निर्दोष को कष्ट से व्यथित होता है इंसाफ

निर्दोष को कष्ट से व्यथित होता है इंसाफ

जस्टिस एसएस सोढी (अप्रा)

जस्टिस एसएस सोढी (अप्रा)

तेरह जुलाई, 1983 की सुबह सुखना लेक पर गश्त पर निकले तीन पुलिस कांस्टेबलों को तत्कालीन उप-पुलिस महानिरीक्षक जोगिंदर सिंह आनंद का शव मिला था। जोगिंदर सिंह, संजय गांधी की विधवा मेनका गांधी के पिता के छोटे भाई थे। इससे केस को बतौर हत्या दर्ज किया गया।

मौत की वजहों पर सवाल उठे। यह निश्चित करने को लाश के दो पोस्टमॉर्टम किए गए थे, एक उसी दिन तो दूसरा अगले रोज। इतना ही नहीं, लगभग एक महीने बाद सीबीआई ने दोनों पोस्टमार्टम रिपोर्टों की विवेचना हेतु डॉक्टरों का एक बोर्ड नियुक्त किया। जहां पहली पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट ने मौत का कारण डूबना बताया तो दूजे ने मृत्यु दम घुटने से बताई थी। वहीं, बोर्ड के मुताबिक डूबने से फेफड़ों में मिलिअरी ट्युबरोक्लोसिस की मौजूदगी दम घुटने की वजह दर्शाती है। यह वैसोवैगल शॉक होना भी बताता है। बोर्ड की उक्त राय को उच्च न्यायालय ने किसी सुबूत के आधार पर न होकर महज अकादमिक व्याख्या ठहराया, क्योंकि इसके सदस्य दोनों पोस्ट-मॉर्टम करने वालों में शामिल नहीं थे।

जांच के दौरान, मृतक आनंद के अर्दली दर्शन लाल ने इकबालिया बयान दिया, जिसके आधार पर उसे सरकारी गवाह बनाया गया। यह उसके बयान थे, जिसके चलते दिवंगत आनंद की पत्नी इंदु आनंद, पुत्र सुमनजीत सिंह आनंद और भतीजे संदीप सिंह को अभियुक्त नामज़द किया गया था। चंडीगढ़ में भारतीय दंड संहिता की धारा 304, भाग-2 के अंतर्गत उन पर मुकदमा चला और सेशन जज ने दोषी पाते हुए 2 साल की कैद और 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। यह सजा दर्शन लाल की गवाही के आधार पर हुई थी।

इस निर्णय के खिलाफ हुई अपील में ऊपरी अदालत ने अभियोजन पक्ष की ओर से दर्शन लाल के बयानों को ‘सरासर झूठी कहानी’ बताया। न्यायलय ने आगे कहा : ‘यह यकीन करना नामुमकिन है कि वादी न. 1 -इंदु आनंद - एक युवा महिला, जिसका 17 वर्ष का बेटा, 14 वर्षीय बेटी और लगभग 17 साल का भतीजा हो, वह इन छोटे बच्चों के बारे में सोचे बिना अपने प्रिय पति को मरवाने की सोच भी सकती है।’ अदालत ने सभी वादियों को यह कहते हुए बरी किया : ‘लब्बोलुआब यह, न्यायलय ने पाया है कि सीबीआई ने ऊपर वर्णित सबूत, जो साफ तौर पर संकेत दे रहे हैं कि मृतक आनंद ने आत्महत्या की है, इनकी अनदेखी कर सभी वादियों को नाहक मुकदमे में फंसाया है। इस सिलसिले में याचियों को कई सालों तक संत्रास और कष्टदायी पीड़ा से गुजरना पड़ा है। यह न्याय का मज़ाक है। यह नहीं भूलना चाहिए : ‘जिंदगी में एक बार जो मूल्य (इज्जत) खो जाते हैं, वे वापस कभी नहीं मिलते’, अतएव उन्हें बाइज्जत बरी करना जरूरी है।’

