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सहनशक्ति बढ़ाकर करें जोखिम का मुकाबला

अंतर्मन

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कुछ विरले ऐसे होते हैं जो गहन अवसाद और पीड़ा का सामना भी धैर्य और हिम्मत से करते हैं। ऐसे ही व्यक्ति आगे चलकर इतिहास रचते हैं। जापानी लोग बहुत ही सरलता से मुश्किल का सामना करते हैं।

कहते हैं कि मनुष्य और कॉकरोच दो ऐसे जीव हैं जो हर परिस्थिति में जीवित रहना जानते हैं। कई बार मनुष्य को चाराें ओर अंधकार ही अंधकार नज़र आता है। पीड़ा इतनी गहन हो जाती है कि सब्र नहीं होता। ऐसे में कई लोग हार मान जाते हैं तो कुछ विरले ऐसे होते हैं जो गहन अवसाद और पीड़ा का सामना भी धैर्य और हिम्मत से करते हैं। ऐसे ही व्यक्ति आगे चलकर इतिहास रचते हैं। जापानी लोग बहुत ही सरलता से मुश्किल का सामना करते हैं। वे ‘निनताई’ शब्द में बहुत अधिक विश्वास करते हैं। इस जापानी शब्द का अर्थ बहुत गहरा और प्रेरणा देने वाला है।

‘निनताई’ दो शब्दों के मेल से बना है-निन और ताई। ‘निन’ का अर्थ है ‘सहन करना’ या ‘छिपाना’ और ‘ताई’ का अर्थ है ‘प्रतिरोध’ या ‘झेलने की शक्ति’। निनताई ऐसी मानसिक श्ािक्त है जो हमें तब भी मैदान में टिकाए रखती है, जब बाकी सब हार मानकर जा चुके होते हैं। यह बिना शिकायत किए और बिना रुके चलने की कला है। इस कला को सीखने से हर मुश्िकल काम व्यक्ति के लिए सहज हो जाता है। हमारे देश के क्रांतिकारियों ने भी ‘निनताई’ शब्द को अपने जीवन में उतार लिया था। उनकी सहनशीलता इस कदर बढ़ गई थी कि अंग्रेजों का बर्बर व्यवहार अंग्रेजों को ही चौंकाने पर मजबूर कर देता था। भारतीय क्रांतिकारी देश की खातिर अंग्रेजों के हर अत्याचार को बर्दाश्त करता था, मगर उन्हें अपने देश की महत्वपूर्ण बातों की भनक तक लगने नहीं देता था।

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अविभाजित बंगाल के चटगांव जो कि अब बांग्लादेश में है, के स्वाधीनता आंदोलन के नायक सूर्यसेन उर्फ सुरज्या सेन भी ऐसे ही वीर क्रांतिकारियों में से एक हैं। होश संभालते ही इन्होंने अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने आरंभ कर दिए थे। इन्होंने अपने साथियों को गुरिल्ला युद्ध के लिए प्रेरित किया। 23 दिसम्बर, 1923 को इन्होंने चटगांव में असम-बंगाल रेलवे के ट्रेजरी ऑफिस को लूटा। इन्हें सबसे बड़ी सफलता चटगंाव आर्मरी रेड के रूप में मिली, इससे अंग्रेज सरकार बुरी तरह छटपटा उठी। सूर्यसेन ने युवाओं को संगठित कर भारतीय प्रजातांत्रिक सेना नामक संगठन खड़ा किया। 18 अप्रैल, 1930 को सैनिक वस्त्रों में इन युवाओं ने चटगांव के सहायक सैनिक शस्त्रागार पर कब्जा कर लिया। सूर्यसेन मास्टर दा के रूप में अपने इलाके में प्रसिद्ध हो गए थे।

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मास्टर सूर्यसेन ने इन गतिविधियों द्वारा अंग्रेजों को सीधे चुनौती दी थी। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर चटगांव को अंग्रेजी हुकूमत के शासन के दायरे से बाहर कर लिया था और भारतीय ध्वज को फहराया था। क्रांतिकारियों ने टेलीफोन और टेलीग्राफ के तार काट दिए और रेलमार्गों को अवरुद्ध कर दिया। इन सभी सूचना माध्यमों को ध्वस्त करने के कारण चटगांव से अंग्रेज सरकार का संपर्क तंत्र टूट गया था। इस कारण अंग्रेजोें को लोहे के चने चबाने पड़े।

अंग्रेज सूर्यसेन के पीछे हाथ धोकर पड़ गए। आखिर 16 फरवरी, 1933 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें गिरफ्तार करने के बाद अंग्रेजों ने उन पर अमानवीय और बर्बर अत्याचार किए। उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। लेकिन फांसी देने से पहले उन्हें बहुत अधिक यातनाएं दी गईं। फांसी पर लटकाने से पहले उनके हाथों के नाखून उखाड़ लिए गए। उनके दांतों को हथौड़ों से तोड़ दिया गया। उनके शरीर के सभी अंगों और जोड़ों को बुरी तरह तोड़ दिया गया। मरते-मरते भी सूर्यसेन ने अपने अंतिम पत्र में लिखा, ‘प्रिय मित्रों, आगे बढ़ो और कभी अपने कदम पीछे मत खींचना। उठो और कभी निराश मत होना। सफलता अवश्य मिलेगी।’

वर्तमान समय में तो ‘निनताई’ शब्द का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है। आज युवाओं में असहनशीलता की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। युवा ‘निनताई’ के माध्यम से अपनी असहनशीलता को ‘सहनशीलता’ में प्रवृत्त कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें कोशिश करनी होगी कि जब भी कोई प्रोजेक्ट या काम बहुत अधिक थका दे, तो कुछ देर रुककर अध्यात्म की ओर मुड़ना। अपने अंतर्मन से ये संवाद करना कि श्रम और हिम्मत ही कार्य को पूर्ण कराते हैं। दर्द सहन करने की क्षमता को बढ़ाने के लिए नियमित व्यायाम करना और पौष्टिक भोजन का सेवन करना। सुबह-सवेरे उठकर प्रकृति के सान्निध्य में पक्षियों और पेड़ों को करीब से देखना। आंखें बंद कर अपनी आंतरिक क्षमता को मजबूत बनाना। सत्य के साथ आगे बढ़ना और निरंतर सीखने की इच्छा को जाग्रत रखना। सदैव दूसरों की मदद के लिए तैयार रहना।

उपरोक्त बातें प्रत्येक व्यक्ति की ‘निनताई’ यानी कि सहनशक्ति को बढ़ा देती हैं और उन्हें जोखिमों से लड़ने के लिए प्रेरित करती हैं। वही जीतता है जो जोखिम उठाने के लिए तैयार रहता है। जो जोखिमों से डरता है, वह कहीं नहीं पहुंचता, उसे केवल उन साधनों से संतोष करना पड़ता है जो जोखिम उठाने वाले लोग छोड़ देते हैं।

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