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उथल-पुथल के बीच निर्णायक मोड़ पर ईरान

ईरान में विभिन्न मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन व उन पर सरकार की सख्त प्रतिक्रिया जारी है। ये इस इस्लामी गणराज्य के लिए अस्तित्व को चुनौती प्रतीत होते हैं। ऐसे में वहां सत्ता परिवर्तन की मांग शायद जल्दबाजी हो ,...

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ईरान में विभिन्न मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन व उन पर सरकार की सख्त प्रतिक्रिया जारी है। ये इस इस्लामी गणराज्य के लिए अस्तित्व को चुनौती प्रतीत होते हैं। ऐसे में वहां सत्ता परिवर्तन की मांग शायद जल्दबाजी हो , लेकिन सरकार के अंदर बदलाव होने लाजिमी हैं।

पिछले करीब तीन सप्ताह में हुए अभूतपूर्व देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों ने इस्लामिक गणराज्य ईरान को हिलाकर रख दिया है। ये जल्द ही रुक जाएंगे, ऐसा कोई संकेत दिखाई नहीं देता। ईरान में सामाजिक अशांति नई बात नहीं, लेकिन हाल में हुए सार्वजनिक प्रदर्शनों की तीव्रता से लगता है कि देश के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है।

इनको फरवरी, 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद से, 47 सालों में सत्ता के समक्ष सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है। देश में लॉकडाउन के अलावा अंतर्राष्ट्रीय संचार और टेलीफ़ोन सेवाएं बंद हैं। कहा जा रहा है कि सरकार ने वैश्विक सैटेलाइट संचार नेटवर्क ‘स्टारलिंक’ ब्लॉक करने को रूसी या चीनी मिलिट्री ग्रेड तकनीक का इस्तेमाल किया। अफवाहों और सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी वाले माहौल में ईरान में मौजूदा स्थिति का सटीक अंदाज़ा मुश्किल है। लेकिन, कई स्रोतों की रिपोर्ट है कि हाल के दिनों में सुरक्षा बलों ने बेरहमी से कार्रवाई की; जिसकी वजह से अब तक बड़ी संख्या में मौतें हो चुकी हैं और हज़ारों लोग हिरासत में लिये। आने वाले दिन या शायद हफ़्ते, तय करेंगे कि व्यापक तौर पर नापसंद मौजूदा सत्ता का भविष्य क्या होगा, हालांकि यह लंबे समय से कायम है और अगले महीने अपने 48वें साल में कदम रखने वाली है।

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28 दिसंबर से शुरू होकर, संपूर्ण ईरान में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन और दंगे हुए। आरंभ तेहरान के ग्रैंड बाज़ार से हुआ। व्यापारी दुकानें बंद कर धरने पर बैठ गए, उनके विरोध की मुख्य वजह थी ईरानी मुद्रा, रियाल का अपने मुख्य मूल्य मापदंड अमेरिकी डॉलर के बरक्स बेतरह गिरना। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की सरकार द्वारा वित्तीय एवं आर्थिक सुधार करने के फैसले ने आग में घी डाल दिया, इसके पीछे हर चीज़ पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध भी एक वजह है।

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एक प्रस्ताव था कि तरजीही विनिमय दर व्यवस्था वापस ले ली जाए, जिसके तहत व्यापार संघ, जिन्हें वहां ‘बाज़ारी’ कहा जाता है, उन्हें भारी सब्सिडी पर बहुत कम दाम पर विदेशी मुद्रा मुहैया करवायी जाती है। ये ‘बाज़ारी’ नियंत्रित विदेशी मुद्रा प्रणाली के तहत तरजीही सरकारी फंड की उपलब्धता का पूरा बचाव करते आये हैं। पेज़ेशकियन के फैसले ने सत्ताधारी मौलाना वर्ग को इस मुद्दे पर बांट दिया, जो अर्थव्यवस्था पर बाज़ारियों के प्रभाव से परिचित हैं।

जो विरोध प्रदर्शन बाज़ारियों द्वारा दबाव बनाने की तरकीब के तौर पर शुरू हुए, वे जंगल में आग की तरह फैल गए, जिसमें छात्र और समाज का हरेक तबका शामिल हो गया, उनमें हताशा-निराशा लंबे समय से है, खासकर युवाओं में। इसके कुछ कारण हैं, अर्थव्यवस्था एवं रोज़गार की खस्ता हालत, उच्च महंगाई दर (अनुमानित 45 फीसदी) और सरकार का आर्थिक कुप्रंबधन, भ्रष्टाचार व सरकारी छूट का अनुचित लाभ लेने से लोगों में उपजी निराशा।

ईरान में पिछले विरोध प्रदर्शनों का पैटर्न, जिसमें सबसे ताजा 2022 का हिजाब-विरोधी प्रदर्शन था, कुछ ऐसा रहा कि लोगों की नाराज़गी शुरू में तो किसी सामाजिक (हिजाब-विरोध) या आर्थिक शिकायत से भड़की, लेकिन तुरंत ही सियासी बगावत में बदल गयी। मौजूदा आंदोलन भी उसी पैटर्न पर है। हालांकि, इस बार, विरोध, और विरोध करने वालों की विविधता –जिसमें सभी वर्ग शामिल हैं– भरा विरोध जिस तेजी से फैला वैसी पहले कभी नहीं देखी। एक अतिरिक्त अवयव यह कि फ़लस्तीन, सीरिया व लेबनान के मामले में ईरानी सरकार के दखल से पड़े आर्थिक बोझ पर नाराज़गी खुलकर जाहिर हुई है।