इस पूरे मामले में चौंकाने वाला अवयव है, निचली अदालत में मुकदमे का निर्णय आने में हुई असामान्य देरी और इस फैसले के खिलाफ ऊपरी न्यायलयों में सुनवाई पर लगे सालों-साल। याद रहे, केस अर्सा पहले यानी जुलाई, 1983 को दर्ज हुआ था, लेकिन 23 फरवरी, 1996 को अर्थात‍् 13 साल बाद सेशन जज अमर दत्त (जो कि बाद में उच्च न्यायलय में न्यायाधीश बने) द्वारा फैसला सुनाए जाने पर यह प्रक्रिया पूरी हो पाई। आगे इस निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायलय में की गई अपील पर निर्णय आने में और भी ज्यादा वक्त लगा– 21 साल! यह 23 मार्च, 2017 का दिन था, जब सुनवाई पूरी हुई और निर्णय आया। इस अंतराल में कुछ जजों ने केस सुनने से मना कर दिया था। आखिरकार एक जज, जस्टिस एबी चौधरी, जो बॉम्बे हाईकोर्ट से बदली होकर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायलय आए थे, उन्होंने सुनवाई की।

मामला यहीं खत्म नहीं होता। अभियुक्तों को उच्च न्यायलय द्वारा बरी करने वाले निर्णय के विरुद्ध सीबीआई ने सर्वोच्च न्यायलय में विशेष विवेकाधीन याचिका (स्पेशल लीव पटिशन) दायर कर दी। आगे सर्वोच्च न्यायलय में अंतिम तौर पर मामला बंद होने में 4 साल लग गए, जब सीबीआई की याचिका खारिज हो गई। इसलिए देखा जाए तो वादियों पर चिंता का बोझ 38 साल के लंबे अरसे तक बना रहा। यह किसी की जिंदगी का लगभग आधा हिस्सा होता है। जब मामला शुरू हुआ तो इंदु आनंद 38 वर्षीय युवा महिला थीं, अब 76 वर्षीय वृद्धा हैं। उनका बेटा और भतीजा, जो कि उस वक्त किशोर थे, अब उम्र के 50वें दशक में हैं।

याचिकाकर्ता, जिन्हें दिवंगत आनंद की मौत के लिए जिम्मेवार होने के रूप में देखा जाता रहा, इस पूरे समय समाज उन्हें किस निगाह से देखता होगा, इसके बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। जिस संत्रास से उन्हें गुजरना पड़ा उसका असर सेहत पर हुए बिना नहीं रह सकता। लगभग पूरी जिंदगी तबाह हो गई।

इतना सब काफी नहीं था, वादियों को गंभीर आर्थिक संकटों का सामना भी करना पड़ा, क्योंकि इंदु सामान्य हालत में मिलने वाली पारिवारिक पेंशन से वंचित रहीं। अभी तक, उनको एक पाई नहीं मिली है। सच तो यह है कि बरी किए जाने के बाद इंदु को बनती पारिवारिक पेंशन पाने को उच्च न्यायलय में गुहार लगाने को मजबूर होना पड़ा था। जहां तक उनके पुत्र-भतीजे की बात है, सजा के पात्र वाले ठप्पे ने बढ़िया रोजगार पाने के बहुत से दरवाज़े बंद कर डाले।

इन 38 सालों में याचियों को जिन भी मुश्किलों से गुजरना पड़ा, उसके मद्देनज़र यह सरकार की जिम्मेवारी है कि उन्हें मुआवज़ा मिलने पर विचार करे। यह पूरा प्रसंग न्यायाधीशों पर सही न्याय करने की जिम्मेवारी अहद होना स्पष्ट करता है, उन्हें अहसास होना चाहिए कि उनकी गलती से किसी को कितना कष्ट सहना पड़ता है। दार्शनिक प्लैटो के शब्दों में : ‘अन्याय करना असर भुगतने से ज्यादा अपमानजनक है।’ कोई हैरानी नहीं, जब कहा जाता है : ‘अदालती फैसले से निर्दोष को कष्ट हो... तो इंसाफ रोता है।’

लेखक इलाहाबाद उच्च न्यायलय के पूर्व मुख्य न्यायधीश हैं।

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