वास्तव में चलती चाकी का भेद वे ‘एआई टूल’ से समझे। समझते ही उनके ज्ञान चक्षु खटाक से खुल गए। और वह इनका महत्व भलीभांति समझ गए। वे समझ गए कि यह पाट और कुछ नहीं बल्कि पक्ष व विपक्ष के हैं।
पहुंचा हुआ ज्ञानी वह होता है जो ज्ञानवान होने के साथ-साथ कालखंड के हिसाब से अपने विचार में आवश्यकतानुसार परिवर्तन लाए। कबीर जी के साथ भी ऐसा ही है। समय के साथ-साथ उनकी सोच में परिवर्तन आया। पहले उन्हें जाने क्या होता था कि वह चलती चक्की के दो पाट देखकर रो देते थे।
कबीर दास जी के नश्वर संसार से देह त्यागने के बाद उनके चेले-चपाटी उनके इस रोने के दर्शन की गहराई में उतरे और उतरते ही चले गए। जब वह डूबने लगे तो बड़ी मुश्किल से जान बचाकर बाहर आए। बाहर खड़े अनुयायियों ने जब पूछा तो इज्जत बचाने के लिए बोले कि वह चक्की के दो पाट का दर्शन अच्छे से समझ गए हैं।
वास्तव में चलती चाकी का भेद वे ‘एआई टूल’ से समझे। समझते ही उनके ज्ञान चक्षु खटाक से खुल गए। और वह इनका महत्व भलीभांति समझ गए। वे समझ गए कि यह पाट और कुछ नहीं बल्कि पक्ष व विपक्ष के हैं। इसलिए अब वह चलती चाकी देखकर रोते नहीं, आंसू नहीं टपकाते बल्कि फुलझड़ी जैसे हंस रहे होते हैं।
कबीर दास जी के साथ पहले भी समस्या यह थी कि वह किस संप्रदाय के पक्ष में हैं, किस धर्म का समर्थन करते हैं। यह स्पष्ट नहीं हो पाता था। समय बदल गया परंतु यह बात अभी भी नहीं बदली। अभी भी लोगों के मन में जिज्ञासा है कि कबीर जी किस पार्टी के साथ हैं।
आज कबीर होते तो लोग कहते हैं आप पार्टी ‘अ’ के हैं। उनसे आपकी विचारधारा मेल खाती है। उनके लिए काम कर रहे हैं, जबकि कुछ लोग मानते हैं कि आप ‘ब’ पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। उनके एजेंट के रूप में काम करते हैं।
ज्ञानी लोगों की एक खूबी यह भी होती है कि वह कम बोलते हैं और मुस्कुराते ज्यादा हैं। मेरी अज्ञानता देखकर वह मंद-मंद मुस्कुराते।
हो सकता पत्रकार पूछते, ‘अब तो आपने स्वयं की तीसरी पार्टी बना ली है।’ कुछ लोग कह रहे हैं आप बीच के हैं। न इधर के न उधर के। कुछ लोग आपको लोटे की संज्ञा भी दे रहे हैं।
यह सुनकर कबीर जी जोर-जोर से हंसने लगते।
अर्थ पूछने पर दया कर वह ‘ऑफ द कैमरा’ बस इतना-सा बोलते- मेरे तो तीनों हाथों में लड्डू हैं। कहकर फिर से मौन धारण कर लेते।
हम जैसे उनकी गूढ़ बात की सतह पर ही तैर रहे होते। गहराई में उतरने में खुद को असहाय महसूस करते।

