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लोकतंत्र में कानून ही लोक की अंतिम उम्मीद

न्यायपालिका की गरिमा

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वर्ष के अंत में न्यायपालिका द्वारा अधीनस्थ न्यायालय के निर्णय पर पुनर्विचार और अरावली में खनन आवंटन पर पर्यावरण को सर्वोपरि मानकर विचार करने से जनता आश्वस्त हुई है कि भारतीय लोकतंत्र में अन्याय के प्रतिकार के मार्ग सदैव खुले रहते हैं।

भारत की न्यायपालिका की परंपरा अत्यंत गरिमापूर्ण रही है। लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करते हुए उसने हाल के दिनों में भी वैसा ही आचरण किया है, जैसा एक स्वतंत्र न्यायपालिका से अपेक्षित होता है। किसी अधिनायकवादी देश में यह कल्पना भी कठिन है कि सर्वोच्च न्यायालय अपने ही निर्णय पर पुनर्विचार करे या निचली अदालत के आदेश को गलत मानकर उसमें संशोधन करे। भारत में यह संभव हुआ है, जो लोकतंत्र की मजबूती को दर्शाता है। यहां देर-सबेर जनता की आवाज सुनी जाती है। सरकारी फैसले, जो लोगों को पीड़ित, क्रुद्ध या उन्हें आक्रोशित करते हैं, तो सरकार भी जनभावनाओं के अनुरूप अपने निर्णय बदलती है। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की सच्ची पहचान और सामूहिक प्रगति का मार्ग है।

हम यहां किसान आंदोलन की चर्चा नहीं करेंगे, जिसके बारे में सरकार ने उनके लंबे धरनों के बाद किए गए फैसले वापस ले लिए। हम पंजाब यूनिवर्सिटी की बात भी नहीं करेंगे, जिसके संबंध में केंद्र ने पंजाबियों की भावनाओं को समझते हुए अपना फैसला बदल दिया। ऐसे में पंजाब यूनिवर्सिटी हमेशा की तरह पंजाब की शान बनी रही।

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नवीनतम फैसलों की चर्चा करें तो सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पर्वत शृंखला में खनन से संबंधित अपने पूर्व आदेश पर पुनर्विचार का निर्णय उल्लेखनीय है। न्यायालय को यह आशंका हुई कि खनन आवंटन और अरावली के संरक्षण के बीच संतुलन न बिगड़ जाए, इसलिए विशेषज्ञों से पुनः विचार कर नया फैसला देने का निर्णय लिया गया। यह न्यायपालिका की पर्यावरणीय संवेदनशीलता और लोचशीलता को दर्शाता है।

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इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य आदेश ने भारतीय लोकतंत्र में सबकी बात सुने जाने की गरिमा को पुनः स्थापित किया। यह मामला उत्तर प्रदेश के पूर्व विधायक कुलदीप सेंगर से जुड़ा है, जिसकी जमानत को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। वर्ष 2017 के उन्नाव कांड में पीड़िता और उसके परिवार पर हुए अमानवीय अत्याचार, धमकियां और हिंसा ने पूरे देश को झकझोर दिया था। पीड़िता और उसके पिता ने न्यायालय से न्याय की गुहार लगाई। इसके पहले, बाहुबली ने लालच देकर उन्हें लोकलाज का भय दिखाकर चुप रहने के लिए दबाव डाला। इसके बाद पीड़िता के पिता को कुछ मामलों में फंसाकर हिरासत में रखा गया, उनकी मारपीट करवाई गई, और इसी कारण उनकी मृत्यु हो गई। इस बाहुबली ने 23 दिसंबर, 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट से जमानत प्राप्त कर ली थी। दलील दी कि वह एक जनसेवक है और पहले ही इस मामले में पांच साल की सजा भोग चुका है। पीड़िता के भय का अंत नहीं हुआ, क्योंकि बाहुबली रिहा हो गया था। लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत पर रोक लगाकर सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि कानून से ऊपर कोई नहीं और पीड़ित के भय का अंत करना न्याय की मूल शर्त है।

देशभर में इस फैसले का स्वागत किया गया, क्योंकि बाहुबली के सामने निर्बल पीड़ितों की आवाज सुनी गई। ऐसी घटनाएं केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही संभव हैं। बार-बार यह सिद्ध हुआ है कि भारतीय लोकतंत्र अंततः अपनी गरिमा स्थापित करता है। यहाँ विपक्ष की आवाज सुनी जाती है और पीड़ितों व वंचितों के हितों पर ध्यान दिया जाता है। जातिगत जनगणना इसका उदाहरण है। लंबे समय से विपक्ष इसकी मांग कर रहा था, क्योंकि 2011 के बाद यह नहीं हुई थी। 2026 में प्रस्तावित जनगणना से पहले ही केंद्र सरकार ने स्वयं जातिगत जनगणना कराने का निर्णय ले लिया।

भारतीय समाज एक खुला समाज है। जब भी कोई त्रुटि या प्रवंचना सामने आती है, सरकार—चाहे कोई भी हो—उसका संज्ञान लेकर निर्णय बदलने से नहीं हिचकती। सामान्यतः न्यायपालिका के निर्णय अंतिम माने जाते हैं, किंतु जहां आवश्यक हुआ, वहां सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल बाहुबली की सजा निलंबन पर रोक लगाई, बल्कि अपने ही निर्णयों पर पुनर्विचार करने का साहस भी दिखाया। इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाया गया। संविधान के प्रति प्रतिबद्धता पर हाल के चुनावों में सत्ता और विपक्ष दोनों एकमत दिखाई दिए। वर्ष के अंत में न्यायपालिका द्वारा अधीनस्थ न्यायालय के निर्णय पर पुनर्विचार और अरावली में खनन आवंटन पर पर्यावरण को सर्वोपरि मानकर विचार करने से जनता आश्वस्त हुई है कि भारतीय लोकतंत्र में अन्याय के प्रतिकार के मार्ग सदैव खुले रहते हैं।

लेखक साहित्यकार हैं।

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