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दुनिया के लिए खतरे की घंटी ईरानी जल संकट

ग्लेशियर और भूजल एक तरह से प्राचीन ट्रस्ट फंड हैं। सूखे जैसी जरूरत के समय ही इनका उपयोग करने के बजाय हम इन्हें हल्के में ले रहे हैं। साथ ही हम अधिक वर्षा वाले वर्षों के दौरान भूजल प्रणालियों को...

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ग्लेशियर और भूजल एक तरह से प्राचीन ट्रस्ट फंड हैं। सूखे जैसी जरूरत के समय ही इनका उपयोग करने के बजाय हम इन्हें हल्के में ले रहे हैं। साथ ही हम अधिक वर्षा वाले वर्षों के दौरान भूजल प्रणालियों को फिर से भरने की कोशिश नहीं कर रहे हैं और ऐसा नहीं करके मीठे पानी का बड़ा संकट उत्पन्न कर रहे हैं।

ईरान इस समय भीषण जल संकट का सामना कर रहा है। राजधानी तेहरान में हालत इतनी खराब है कि ईरानी राष्ट्रपति को कहना पड़ रहा है कि यदि हालात नहीं सुधरे तो शहर वासियों को कहीं और ले जाना पड़ेगा। ईरान में पानी की कमी की जड़ें दुनिया के कई दूसरे हिस्सों जैसी ही हैं। इसके लिए जो कारण जिम्मेदार हैं उनमें दशकों तक जरूरत से ज्यादा पानी निकालना, पुराना, लीक होता इन्फ्रास्ट्रक्चर; नदियों पर बने बांधों की बढ़ती संख्या और कुप्रबंधन शामिल है। इन सबके बीच जलवायु परिवर्तन का असर भी है, जिससे मौसम ज्यादा गर्म और शुष्क हो रहा है। इस वजह से साल-दर-साल सूखे हुए जलाशय भर नहीं पा रहे हैं।

ईरान का भयंकर सूखा पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चेतावनी है। दुनिया में ताजा पानी खतरनाक दर से लुप्त हो रहा है। दो दशकों से अधिक समय तक उपग्रहों से किए गए अध्ययन से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन, भूजल के असंतुलित उपयोग और अत्यधिक सूखे के कारण 2002 से पृथ्वी के महाद्वीपों में ताजे पानी की अभूतपूर्व कमी हो गई है। अमेरिका की एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए नए अध्ययन में कहा गया है कि उत्तरी गोलार्ध में महाद्वीप स्तर के चार बड़े शुष्क क्षेत्र उभर रहे हैं। इनमें उत्तर-पश्चिम भारत के क्षेत्र शामिल हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इन विशाल शुष्क क्षेत्रों का जल सुरक्षा, कृषि, समुद्र के स्तर और वैश्विक स्थिरता पर बुरा असर पड़ सकता है। शोध दल की रिपोर्ट के अनुसार भूमि पर शुष्क क्षेत्र हर साल कैलिफोर्निया के आकार से लगभग दोगुनी दर से बढ़ रहे हैं। चिंता की बात यह है कि शुष्क क्षेत्रों के अधिक शुष्क होने की दर आर्द्र क्षेत्रों के अधिक आर्द्र होने की दर से ज्यादा हो गई है, जिससे लंबे समय से चला आ रहा जल चक्र उलटने लगा है। उपलब्ध स्वच्छ जल पर इसके नकारात्मक प्रभाव चौंकाने वाले हैं। दुनिया की 75 प्रतिशत आबादी उन 101 देशों में रहती है जो पिछले 22 वर्षों से स्वच्छ जल की कमी झेल रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अगले 50 से 60 वर्षों तक दुनिया की आबादी में वृद्धि जारी रहेगी। दूसरी तरफ स्वच्छ जल की उपलब्धता में भी लगातार कमी आने का खतरा है।

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शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि भूमि पर जल हानि किस प्रकार से हो रही है। उन्होंने पहली बार पाया कि जल हानि में 68 प्रतिशत हिस्सा भूजल का है जो समुद्र के स्तर में वृद्धि में ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ की चादरों के संयुक्त योगदान से भी अधिक योगदान देता है। अध्ययन से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक जे. फैमिग्लिएटी ने कहा, ये निष्कर्ष हमारे जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के बारे में शायद अब तक का सबसे खतरनाक संदेश देते हैं। महाद्वीप सूख रहे हैं, स्वच्छ जल की उपलब्धता कम हो रही है और समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है। भूजल के निरंतर अति-उपयोग के परिणाम दुनिया भर के अरबों लोगों के लिए भोजन का संकट पैदा कर सकते हैं और जल सुरक्षा को कमजोर कर सकते हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए सभी को एकजुट होकर वैश्विक जल सुरक्षा पर तत्काल कार्रवाई करनी होगी।

