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बेरोजगारी भी बढ़ा सकता है खाद्य पदार्थों का आयात

ऐसे समय में जब घरेलू खेती पहले से ही संत्रास में है, किसानों को मंडियों में घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी से 30 से 40 फीसदी कम दाम मिल रहे हैं, भारत के विशाल बाज़ार को सस्ते और बहुत...

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ऐसे समय में जब घरेलू खेती पहले से ही संत्रास में है, किसानों को मंडियों में घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी से 30 से 40 फीसदी कम दाम मिल रहे हैं, भारत के विशाल बाज़ार को सस्ते और बहुत ज़्यादा सब्सिडी वाले खेती उत्पादों के लिए और खोलने से खेती-बाड़ी पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।

शेक्सपियर के नाटकों में द्वंद्वात्मक कथानक की तरह, एक बड़ी दुविधा यह है कि किस पर विश्वास करें और किस पर नहीं। जहां एक ओर अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक रोलिंस ने भारत के साथ एक बढ़िया व्यापार संधि -‘अमेरिकी किसानों के लिए फायदेमंद है’- के लिए अपने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को धन्यवाद दिया है, तो वहीं दूसरी तरफ भारतीय वाणिज्य मिनिस्टर पीयूष गोयल ने भी अमेरिका के साथ ‘ऐतिहासिक संधि’ के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की है और दोहराया है कि यह करते वक्त भारत के संवेदनशील कृषि एवं डेयरी क्षेत्र को सुरक्षित रखा गया है।

क्या यह दोनों लोकतंत्रों के लिए ‘परस्पर जीत’ वाली स्थिति है या यह जोर-जबरदस्ती और मनमानी का नतीजा है, इसकी पुष्टि तो विवरण से ही हो पाएगी। लेकिन जो बातें सार्वजनिक तौर पर चली हुई हैं, उन्होंने पहले ही देशभर की किसान यूनियनों की रीढ़ में सिहरन की लहर दौड़ा दी है। उनके पास ऐसी चिंता करने के लिए पर्याप्त कारण भी हैं।

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ऐसे समय में जब घरेलू खेती पहले से ही संत्रास में है, किसानों को मंडियों में घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी से 30 से 40 फीसदी कम दाम मिल रहे हैं, भारत के विशाल बाज़ार को सस्ते और बहुत ज़्यादा सब्सिडी वाले खेती उत्पादों के लिए और खोलने से खेती-बाड़ी पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। अमेरिकी किसानों को पहले से ही हर साल भारी सब्सिडी मिलती है, जो कि तकरीबन 66,314 डॉलर प्रति किसान वार्षिक जितनी है (एग्रीकल्चरल रिसोर्स मैनेजमेंट सर्वे, 2020), यह उन्हें उतार-चढ़ावों से बचाती है। इसके अलावा, अमेरिकी प्रशासन वर्ष 2026 में फार्मर्स ब्रिज असिस्टेंस प्रोग्राम (एफबीए) के तहत किसानों को होने वाले प्रति एकड़ नुकसान की भरपाई हेतु 12 बिलियन डॉलर की मदद उत्पाद भुगतान मद के तहत देने की योजना बना रहा है। ट्रंप ने इसको ‘वन बिग ब्यूटीफुल बिल’ का नाम दिया है।

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ऐसे में जब अमेरिका भारत व्यापार संधि के विवरण का अभी इंतज़ार है, अमेरिका और भारत, दोनों पक्ष बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं। ब्रुक रोलिंस ने तो सोशल मीडिया पर यह तक कह डाला है कि इस समझौते से ‘भारत के विशाल बाज़ार को अमेरिकी कृषि उत्पादों का अधिक निर्यात हो पाएगा, जिससे कीमतें ऊपर उठेंगी और ग्रामीण अमेरिका में अधिक नकदी आएगी’। यह कथन मोटे तौर पर व्यापार समझौते की शर्तों के मुताबिक है, जिसका जिक्र ट्विटर पर अपनी पोस्ट में अमेरिकी राष्ट्रपति ने किया था कि अमेरिका में आयात होने वाले भारतीय उत्पादों पर टैरिफ 50 से घटाकर 18 परसेंट कर दी गई है और भारत में नॉन-टैरिफ बैरियर हटाने के अतिरिक्त अमेरिकी निर्यात पर आयात कर शून्य कर दिया गया जाएगा। इस बीच, भारत के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान किसानों को भरोसा दिला रहे हैं कि यह समझौता किसानों के हितों को ‘सुरक्षित’ रखने के बाद ही किया गया है।

इन भरोसे के बावजूद, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की खबर ने पहले ही किसान समुदाय को परेशान कर डाला है। भारत सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए, जो कोई अन्य जानकारी देने से बच रही है, कई किसान नेताओं ने शक जताया है कि क्या किसानों के हितों की रक्षा में वास्तव में हुई है। संयुक्त किसान मोर्चा ने एक बयान में चेतावनी दी है कि आयात शुल्क शून्य होने से सस्ते आयातित उत्पादों की बाढ़ आ जाएगी, और इसलिए 12 फरवरी से नए विरोध प्रदर्शनों की धमकी दी है। किसान नेताओं का कहना है कि प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन 2020-21 के विरोध प्रदर्शनों की तर्ज पर होंगे।

