मालदीव में सरकार विरोधी चक्रव्यूह में भारत

मालदीव में सरकार विरोधी चक्रव्यूह में भारत

पुष्परंजन

मालदीव में योग दिवस पर हुड़दंग करने वाले दर्जन भर से अधिक गिरफ्तार हो चुके हैं। उनमें पूर्व सांसद मोहम्मद इस्माइल भी है। पांच-छह ऐसे अभियुक्त हैं, जिन्हें माले पुलिस ने साठ दिनों के रिमांड पर भी लिया है। योग दिवस पर माले के गोलोल्हू स्थित नेशनल स्टेडियम में हमला करने की सारी साजिश क्या प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव (पीपीएम) ने रची थी? सरकार इसकी जांच में लगी हुई है। पीपीएम नेताओं ने बयान दिया है कि यह सब सत्तापक्ष का किया-कराया है। इतनी चाक-चौबंद सुरक्षा में पचास-साठ लोग झंडे और डंडे के साथ कैसे आयोजन स्थल के अंदर घुस सकते हैं?

इस प्रकरण में मालदीव के खेल मंत्री अहमद महलूफ का बयान महत्वपूर्ण है। महलूफ ने कहा, ‘योग महोत्सव अब्दुल्ला यामीन अब्दुल गयूम के राष्ट्रपति रहते हुए भी होता रहा है। मगर, 21 जून, 2022 के अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सव में हुड़दंग सोची-समझी साजिश का हिस्सा है, जिसमें पीपीएम और जमीयत सलाफ़ के लोग शामिल थे।’ जमीयत सलाफ मालदीव में पब कल्चर, कैसिनो, नाइट क्लब, टैटू का प्रचंड विरोधी है। आगामी 1 जुलाई, 2022 को सरकार संसद में मालदीव को और सेक्युलर बनाने के वास्ते एक विधेयक लेकर आ रही है, जिसका विरोध जमीयत सलाफ़ के नेता अल शेख़ हसन मुसा फिकरे ने किया है। उन्होंने कहा, ‘यह किस तरह का लोकतांत्रिक अधिकार है, जिसमें टैटू बनाकर औरत मर्द हो जाए, और मर्द औरत? मालदीव में पब कल्चर व कैसिनो को मान्यता दिलाना है, और इस्लाम की मिट्टी पलीद करनी है।’

21 जून, 2022 के योग दिवस के दौरान जो विघ्न उपस्थित हुआ, क्या वह राजनीतिक व्यूह रचना का हिस्सा था? पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ही इसका बेहतर उत्तर दे सकते हैं। 2013 से 2018 तक अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति रहे। 2014 के बाद से माले में हर वर्ष योग दिवस आयोजित होता रहा है। जो लोग पकड़े गये हैं, उनमें पीपीएम के नेता अधिक हैं। निशाल अल शेख़, फज़लून बिन मोहमेद, मोहम्मद इस्माइल (पूर्व सांसद), मोहम्मद रज्जन जैसे नाम कई सारे सवाल खड़े करते हैं। मालदीव में इस्लामिक मामलों के मंत्रालय ने भी इस कांड की मज़म्मत की है।

23 सितंबर, 2018 के राष्ट्रपति चुनाव में इब्राहिम मोहम्मद सोलिह सत्ता में आये थे। मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) के नेता सोलिह ने 17 नवंबर, 2018 को शपथ ली थी। संसदीय चुनाव वहां 2019 में हुआ था जिसमें इब्राहिम मोहम्मद सोलिह की मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी को निचले सदन की 87 सीटों में से 65 सीटें हासिल हुई थीं। दूसरे-तीसरे नंबर पर जम्हूरी पार्टी और प्रोग्रेसिव पार्टी पांच-पांच सीटों के साथ संसद में हैं। पूर्व राष्ट्रपति और प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव (पीपीएम) के नेता अब्दुल्ला यामीन दोबारा से सत्ता में आना चाहते हैं, वहां तक तो ठीक है, क्योंकि यह उस देश का अंदरूनी मामला है। मगर, मालदीव में सरकार विरोधी चक्रव्यूह में भारत को जिस तरह निशाने पर लिया जा रहा है, वह चिंता की बात है। गोलोल्हू नेशनल स्टेडियम में हमले की भर्त्सना कैबिनेट की बैठक में की गई। अटॉर्नी जनरल इब्राहिम रिफ़ात के साथ मालदीव का छह सदस्यीय मंत्री समूह पूरे घटनाक्रम की जांच कर रहा है।

