दुनिया के सबसे बड़े संग्रहालय, ‘युगे-युगीन भारत’ की पहली गैलरी साल के आखिर तक खुल जाएगी। इसी कड़ी में दिल्ली में प्रधानमंत्री संग्रहालय व अयोध्या में भारतीय मंदिर वास्तुकला संग्रहालय का निर्माण भी हो रहा है, जो सांस्कृतिक तौर पर महत्वाकांक्षी परियोजनाएं हैं। जरूरी है कि सरकारें देश में ऐसी सभी गौरवपूर्ण सांस्कृतिक धरोहरों पर एक समान ध्यान दें।
भारत भले ही अपने सबसे महत्वपूर्ण विदेशी भागीदार, अमेरिका के साथ राजनीतिक द्वंद्व में उलझा हो, जबकि अर्थव्यवस्था, जैसा कि जाने-माने वित्तीय पत्रकार टीएन नाइनन ने पिछले हफ्ते की शुरुआत में इन कॉलम में बताया था -‘मिलनसार होने की बजाय शर्मीली ज्यादा’ है - लेकिन सांस्कृतिक ऊंचाइयों को भव्य पैमाने पर पेश करने की सरकार की ‘कभी हार न मानने वाली’ महत्वाकांक्षा जस-की-तस है। दुनिया के सबसे बड़े संग्रहालय, ‘युगे-युगीन भारत’ की पहली गैलरी साल के आखिर तक खुल जाएगी।
इसका पैमाना निश्चित रूप से बहुत विशाल है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आज तक के भारत की गाथा बताने वाली 1,00,000 कलाकृतियों को नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक की 30 दीर्घाओं में प्रदर्शित जाएगा, लुटियंस दिल्ली में ब्रिटिश राज की ये इमारतें नौकरशाही के आला अधिकारियों का पिछले सौ सालों से कार्यस्थल रहा है। संग्रहालय में बारे में कुछ ऐसा है जो मोदी सरकार को खासतौर पर भाता है। शायद, बहुजन समाज पार्टी की दलित नेता मायावती की तरह — जिनके खुद के और उनके गुरु कांशी राम और बाबा साहेब अंबेडकर के स्मारक लखनऊ और दिल्ली के बाहरी इलाकों में जगह-जगह बने हैं-मोदी को ज्ञात होगा कि आप उनसे नफरत करें या प्यार, लेकिन स्मारकों को समय की परीक्षा झेलनी पड़ती है। (यही वजह है कि 1991 के आखिर में जब यह स्पष्ट हो गया कि सोवियत संघ बिखरेगा, तो प्रति-क्रांतिकारियों ने सबसे पहले लेनिन और मार्क्स की मूर्तियों पर ही हमला बोला था।) और इसीलिए, जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, पिछले 11 सालों में नई दिल्ली का स्वरूप धीरे-धीरे फिर से बदलकर नया रूप दिया जा रहा है।
प्रधानमंत्री संग्रहालय, जहां मोदी समेत हर विगत प्रधानमंत्री के लिए एक गैलरी होगी- जिसका ज़िक्र दिल्ली आने वाली शताब्दी ट्रेनों के पब्लिक एड्रेस सिस्टम पर होता है -से लेकर युगे-युगीन भारत तक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भाजपा का भारत के हृदय में एक खास यादगार बनाने की महत्वाकांक्षा का प्रदर्शन बेमिसाल है। प्रभावशाली तथ्य यह कि भाजपा के लिए कुछ भी छोटा नहीं। दिसंबर के आखिरी हफ़्ते में जालंधर में हुए हरिवल्लभ संगीत समारोह में, जिसने अपनी 150वीं सालगिरह मनाई है, संस्कृति मंत्री गजेंद्र शेखावत नहीं आ पाए – इसलिए उन्होंने एक वीडियो संदेश भेजा जिसमें कहा कि सरकार को देश के सबसे पुराने संगीत समारोह के लिए एक ऑडिटोरियम बनाने में खुशी होगी। तालियों के बीच जो अनकहा संदेश संलग्न था, वह यह कि बीजेपी पंजाब की लुप्त हो रही विरासत को पुनर्स्थापित करने में मदद हेतु कुछ भी करेगी– और अगर पंजाब के लोग उसे वोट देकर यह एहसान चुकाते हैं, तो इससे ज़रूर मदद मिलेगी।
