हिमालयी विकास केवल विज्ञान और टेक्नोलॉजी का विषय नहीं है। यह ज्ञान, अनुभव व पारंपरिकता का भी विषय है। वहां के रहने वाले अपने-अपने स्तर पर जिन तौर-तरीकों से बचे रहना चाहते हैं, उन पर अपना विज्ञान न थोपें। जिन तरीकों से वे सफलता से बचे रह रहे हैं, हिमालय से कम-से-कम संसाधन लेते हुए उनके पीछे के विज्ञान को समझिए। तब उनके लिए मददगार वातावरण बनाएं।
हम हिमालय या अन्यत्र भी प्राकृतिक संसाधनों का जितना उपभोग या अपव्यय कर रहे हैं, उतना प्राकृतिक रूप से पैदा नहीं हो रहा है। जैव विविधता के मामले में उपभोग या पर्यावरणीय आघातों से जो जैविक जातियां-प्रजातियां संकट में पहुंच गई हैं या समाप्त हो गई हैं, उनकी भरपाई मुश्किल है। क्षेत्रीय आधार पर तो कई जड़ी-बूटियां अतिदोहन के बाद स्थापित ही नहीं हो रही हैं। यह ईकोसिस्टम सेवा क्षमताओं व प्रवाहों पर प्रतिकूल असर डालता है। कई रणनीतियों या चल रहे कार्यक्रमों को मौसम में हो रहे बदलाव प्रभावित कर रहे हैं।
किसी आपदा के बाद जब सरकार अध्ययन कराने की बात करती है, तो वह राजनीतिक रूप से उस समस्या को टालने की प्रक्रिया होती है। जैसे तब तक बरसातें रुक जाती हैं या जंगलों में लगी आग मौसमी कारणों से बुझ जाती हैं। सड़कों के एलाइनमेंट के मामले में भी ऐसा होता है। राजनेता उन क्षेत्रों में सड़क ले जाने के लिए वोट बैंक के कारण दबाव डालते रहते हैं, जिन क्षेत्रों में सड़क ले जाने से जलस्रोतों और वनों को हानि पहुंच सकती है या नए भूस्खलन क्षेत्र बन सकते हैं।
नदी से दूर निर्माण करने के सुझाव ही नहीं माने जाते हैं। इसके लिए तो राजनीतिज्ञ इस हद तक जा सकते हैं कि वे उन सभी दलीलों को जुटा देते हैं, जिनसे बुग्यालों को बुग्याल मानने से ही इनकार कर दिया जाए। नदियों की चौड़ाई पर ही सवालिया निशान लगा देते हैं। बांध जलाशय बन गए तो उनमें मनमाने स्तर तक पानी भरवाने में गुरेज नहीं करते या उस तथ्य की अनदेखी कर देते हैं। इस समय दस राष्ट्रों और लगभग 1.90 अरब लोगों को हिमालय से सेवाएं मिलती हैं। स्थानीय लोगों के ईकोसिस्टम संबंधी ज्ञान का लाभ नहीं लिया जा रहा है। यदि स्थानीय समुदाय को काम दिया जाए और उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो तो ईकोसिस्टम के पुनर्वास की कीमत कम हो सकती है। नई टेक्नोलॉजी से होने वाले नुकसान कम किए जा सकते हैं और आर्थिकी व पारिस्थितिकी, दोनों को मदद मिल सकती है। पारंपरिक बीज संरक्षण की जानकारी स्थानीय समुदाय आपको दे सकता है। यह पहाड़ी खेती में जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक सहनशीलता और अनुकूलन क्षमता ला सकता है।
आपदाओं के बीच बचे रहने के लिए स्थानीय स्तर के ज्ञान, तकनीकों व अनुभवों का डॉक्यूमेंटेशन और सामयिक उपयोग करने से भविष्य में स्थानीय समुदायों में ज्ञान-कौशल की कुछ विशिष्टताएं भी पनप सकती हैं। बाहरी जगत से संपर्कों के अभाव में दुर्गम क्षेत्रों में अपनी सुरक्षा व रोजमर्रा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उन्हें आविष्कार व नवाचार करने ही पड़ते हैं। दुरूह, दुर्गम पहाड़ों में रहने वाले लोगों के लिए पीढ़ियों व सदियों से वहां विपरीत परिस्थितियों में भी जिंदा रहने के लिए स्थानीय स्तर पर काम के तौर-तरीकों, औजारों व ज्ञान को विकसित करना और सहेजना आवश्यक रहा है। ऐसे उदाहरण भी हैं, जब भूकम्पों में भी पीढ़ियों पुराने पहाड़ी मकान या अन्न भंडारण संरचनाएं बची रह जाती हैं। या सूखा, अकाल या अन्य मौसम की मारों के बीच भी स्थानीय लोग पहाड़ों के खेतों व जंगलों में कुछ ऐसा पैदा हुआ पहचान लेते हैं, जिसे स्थानीय निवासी बचे रहने के लिए खा सकते हैं। पहाड़ी आपदाओं से बचाव व राहत में इनसे मदद मिल सकती है।
इस तरह का देशज ज्ञान स्थानीय स्तर पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी झेली जाने वाली प्राकृतिक आपदाओं के संदर्भों व अनुभवों से ही उपजता है। इसे पिछली पीढ़ियां आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा देती हैं। अब ऐसे ज्ञान की थाती की निरंतरता बनाए रखना मुश्किल हो रहा है। पहाड़ों से भारी मात्रा में पलायन भी इसका एक कारण है। बाजारी व्यवस्थाओं से ही जरूरतों के पूरा होने तथा कई प्रकार के प्रतिबंधों के कारण प्राकृतिक क्षेत्रों व संसाधनों से लोगों का दुराव होने के कारण भी पर्वतीय समुदाय के प्रकृति को समझने के अवसरों में कमी आई है। इससे प्रासंगिक आपदा प्रबंधन के देशज ज्ञान की थाती भी सिमटी है।
भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालयी पहाड़ संवेदनशील संतुलन में हैं। यहां आपदाओं से सहज प्रभावित होने वाली संरचनाएं हैं। भू-उपयोग परिवर्तन भूपारिस्थितिकी, भू-संस्कृति और लोगों की मांगों व पसंद में भी अंतर ला रहा है। स्थानीय लोग जब बाहर की चीजें मांगेंगे तो निर्भरता बढ़ेगी। जब बादल फटता है या भीषण बरसात आती है, तो सड़कों की मोड़दार, तेज ढालों से पानी के बहाव और उसकी शक्ति में अप्रत्याशित तेजी आती है। इससे नीचे के मकानों, खेतों, मैदानों और सूखे नालों में बजरी, पत्थर व मलबा भारी मात्रा में आकर नुकसान कर देता है। सड़कों को पहाड़ों से काटते वक्त पहाड़ों का स्थिर प्राकृतिक ढलान बिगड़ जाता है। ये अस्थिर ढलान बादल फटने के समय लगातार भूस्खलन वाले क्षेत्र बन जाते हैं।
हिमालयी विकास केवल विज्ञान और टेक्नोलॉजी का विषय नहीं है। यह ज्ञान, अनुभव व पारंपरिकता का भी विषय है। वहां के रहने वाले अपने-अपने स्तर पर जिन तौर-तरीकों से बचे रहना चाहते हैं, उन पर अपना विज्ञान न थोपें। जिन तरीकों से वे सफलता से बचे रह रहे हैं, हिमालय से कम-से-कम संसाधन लेते हुए उनके पीछे के विज्ञान को समझिए। तब उनके लिए मददगार वातावरण बनाएं।
लेखक पर्यावरण वैज्ञानिक हैं।

