चल रहे चार हफ़्ते लंबे युद्ध को खत्म करवाने में पाकिस्तान की भूमिका के बारे पूछा।
समझा जा सकता है कि जयशंकर गुस्से में थे। माननीय सांसद स्पष्ट पूछ रहे थे – और, इस तरह - फ़ारस की खाड़ी में जारी संघर्ष में भारत की स्थिति की पाकिस्तान से तुलना कर रहे थे। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान का सैन्य-प्रतिष्ठान, जिसकी अगुवाई डोनाल्ड ट्रंप के ‘पसंदीदा फ़ील्ड मार्शल’ आसिम मुनीर कर रहे हैं, ईरान और अमेरिका के बीच संदेशों का आदान-प्रदान कर रहा है, जिसने ट्रंप को 6 अप्रैल तक युद्ध विराम की घोषणा करने में मदद की है। पाकिस्तान ने वार्ताओं की मेज़बानी करने की पेशकश की है; तुर्कीए और मिस्र अन्य संभावित स्थल हैं।
किसी भी ढंग से देखें, पिछले 48 घंटों में पाकिस्तान वैश्विक सुर्खियों में अपनी जगह बना पाया है। हो सकता है कि आगामी हफ्तों में इसका नतीजा न निकले। क्या पता, ट्रंप अभी भी ईरान पर ज़मीनी हमले का आदेश दे दें। लेकिन सर्वदलीय बैठक में मौजूद उन सांसदों ने, जिन्हें अन्यथा मुख्यतया केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम में होने वाले आगामी चुनावों को लेकर ज्यादा चिंता है, स्पष्टतया भांप लिया कि कुछ तो गंभीर गड़बड़ है; सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उनके घरों में प्रयोग होने वाले गैस सिलेंडरों की कीमतें बढ़ गई हैं।
स्पष्टतः, जयशंकर को खफ़ा होने का हक है। पाकिस्तानी सैन्य-प्रतिष्ठान, जो दशकों से निर्दोष भारतीयों पर एक के बाद एक भयानक हमलों का सूत्रधार रहा है, मुंबई से लेकर पहलगाम तक, जिन्होंने बार-बार लोगों की जान ली है, इन जघन्य अपराधों के लिए उसकी जवाबतलबी होनी चाहिए, न कि दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति यानी अमेरिकी राष्ट्रपति उसकी तारीफ में कसीदे पढ़े। शायद यह भारत के लिए आत्म-मंथन करने का उचित अवसर है कि हम -एक प्राचीन और अद्वितीय सभ्यता के लोग—इस आधुनिक और तेज़ रफ़्तार दुनिया में आखिर किस दिशा की ओर आगे बढ़ रहे हैं। भारतीय लोग विदेश नीति के मुद्दों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते- इसी से संतुष्ट हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी जैसे विभिन्न प्रधानमंत्री हमें विदेशों के बड़े और बुरे प्रभावों से ज़्यादातर सुरक्षित रखते रहे हैं।
कुछ बातें हम जानते हैं। पहली, कि भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है, भले ही प्रति व्यक्ति आय के मामले में (लगभग 2,700-3,000 डॉलर) हम देशों की सूची में 140वें स्थान पर हैं। दूसरी, भारतीय प्रवासियों का प्रभाव तेज़ी से बढ़ रहा है, खासकर अमेरिका में। और तीसरी, विश्व मंच पर भारत का मुख्य प्रतिद्वंद्वी चीन है, न कि छोटा सा पाकिस्तान।
तब फिर, अदना सा पाकिस्तान, युद्धरत अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश करके भारत से आगे क्यों निकल गया- इससे भी अहम यह कि दुनिया उसकी सुन क्यों रही है?