किसान समुदाय को इस बात का भी गुस्सा है कि बजट-2026 में कृषि आय को बढ़ाने के लिए ज़रूरी उपायों पर ज़्यादातर चुप्पी रही है, और पहले से ही संकट झेल रहे कृषि क्षेत्र की रक्षा के लिए लाल लकीर कहां खींची जाए, इस पर किसानों से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया है। इसके अलावा, सबसे अमीर व्यापारिक समूह, ऑर्गेनाइज़ेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि भारतीय किसानों को 2000-01 और 2024-25 के बीच कुल मिलाकर 111 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, लिहाजा किसानों के लिए एक और बड़ा झटका सहना मुश्किल होगा। हिमाचल प्रदेश में सेब बागवान संघ के अध्यक्ष हरीश चौहान ने चेतावनी दी है ‘यह असहाय किसान समुदाय पर बड़े हथौड़े की मार जैसा होगा’।

उन्होंने डर जताया कि यूरोपियन यूनियन और न्यूज़ीलैंड के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते की वजह से सेब को जिस स्तर पर भारतीय बाजार में घुसपैठ मिल गई है, वह अभूतपूर्व है, जिसकी वजह से पहाड़ी राज्यों में सेब उद्योग को भय सता रहा है कि उसका अंत व्यवस्थात्मक ढंग से होने वाला है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिकी सेब को शून्य आयात शुल्क पर आने की इजाज़त दी गई, तो पहाड़ी राज्यों की सेब आर्थिकी बर्बाद हो जाएगी। उधर, कपास, सोया और प्याज उगाने वाले किसान पहले से ही कुछ सालों से कम कीमतों से जूझ रहे हैं, और शून्य आयात शुल्क की वजह से बाजार में सस्ती आयातित उत्पाद आने से भारतीय किसानों के फसल के दाम और गिरने की आशंका है। यह स्थिति अंततः उन्हें खेती छोड़ने को मजबूर कर देगी।

हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति हर साल 500 बिलियन डॉलर मूल्य का अमेरिकन निर्यात होने की बात कह रहे हैं, जिसमें ऊर्जा, तकनीक, कोयला और खेती के अलावा दूसरे क्षेत्र शामिल हैं, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि निर्यात का यह आंकड़ा शायद अगले 5 सालों का है यानी 100 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका से होने वाले सकल निर्यात में कृषि उत्पाद, डेयरी और उससे जुड़े क्षेत्र ही शामिल होंगे। जबकि, हमारे यहां होने वाले आयात में सबसे बड़ा हिस्सा अनाज, कॉटन, दालें, प्याज़, सोयाबीन और कई तरह की वाइन, शराब, फल, सब्जियां, बादाम और दूसरे मेवों का रहने की उम्मीद है। सूचना के अनुसार, कुछ चीज़ें, मसलन कपास, दालें और प्याज़ में ‘कोटा एक्सेस’ प्रावधान होगा। लेकिन यह चेतावनी है कि खाद्य पदार्थ आयात करना बेरोजगारी की आमद जैसा है।

कपास का ही मामला लें। सितंबर और दिसंबर, 2025 के बीच कपास आयात पर 11 फीसदी शुल्क हटाने से सस्ते कपास की आमद हुई, जिससे घरेलू कीमतें गिर गईं। जहां कपड़ा उद्योग कम दाम से खुश था, वहीं किसानों को नुकसान उठाना पड़ा। तीन महीनों में ही आयात 30 लाख गांठें बढ़ गया और भारतीय कपास का दाम 1,000 रुपये से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर गया। इसके अतिरिक्त, चूंकि समझौते के अनुसार नॉन-टैरिफ बैरियर हटाने होंगे, और भारत में इस श्रेणी में आते उत्पादों की संख्या कुछ सौ है, ऐसे में भारत अमेरिकी दूध आयात से उपभोक्ता को कैसे दूर रख पाएगा, जिसके बारे में बताया जा रहा है कि अमेरिकी गायों की खुराक में ब्लड-मील और अन्य मांसाहारी अवयव डाले जाते हैं।

असल में, ट्रंप जिस तरह विकासशील देशों के गले से नयी व्यापार व्यवस्था उतार रहे हैं और यूरोपियन यूनियन पर भी नज़र रख रहे हैं, वह विश्व व्यापार संगठन के नियमों का उल्लंघन है। 1995 में यह संस्था बनने के बाद से अमेरिका जो हासिल नहीं कर पाया था, अब उसे बांह मरोड़कर पाने का इंतजाम कर लिया है। दबाव में आकर राष्ट्रों के झुकने से, एक नई विश्व व्यवस्था बन रही है। ‘शक्तिशाली सदा सही होता है’ वाली हिमाकत कब तक चलेगी, यह तो वक्त ही बताएगा।

लेखक कृषि एवं खाद्य मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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