सरकार के खिलाफ़ आम नारा ‘तानाशाह को सजाए मौत’जिससे अभिप्राय सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई है– के अलावा अब ‘न गाज़ा न लेबनान के लिए, मेरी जान है ईरान के लिए’ जैसे नारे भी लग रहे हैं। एक नया अवयव है ‘जाविद शाह’ (शाह अमर रहे) का नारा है, यानी अमेरिका में निर्वासन काट रहे युवराज रेज़ा पहलवी। पहलवी इस बगावत का श्रेय चाहते हैं और खुद को बतौर सही विकल्प पेश कर रहे हैं। हालांकि ईरान की बिखरी राजनीति और पहलवी की ईरानियों की इस पीढ़ी से दूरी के चलते यह मुश्किल काम लगता है। राजशाही ईरानियों के बीच विवादास्पद मुद्दा है। वर्तमान सामाजिक उथल-पुथल की तीव्रता और उस पर सरकार की जानी-पहचानी सख़्ती ने पश्चिम एशिया के सबसे महत्वपूर्ण भू-रणनीतिक खिलाड़ियों में एक की अंदरूनी स्थिरता को लेकर चिंताएं पैदा कर दी हैं। जो हालात बन रहे, वे ईरान के पड़ोसियों के लिए भी गहरी चिंता की वजह होंगे। ईरान पश्चिम एशिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है, जो भू-रणनीतिक एवं धार्मिक तौर पर अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी, सऊदी अरब के बाद दूसरे नंबर पर है। दोनों मुल्क सुन्नी और शिया पंथ की विचारधाराओं के ज़रिए इस्लामिक उम्माह की सरदारी के लिए होड़ में हैं। जबकि इस्लाम के ये दोनों पंथ भारत में शांति के साथ सह-अस्तित्व में हैं, यह परिदृश्य ओआईसी (ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन) के किसी एक भी देश में नजर नहीं आता।

भारत और ईरान के बीच पारंपरिक रूप से करीबी ऐतिहासिक रिश्ते रहे और हाल के वर्षों में और प्रगाढ़ हुए, खासकर भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट के प्रबंधन एवं परिचालन की भागीदारी के जरिये। ब्रिक्स और एससीओ की सदस्यता दोनों देशों को सहयोग बढ़ाने देने में मददगार है। अकसर इस बात को कम आंका जाता है कि ईरान ने दशकों वाणिज्यिक और आर्थिक प्रतिबंध झेले, फिर भी कुशलता से खुद को अलग-थलग पड़ने से बचाने में कामयाब रहा। ईरान अपनी आज़ादी कायम रखने को कटिबद्ध है और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार सहित एक महत्वपूर्ण भू-रणनीतिक खिलाड़ी के तौर पर अपनी जगह बनाए है। इसके पास कच्चे तेल का दुनिया का चौथा सबसे बड़ा और प्राकृतिक गैस का दूसरा सबसे बड़ा भंडार है। ईरान काफी मांग वाले अपने हल्के तेल, यानी कम सल्फर मात्रा वाले कच्चे तेल, का प्रतिदिन लगभग दो मिलियन बैरल निर्यात करता है। इस प्रकार, ईरान में विरोध प्रदर्शनों और वेनेजुएला में हुई असामान्य घटनाओं ने दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ी ला दी, ऐसी बढ़ोतरी जिस पर भारत के नीति निर्माता आगामी केंद्रीय बजट से पहले करीबी नज़र रखेंगे।

फिलहाल, ईरान में हालात बेहद अस्थिर हैं। इराक की सीमा से लगे ईरान के उन प्रांतों में स्थिति खासकर गंभीर लग रही है जो कुर्द-बहुल हैं। फिलहाल इस्लामिक शासन में फूट के संकेत नहीं दिखे व सर्वोच्च नेता ने समझौता करने या लोगों से संपर्क की इच्छा नहीं जताई। पेजेशकियन शुरू में सुलह के इच्छुक लगे, लेकिन फिर पीछे हट गए। भारत आम तौर पर ऐसे अवसरों पर सावधान रहा है, महज एक छोटी ट्रैवल एडवाइज़री जारी की है और किसी भी सार्वजनिक ब्यान से परहेज़ किया। आख़िर, ईरान में लगभग 3,000 भारतीय छात्र हैं, जिनमें क़ोम व मशाद के धार्मिक मदरसों के तालिब भी शामिल हैं, और यह सावधानी ज़रूरी है।

दूसरी ओर, ज़्यादातर पश्चिमी देशों की आधिकारिक टिप्पणियों में ईरानी अधिकारियों की कड़ी प्रतिक्रिया की निंदा की गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक तरफ तो ईरान पर हमला करने की धमकी दे रहे लेकिन यह दावा भी कर रहे कि उन्हें फिर से ईरान से वार्ता संदेश मिले हैं। घटनाक्रम पर नज़र रखने वाले जानते हैं कि अमेरिका ने डिएगो गार्सिया में फिर से रणनीतिक बॉम्बर हवाई जहाज़ तैनात कर दिए, इसी सैन्य अड्डे से उसने पिछले जून में ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ चलाया था।

जहां सत्ता परिवर्तन की मांग समयपूर्व और जल्दबाज़ी हो सकती है, लेकिन संभव है सरकार के अंदर बदलाव की शुरुआत हमें देखने को मिले। ईरान में किसी भी किस्म की अस्थिरता के इस क्षेत्र और ऊर्जा मार्केट, दोनों पर, गंभीर असर होंगे।

लेखक ईरान में भारत के राजदूत रहे हैं।

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