जल्दबाजी में राजनयिक पहल न करे भारत

जल्दबाजी में राजनयिक पहल न करे भारत

जी. पार्थसारथी

जी. पार्थसारथी

‘बामियान के बुद्ध’, की मूर्तियां विश्व के सबसे उत्कृष्ट स्मारकों में से एक थीं और सदियों तक भारत-मध्य एशिया को जोड़ते रहे महान ‘सिल्क मार्ग’ पर पड़ने वाले दर्शनीय पूजनीय स्थलों की खूबसूरती एवं भव्यता का प्रतीक रही थी। वहां बनी इन विशालकाय मूर्तियों में से एक थी वैराकोना बुद्ध और दूसरी गौतम बुद्ध। इन्हें ‘सिल्क रूट’ पर पड़ने वाली एक बड़ी चट्टान के सीधे पार्श्व को घड़कर बनाया गया था। यही वह मार्ग रहा होगा, जिससे होकर सम्राट हर्षवर्धन के राज में चीनी यात्री ह्वेन सांग भारत आया था। ‘बामियान के बुद्ध’, जिस नाम से इन्हें जाना जाता है, आस्थावान बौद्धों के लिए एक तीर्थस्थल था। इन मूर्तियों के आसपास की अनेकानेक गुफाओं में सुंदर भित्ति चित्र बने हुए थे। इन ऐतिहासिक कलात्मक चित्रों को गुप्त काल और बौद्ध शैली की चित्रकला का अद‍्भुत संगम माना जाता था, जिसका उद‍्भव भारत में हुआ था। इन बेशकीमती और ऐतिहासिक स्मारकों को मार्च 2001 में तालिबान के नेता मुल्ला उमर के आदेश पर नष्ट कर दिया गया था। संक्षेप में, तालिबान सरगना ने वह मूर्तियां और गुफाएं नष्ट करवा दीं, जो पुराने समय में बौद्ध धार्मिक चिन्हों के माध्यम से बरास्ता अफगानिस्तान, मध्य एशियाई मुल्कों और बुद्ध की कर्मस्थली भारत के बीच रिश्तों का प्रतीक थी।

किसी को अफगानिस्तान में पिछले दिनों घटित राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर करना चाहिए। 31 अगस्त वह तारीख थी, जिस दिन तक बाइडेन प्रशासन ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की पूर्ण वापसी करनी तय की थी। किंतु अंतिम प्रस्थान के समय काबुल एयरपोर्ट पर हुए बम धमाके से परिदृश्य रक्त रंजित हुआ, अफरातफरी मची और दर्जनों लोग मारे गए, जिसकी जिम्मेवारी ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान’ नामक संगठन ने ली, जो पाकिस्तान, अफगानिस्तान और अरब देशों के जिहादियों से मिलकर बना है। इस गुट ने अपना मकसद समूचे इस्लामिक जगत में जेहाद चलाना बताया है। इस घटनाक्रम के पहले वाले दिनों में तालिबान ने अमेरिका द्वारा प्रशिक्षित और सुसज्जित अफगान सेना को परास्त कर दिया, लगभग पूरे अफगानिस्तान में सरकारी सैनिक लड़ने की बजाय मैदान छोड़ गए।

अमेरिका के जाने के बाद काबुल में नयी तालिबान नीत अफगान सरकार का गठन हुआ है, जिसका प्रधानमंत्री मोहम्मद हसन अखुन्द नामक तालिबान को बनाया गया है। हैरानी की बात है कि अभी तक किसी ने तालिबान सशस्त्र बलों के इस ‘सर्वोच्च सैन्य कमांडर’ को परिदृश्य पर नहीं देखा है। रिपोर्टों के मुताबिक वह अभी भी कंधार में है, जिसे तालिबान समेत ज्यादातर पश्तून पवित्र आध्यात्मिक केंद्र मानते हैं। वह इसलिए कि 18वीं सदी में आधुनिक अफगानिस्तान के निर्माता कहे जाने वाले अमीर अहमद शाद दुर्रानी ने अपनी बुखारा यात्रा पर वहां के सुल्तान से भेंट में मिला वह लबादा, जिसके लिए कहा जाता है कि हजरत मोहम्मद ओढ़ा करते थे, लाकर कंधार की एक मस्जिद में रखा था, जहां वह आज भी है। मुल्ला उमर की बतौर तालिबान के सर्वोच्च नेता वाली पैठ लोगों में उस वक्त बनी जब एक दिन वह उक्त लबादे सहित कंधार में लोगों के हुजूम के सामने नाटकीय ढंग से प्रकट हुआ। काबुल में नयी बनी तालिबान सरकार का नेतृत्व आरंभ में मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने किया था, जिसे अमेरिका के कहने पर पाकिस्तान ने आठ साल तक जेल में रखा था। मुल्ला बरादर और उसकी टीम के कुछ सदस्य भारत के प्रति अपेक्षाकृत अनुकूल रुख रखते हैं।

