डिजिटल युग में बच्चों द्वारा स्कूलों में समाचारपत्र पढ़ना अनिवार्य करने का निर्णय बदलावकारी कदम साबित हो सकता है। यदि वे रोज 10 मिनट भी समाचार पत्र पढ़ें, तो वर्षों में यह आदत उनके व्यक्तित्व, कैरियर और दृष्टिकोण को बदल सकती है। वहीं यह पहल बच्चों में एकाग्रता बढ़ाने की स्क्रीन टाइम कम करने में सहायक होगी।
उत्तर प्रदेश और राजस्थान में विद्यार्थियों के लिए स्कूलों में समाचारपत्र पढ़ना अनिवार्य करने का निर्णय शिक्षा जगत में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में उभरा है। दिसंबर, 2025 में उत्तर प्रदेश के सभी सरकारी और माध्यमिक स्कूलों में प्रार्थना सभा के बाद कम से कम 10 मिनट समाचार पत्र वाचन अनिवार्य कर दिया गया। इसके एक सप्ताह बाद, जनवरी 2026 की शुरुआत में राजस्थान में भी ऐसा ही आदेश जारी किया गया। जिसमें सभी सरकारी स्कूलों में प्रार्थना सभा के दौरान 10 मिनट का विशेष सत्र समाचार पत्र पढ़ने के लिए तय किया गया है। इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों में नियमित पढ़ने की आदत विकसित करना, उनकी शब्दावली समृद्ध करना, सामान्य ज्ञान बढ़ाना और समसामयिक घटनाओं के प्रति जागरूकता पैदा करना है।
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब डिजिटल युग में मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और स्क्रीन-आधारित सामग्री ने बच्चों का अधिकांश समय छीन लिया है। गहराई से पढ़ने की क्षमता व ध्यान केंद्रित करने की अवधि घट रही है और भाषा कौशल में कमी आ रही है। ऐसे में समाचार पत्र जैसी मुद्रित सामग्री को अनिवार्य बनाना बच्चों को स्क्रीन से दूर कर वास्तविक जानकारी के संपर्क में लाने का प्रयास है। उत्तर प्रदेश में इस आदेश के अनुसार, स्कूलों की लाइब्रेरी में हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं के समाचार पत्र उपलब्ध कराए जाएंगे तथा प्रार्थना के बाद विद्यार्थी बारी-बारी राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, खेल समाचार और संपादकीय पढ़कर सुनाएंगे। राजस्थान में भी यही व्यवस्था अपनाई गई, जहां उच्च माध्यमिक व अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में न्यूनतम एक हिंदी व एक अंग्रेजी अखबार तथा उच्च प्राथमिक स्कूलों में दो हिंदी अखबार जरूरी हैं। इनकी सदस्यता का खर्च राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद द्वारा वहन किया जाएगा।
इस पहल के सबसे प्रमुख प्रभावों में से एक है भाषा कौशल और शब्दावली में सुधार। समाचार पत्रों में इस्तेमाल होने वाली भाषा औपचारिक, विविध और समृद्ध होती है। बच्चे रोजाना नए शब्दों, मुहावरों और वाक्य संरचनाओं से परिचित होते हैं। राजस्थान के आदेश में कहा गया है कि प्रतिदिन 5 नए शब्दों का चयन कर उन्हें समझाया जाएगा, जिससे छात्रों का शब्द भंडार लगातार बढ़ेगा। यह न केवल हिंदी या अंग्रेजी की परीक्षाओं में मदद करेगा, बल्कि बोलचाल, लेखन और संवाद कौशल भी मजबूत करेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, मुद्रित सामग्री पढ़ने से आंखों की गति, समझने की क्षमता और ध्यान केंद्रित करने की अवधि में सुधार आता है, जो डिजिटल स्क्रीन पर संभव नहीं होता।
दूसरा अहम प्रभाव सामान्य ज्ञान और समसामयिक जागरूकता में वृद्धि है। आजकल प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे यूपीएससी, एसएससी, बैंकिंग, राज्य लोक सेवा आयोग और यहां तक कि बोर्ड परीक्षाओं में भी करेंट अफेयर्स का बड़ा हिस्सा होता है। समाचारपत्र नियमित पढ़ने से बच्चे देश-विदेश की घटनाओं, नीतियों, आर्थिक बदलावों, पर्यावरण मुद्दों और वैज्ञानिक प्रगति से जुड़ते हैं। इससे उनका दृष्टिकोण व्यापक होता है और वे समाज के प्रति जिम्मेदार बनते हैं। मसलन जब कोई छात्र रोजाना संपादकीय पढ़ता है, तो उसकी विभिन्न मुद्दों पर तर्कपूर्ण सोच विकसित होती है, जो आलोचनात्मक चिंतन की नींव है।
तीसरा, यह कदम पढ़ने की संस्कृति को मजबूत करने में सहायक सिद्ध होगा। ग्रामीण क्षेत्र और छोटे शहरों के सरकारी स्कूलों में अक्सर बच्चों के घर समाचार पत्र नहीं पहुंचते। कई परिवारों में आर्थिक तंगी या पढ़ने की परंपरा न होने के कारण बच्चे किताबों और अखबारों से दूर रहते हैं। स्कूलों में इसे अनिवार्य करने से हर बच्चे को समान अवसर मिलेगा। शिक्षाविदों का कहना है कि यदि यह आदत बचपन से ही बन जाए, तो वयस्क होने पर भी व्यक्ति समाचार पत्र या किताबें पढ़ना जारी रखता है, जो लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसके अलावा, यह पहल स्क्रीन टाइम को कम करने में भी सहायक होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, अधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों में ध्यान की कमी, नींद संबंधी समस्याएं, शारीरिक निष्क्रियता और मानसिक तनाव बढ़ रहा है। समाचार पत्र पढ़ना एक शांत, गहन और एकाग्रता वाली गतिविधि है, जो डिजिटल डिटॉक्स का एक छोटा लेकिन प्रभावी रूप है।
हालांकि, दोनों राज्यों में इस निर्णय के समक्ष कुछ चुनौतियां भी हैं। पहली चुनौती है कार्यान्वयन। ग्रामीण क्षेत्रों में समाचार पत्रों की समय पर डिलीवरी, शिक्षकों की कमी या उनकी ट्रेनिंग का अभाव, तथा स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का कम होना कार्य को कठिन बना सकता है। दूसरी बात, कुछ विद्यार्थी शुरू में इसे बोझ समझ सकते हैं, खासकर यदि वे हिंदी या अंग्रेजी में कमजोर हैं। तीसरा, समाचार पत्रों का कंटेंट हमेशा बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं होता। राजनीतिक खबरें, आपराधिक घटनाएं या संवेदनशील मुद्दे बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए शिक्षकों को ये खबरें फिल्टर करने और सकारात्मक ढंग से प्रस्तुत करने की जरूरत होगी।
चुनौतियों के बावजूद, यदि इस योजना को सही ढंग से लागू किया जाए तो इसका दूरगामी प्रभाव बहुत सकारात्मक होगा। भविष्य में अन्य राज्य भी इस मॉडल को अपनाएं तो एक राष्ट्रीय स्तर पर पढ़ने की संस्कृति मजबूत हो सकती है। यह बच्चों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें जीवंत दुनिया से जोड़ता है। यदि बच्चे रोजाना 10 मिनट भी समाचार पत्र पढ़ें, तो वर्षों में यह आदत उनके व्यक्तित्व, कैरियर और जीवन दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल सकती है।
लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