मालदीव दूतावास के कल्चरल सेंटर में योगाभ्यास 2012 से आयोजित होता रहा है। यहां योग शिक्षिका सविता हरीश बताती हैं कि काफी सारे स्थानीय लोग इस वास्ते संस्कृति केंद्र आते थे। लोकल टेलीविज़न भी योग क्लासेज़ कवर करता था। स्कूलों में योगासन की क्लास होती थीं। 13 से 15 फरवरी, 2016 में मालदीव-भारत के सहकार से ‘हेल्थ एक्सपो’ लगाया गया था, जिसमें तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन अब्दुल गयूम, विदेश मंत्री दुनिया मयमून, उस समय के भारतीय उच्चायुक्त अखिलेश मिश्रा ने पूरी सक्रियता दिखाई थी। कई सारे रिसाॅर्ट वालों ने पर्यटकों के लिए योग की सुविधाएं दे रखी थीं। मालदीव डेमोक्रेसी नेटवर्क की कार्यकारी निदेशक शाहिंदा इस्माइल बताती हैं कि पीपीएम के नेता अब्दुल्ला यामीन जैसे ही सत्ता से बाहर हुए, इंडियन म्यूज़िक, डांस, योग, वेस्टर्न कल्चर सब कुछ से उन्हें एलर्जी हो गई।

पीपीएम के नेता अब्दुल्ला यामीन को लगा कि सत्ता में दोबारा से आना है, तो भारत की हर शै का विरोध करो। योग को हिंदू धर्म से जोड़कर मालदीव में राजनीतिक उन्माद पैदा करना भी इसी कवायद का हिस्सा रहा है। योग शिक्षिका सविता हरीश बताती हैं कि हमने यह सब देखकर योग की क्लास से ओम शब्द का उच्चारण ही हटा दिया था। योग के विरुद्ध घृणा का वायरस इंडोनेशिया, मिस्र जैसे देशों से मालदीव में आया, इसे भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है। आज से तीस साल पहले 1992 में भारतीय दूतावास ने कैरो के इंडियन कल्चरल सेंटर में भारतीय भाषा, कला-संस्कृति और योग क्लासेज़ की शुरुआत की थी। उस कालखंड में अरब देशों के नौ स्पोर्ट्स चैनलों पर योग नमूदार होने लगा था। इससे खुंदक खाकर मिस्र के ग्रांड मुफ्ती अली गोमा ने 2004 में फतवा जारी किया कि इसे बंद करो, यह इस्लाम के विरुद्ध है।

उससे और पहले सिंगापुर में इस्लामिक रिलीजियस कौंसिल ने 1984 में फतवा जारी किया, ‘गोकि योग करते समय मंत्रोच्चारण करते हैं, सूर्य नमस्कार जैसी उपासना है, यह सब इस्लाम के विरुद्ध है। इसे बंद किया जाए।’ 22 से 24 अक्तूबर, 2008 को मलयेशिया के कोटा बारू में 83वीं नेशनल फतवा कौंसिल आहूत हुई, जिसमें योग को हराम घोषित किया गया था। इस पर वहां देशव्यापी बहस शुरू हुई, उसकी वजह योग का मलयेशियाई जीवन शैली में प्रवेश कर जाना था। औरतों से लेकर मलयेशियाई बच्चे तक योगाभ्यास करते थे। अचानक एक फतवे के ज़रिये पाबंदी सर्वस्वीकृत नहीं थी। 22 नवंबर, 2008 को स्टार ऑनलाइन टीवी पर एक प्रसारण के दौरान फतवा कौंसिल के चेयरमैन, डॉ. अब्दुल शकुर हुसैन ने कहा कि योग में तीन तत्व हैं-मंत्रोच्चार, शारीरिक मुद्रा और पूजा। केवल शारीरिक मुद्रा परिवर्तन से कोई दिक्क़त नहीं, मगर बाक़ी दो इस्लाम की दृष्टि से स्वीकार्य नहीं।

किसी ज़माने में हिंदू व बौद्ध धर्म का बोलबाला था मालदीव में। वहां इस्लाम का प्रवेश 1147-48 ईस्वी में हुआ था। इस मुल्क में सुन्नी इस्लाम को अपनी ज़मीन तैयार करने में कई सौ साल लगे। 1990 में नव-सलाफी मूवमेंट की शुरुआत मालदीव में हुई, जिसने राजनीति को अपने हुजरे में समेट लिया। 2008 से पहले ‘सुप्रीम कौंसिल फॉर इस्लामिक अफेयर्स’ सत्ता के लिए ‘खुल जा सिम-सिम’ का काम करती थी। 2008 में ही इसका नाम बदलकर ‘मिनिस्ट्री ऑफ इस्लामिक अफेयर्स’ रख दिया गया। योग को लेकर पूर्वी एशियाई देशों में जो कुछ फतवेबाज़ी चल रही थी, स्वाभाविक है, मालदीव उससे बेअसर नहीं रहता। लेकिन यह भारत-मालदीव संबंधों के लिए सुखदायी नहीं है।

लेखक ईयू-एशिया न्यूज़ के नयी दिल्ली संपादक हैं।

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