चलिए, एक कदम पीछे हटें। शायद हम गलत सवाल पूछ रहे हैं। सही सवाल यह नहीं कि क्या पाकिस्तान भारत से आगे निकलने में सफल रहा- वह खेल कई तरीकों से और कई मौकों पर खेला जा सकता है- बल्कि क्या भारत अपनी उस छवि पर टिक पाया है, एक ऐसा राष्ट्र, जिसके केंद्र में एक खास नैतिकता रही है; वह जिस पर हम स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही मजबूती से टिके रहे,जो कभी-कभार व्यावहारिक कारणों से थोड़ा भटक जाने की इजाज़त देता है (मसलन, जब नेतन्याहू गाज़ा पर बमबारी करते हैं या जब व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन पर हमला करते हैं, तब चुप रहना), लेकिन फिर भी वह देश, जो किसी अनैतिक या अन्यायपूर्ण लड़ाई का समर्थन नहीं करता।
यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है-अपनी धुरी की ओर लौटने की ज़रूरत। इसलिए, भले मेज़बान बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा अमेरिका संग मिलकर ईरान को तबाह करने के मंसूबे से हवाई हमले का आदेश देने से दो दिन पूर्व मोदी इस्राइल गए थे, लेकिन सच यह कि मोदी सरकार को उसके बाद अमेरिका-इस्राइल का खुलकर पक्ष लेने वाली अपनी पूर्व स्थिति छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। भारत ने शायद ट्रंप और नेतन्याहू की तरह ही सोचा था कि ईरान धरती के सबसे ताकतवर देशों का मुकाबला नहीं कर पाएगा।(भला किसकी हिम्मत है?) यह भी कि कि किसी भी सूरत में, अमेरिका-इस्राइल-यूएई त्रिकोण में उसके बहुत बड़े हित हैं- व्यापार, प्रवासी, रक्षा-और अपना शुरुआती रुख अपनाने से कुछ ‘ब्राउनी पॉइंट्स’ (अतिरिक्त लाभ) मिल सकेंगे।
बदकिस्मती से, वैसा हुआ नहीं। एक दुर्भाग्यपूर्ण और अन्यायपूर्ण युद्ध में एक पक्ष का साथ देकर,भारत ने उस ‘मध्य मार्ग’ को तज दिया, जिसकी सीख भारत के एक सपूत गौतम बुद्ध ने सदियों पहले दी थी। राजनीतिक रूप से दक्ष प्रधानमंत्री ने अवश्य उस व्यापक बेचैनी को भांप लिया होगा जो अमेरिकी मिसाइलों द्वारा ईरानी सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की निर्मम हत्या के बाद फैली थी;या ईरान के मिनाब में एक स्कूल पर हुई बमबारी पर, जिस पर अंतत: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में चर्चा जारी है। ऐसा नहीं कि भारतीय खामेनेई की कट्टर धार्मिकता या सोच के प्रशंसक थे;हमें रंज है कि कैसे एक-दो देश बेरोकटोक सारे नियम तोड़ रहे हैं।
और इसलिए, भले ही भारत ने खामेनेई की हत्या की सीधे तौर पर निंदा करने से परहेज़ किया, परंतु विदेश सचिव विक्रम मिसरी को दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास में शोक-पुस्तिका पर हस्ताक्षर करने के लिए भेजा गया। तत्पश्चात, मोदी और जयशंकर दोनों ने ही क्रमशः ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन और विदेश मंत्री अब्बास अराघची से फोन पर बात की-भले यह तेल से लदे भारत के जहाज़ों को ‘फारस जलडमरूमध्य’ से सुरक्षित गुज़रने में मदद करने के लिए ही क्यों न हो।
ईरान, जो भले ही लहूलुहान हुए पड़े हैं,पर झुके नहीं,इस खेल को और भी ज़्यादा सूझबूझ के साथ खेला है। वे जानते हैं कि भारतीय लोग -कश्मीर के आम लोग अपने ईरानी बंधुओं के लिए पैसे और गहने जमा कर रहे है, जबकि संभ्रांत वर्ग ‘द ट्रिब्यून’ जैसे अखबारों में अपने विचार लिख रहा है- सरकार के कदम से पूरी तरह सहज नहीं। कदाचित् अब कुछ ईरानी मिसाइलों पर ‘थैंक्यू, इंडिया...’ लिखा हुआ है। गत सप्ताह हमें विदेश नीति की कई सीखें मिली। पहली सीख यह कि सभी पक्षों से संवाद रखें, भले ही आप उनसे सहमत न भी हों- इसलिए, ईरान और इस्राइल दोनों से; और यूएई तथा सऊदी अरब से। दूसरी सीख, सभी पक्षों की बात सुनें-भारतीयों को एक कारण से इसलिए भी यह जानकर हैरत हुई कि पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता करने की सफल कोशिश कर दिखाई, क्योंकि पाकिस्तानी मीडिया तक हमारी पहुंच अब नहीं रही; ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद से सभी अखबार, टीवी चैनल और कई एक्स अकाउंट प्रतिबंधित कर दिए थे। अगर आप पाकिस्तान के अंदर क्या चल रहा है, इस बारे में सिर्फ़ ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ और ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ से जान पाते हैं, और पाकिस्तान के ‘डॉन’ या ‘द न्यूज़’ से नहीं, तो आपकी जानने-समझने की क्षमता सीमित रह जाएगी।
तीसरी सीख यह कि आपको अपने पसंदीदा चाणक्य को नियमित पढ़ने से मिलती है ‘जहां आपको अपने दोस्तों को करीब रखना चाहिए वहीं अपने दुश्मनों को और भी ज़्यादा करीब रखना चाहिए’।
लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।