अफगानिस्तान की स्थिति में आईएसआई के मुखिया ले. जनरल फैज़ हमीद के काबुल दौरे से हालात में नाटकीय रूप से तबदीली हुई। उस वक्त मुल्ला बरादर अफगान सरकार का कार्यवाहक मुखिया था। लेकिन जनरल फैज़ के आने के तुरंत बाद मोहम्मद हसन अखुन्द को कार्यवाहक प्रधानमंत्री घोषित कर दिया गया। मुल्ला बरादर की तरह वह भी तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के काफी नज़दीक था। उसका रिकॉर्ड अत्यंत कट्टरपंथी होने का है। ‘बामियान के बुद्धों’ की तोड़फोड़ उसकी निगरानी में हुई थी। उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी करार दे रखा है। अब वह बतौर एक प्रधानमंत्री सैन्य मामलों को भी देखेगा। भारत की सुरक्षा को असल खतरा हक्कानी नेटवर्क के सरगना सिराजुद्दीन हक्कानी से है, जिसकी नियुक्ति बतौर नये आंतरिक सुरक्षा मंत्री हुई है। सिराजुद्दीन खुद भी एफबीआई की सबसे वांछित सूची में है और उसके सिर पर 50 लाख डॉलर का इनाम है। वह पाकिस्तान स्थित भारत विरोधी आतंकी संगठनों लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद से भी निकट संबंध रखता है।

अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास और उप-दूतावासों पर हुए हमलों के पीछे हक्कानी नेटवर्क के सदस्य जिम्मेवार थे। अब सिराजुद्दीन के हाथ में डूरंड लाइन से सटे प्रांतों में राज्यपाल नियुक्त करने की शक्ति आ गई है, जिससे वह अफगानिस्तान में जिहादियों के प्रशिक्षण का इंतजाम आसानी से कर पाएगा, आगे जिनकी घुसपैठ पाक अधिकृत कश्मीर से होकर भारतीय जम्मू-कश्मीर में करवाई जा सकती है। पूर्व अफगान सेना के चौंकाने वाले सामूहिक आत्मसमर्पण से उत्पन्न स्थिति का एक परिणाम यह है कि तालिबान के हाथ में बड़ी मात्रा में अमेरिका प्रदत्त हथियार, उपकरण, विस्फोटक, गोला बारूद व बख्तरबंद गाड़ियां आ गई हैं। किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए यदि वर्ष में 2022 में जम्मू-कश्मीर में नये रास्तों से उन जिहादियों की घुसपैठ हो, जिन्हें सिराजुद्दीन हक्कानी के समर्थकों ने प्रशिक्षित और अमेरिकी हथियारों से लैस किया हो। फिर बड़ी संख्या में हमें जिहादियों और भारतीय सैन्य बलों के बीच मुठभेड़ें देखने को मिलें।

जिस भोंडे ढंग से पाकिस्तान ने दुनिया के सामने यह दिखाने की कोशिश की है कि ‘अफगानिस्तान की राह केवल पाकिस्तान से होकर’ है, इस पर रूस ने एतराज जताया है। हालांकि भारत ने अलग रास्तों से अफगानिस्तान तक अपनी पहुंच बनाए रखी थी, जो ईरान और ताजिकिस्तान जैसे मध्य एशियाई देशों से होकर थी। उन्हें भी पाकिस्तान के इस यत्न पर कड़ी आपत्ति है कि वह रावलपिंडी स्थित अपने सैन्य मुख्यालय को अफगानिस्तान से संपर्क का मुख्य केंद्र बनाना चाहता है। अफगानिस्तान की स्थिति पर विचार करने को रूस, अमेरिका और यूके के खुफिया विभागों के मुखिया हाल ही में दिल्ली पहुंचे थे। जहां यह आभास तो हो सकता है कि रूस एवं अमेरिका की प्रतिक्रिया कैसी रहेगी वहीं यूके, जिसने कभी अफगानिस्तान और भारतीय उपमहाद्वीप को अलग करने वाली डूरंड रेखा खींची थी, उसका रुख कैसा रहेगा, इसका पता पूरी तरह से नहीं है। हालांकि ब्रिटेन में फिलवक्त भारत की मित्र कंज़र्वेटिव पार्टी सत्ता में है।

भारत को काबुल में अपनी राजनयिक उपस्थिति पुनः बनाने के वास्ते जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। तालिबान ने अब धार्मिक कट्टरता खुलकर दिखानी शुरू कर दी है। यह भी तय है कि निकट भविष्य में तालिबान का पाला गेहूं और अन्य जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं की भारी कमी से पड़ने वाला है, जिसकी आपूर्ति भारत से हो सकती है। भारत चाहे तो ईरान के चाबहार बंदरगाह और मध्य एशियाई देश जैसे कि ताजिकिस्तान से होकर अफगानिस्तान तक पहुंच बना सकता है।

लेखक पूर्व राजनयिक हैं।

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