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शोधकर्ताओं ने अमेरिकी-जर्मन ग्रेविटी रिकवरी एंड क्लाइमेट एक्सपेरिमेंट (ग्रेस) और ग्रेस-फॉलोऑन मिशनों के दो दशकों से अधिक के आंकड़ों का मूल्यांकन किया और यह देखा कि 2002 के बाद से स्थलीय जल भंडारण कैसे और क्यों बदला है। स्थलीय जल भंडारण में पृथ्वी की सतह और वनस्पति जल, मिट्टी की नमी, बर्फ, हिम और भूमि पर संग्रहीत भूजल शामिल हैं। अध्ययन के प्रमुख लेखक और एरिजोना यूनिवर्सिटी के शोध वैज्ञानिक ऋषिकेश ए. चंदनपुरकर ने कहा, यह आश्चर्यजनक है कि हम बड़े पैमाने पर ऐसा जल खो रहे हैं जिसका नवीकरण नहीं किया जा सकता। ग्लेशियर और भूजल एक तरह से प्राचीन ट्रस्ट फंड हैं। सूखे जैसी जरूरत के समय ही इनका उपयोग करने के बजाय हम इन्हें हल्के में ले रहे हैं। साथ ही हम अधिक वर्षा वाले वर्षों के दौरान भूजल प्रणालियों को फिर से भरने की कोशिश नहीं कर रहे हैं और ऐसा नहीं करके मीठे पानी का बड़ा संकट उत्पन्न कर रहे हैं।

अध्ययन ने 2014-15 के आसपास, ‘महा अल-नीनो’ वर्षों के दौरान एक ऐसे समय की पहचान की है जब जलवायु की चरम घटनाओं में वृद्धि होने लगी जिनके परिणामस्वरूप भूजल का उपयोग बढ़ गया और महाद्वीपीय शुष्कता ग्लेशियर और बर्फ की चादरों के पिघलने की दर से भी अधिक हो गई। इसके अतिरिक्त अध्ययन ने एक और उतार-चढ़ाव का खुलासा किया, जहां 2014 के बाद सूखने वाले क्षेत्र दक्षिणी गोलार्ध से ज्यादातर उत्तरी गोलार्ध में स्थित हो गए। महाद्वीपीय सूखापन में योगदान देने वाले प्रमुख कारकों में से एक उत्तरी गोलार्ध के मध्य अक्षांश वाले क्षेत्रों, उदाहरण के लिए, यूरोप में सूखे की बढ़ती चरम सीमाएं हैं। इसके अतिरिक्त कनाडा और रूस में पिछले दशक में बर्फ, हिम और स्थायी तुषार भूमि (पर्माफ्रॉस्ट) के पिघलने में वृद्धि हुई है।

पिछले एक अध्ययन में टीम के सदस्यों ने 2002 से 2016 तक के उपग्रह डेटा से स्थलीय जल भंडारण का अध्ययन किया था। नए अध्ययन में टीम ने 20 से अधिक वर्षों के डेटा का अध्ययन किया। शोधकर्ता चंदनपुरकर के अनुसार यह अध्ययन वास्तव में यह दर्शाता है कि स्थलीय जल भंडारण का निरंतर अवलोकन कितना महत्वपूर्ण है। ग्रेस एक्सपेरिमेंट के रिकॉर्ड वास्तव में उस स्तर पर पहुंच रहे हैं जहां हम जलवायु परिवर्तनशीलता के दीर्घकालिक रुझानों को स्पष्ट रूप से देख पा रहे हैं। अधिक स्थानीय अवलोकन और डेटा साझा करने से बेहतर जल प्रबंधन में मदद मिलेगी। इस अध्ययन से स्पष्ट है कि महाद्वीपीय शुष्कता का अभूतपूर्व स्तर कृषि और खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, मीठे पानी की आपूर्ति और वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा है।

वर्तमान अध्ययन नीति निर्माताओं और समुदायों को बिगड़ती जल चुनौतियों और सार्थक परिवर्तन लाने के अवसरों के बारे में सूचित करने के लिए बड़े पैमाने पर निरंतर अनुसंधान की आवश्यकता पर जोर देता है। प्रमुख वैज्ञानिक फेमिग्लिएटी का मानना है कि यह शोध स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि हमें वैश्विक स्तर पर नई नीतियों और भूजल प्रबंधन रणनीतियों की तत्काल आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन को कम करने के प्रयासों के सामने चुनौतियां हैं, लेकिन हम क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय भूजल स्थिरता से संबंधित नई नीतियों को लागू करके महाद्वीपीय जल के सूखने की समस्या का समाधान कर सकते हैं। इससे समुद्र के स्तर में वृद्धि की दर धीमी होगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संरक्षण में मदद मिलेगी।

अध्ययन में भूजल क्षरण को धीमा करने और उसे उलटने, मीठे पानी के शेष संसाधनों की रक्षा करने और जल संकट व तटीय बाढ़ के बढ़ते जोखिम के अनुकूल होने के लिए तत्काल कार्रवाई का आह्वान किया गया है। शोध दल का कहना है कि नियोजित जल प्रबंधन, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और स्थायी नीतियां आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संरक्षण को सुनिश्चित करने के अलावा ग्रह प्रणालियों को होने वाले और अधिक नुकसान को कम करने के लिए आवश्यक हैं।

लेखक विज्ञान संबंधी मामलों के

जानकार हैं।

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