इसीलिए दिल्ली में प्रधानमंत्री द्वारा हाल ही में उद्घाटन की गई पिपरहवा बुद्ध अवशेषों की प्रदर्शनी में रखी वस्तुओं के विवरण पर बहुत कम ध्यान दिया देखकर हैरानी हुई। जो लोग इसकी पृष्ठभूमि नहीं जानते, उनके लिए बता दें कि औपनिवेशिक ब्रिटिश हुकूमत के एक इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने 1898 में बर्डपुर एस्टेट के तहत आते पिपरहवा नामक गांव में कुछ रत्न, गौतम बुद्ध के अस्थि अवशेष और राख वाले पांच छोटे कलश खोज निकाले थे, नेपाल सीमा के दक्षिण में कई एस्टेट्स का प्रबंधन उनके जिम्मे था। साल 2025 में, जब पेप्पे के वंशजों ने हांगकॉन्ग में अपने पास रखे बुद्ध अवशेषों की नीलामी करने का फैसला किया, उससे देशभर में खलबली मची, तत्पश्चात केंद्र सरकार ने गोदरेज इंडस्ट्रीज के साथ मिलकर रत्नों व अवशेषों को खरीदने और वापस मातृभूमि लाने का फैसला किया।
प्रधानमंत्री ने उस समय कहा था : ‘यह हर भारतीय को गौरवान्वित महसूस कराएगा कि भगवान बुद्ध के पवित्र पिपरहवा अवशेष 127 साल लंबे अरसे बाद घर (भारत) वापस आ गए हैं…’। निश्चित ही, भारत को एक प्राचीन सभ्यता, सिंधु घाटी, और एक प्राचीन विचारधारा,बौद्ध धर्म के सही उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करने की महत्वाकांक्षा देखना प्रभावशाली है।
वहां पर वही थे, आपके सामने एक बुलेटप्रूफ केस में, शानदार रत्न। उन्हें निहारते हुए आप ‘चांदी और सोने में उकेरे तारे, तश्तरियों में सोने की पत्तियों में उभरे बौद्ध प्रतीक और नाना आकार के मोती…, मनके, लाल या सफेद कार्नेलियन, एमेथिस्ट, पुखराज, गार्नेट, मूंगा और क्रिस्टल पर तराशकर बनाए तारे और फूल’–यह सारी जानकारी ‘डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट पिपराहवा डॉट कॉम’ से लेनी पड़ी क्योंकि प्रदर्शनी में यह सब जानकारी उपलब्ध नहीं, न तो वहां मौजूद युवा किंतु खुद अनभिज्ञ स्वयंसेवक बता पाए और न ही प्रदर्शनी की आयोजक डिज़ाइन फैक्ट्री इंडिया (डीएफआई) नामक कंपनी दे पाई। गौरतलब है कि उक्त कपंनी अपनी मशहूरी इस दावे के आधार पर करती है कि उसने वड़नगर में नगर का ‘बुद्ध से नाता’ थीम पर एक संग्रहालय बनाया है, और भुज में 2001 के भूकंप की याद में एक संग्रहालय भी बनाया है।
प्रदर्शनी में बुद्ध को जीवंत करती शानदार मूर्तियां भी रखी गईं, जिन्हें कोलकाता के भारतीय संग्रहालय, दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय म्यूज़ियम और देश के अन्य कई संग्रहालयों से लाया गया है। इनमें से कई मूर्तियां कभी खैबर-पख्तूनख्वा के उन हिस्सों से आई थीं, जो अब पाकिस्तान में हैं, सिवाय इसके कि सूचना पट्टी पर ‘पाकिस्तान’ शब्द को ‘अविभाजित भारत’ से बदल दिया गया है। कुछ पेंटिंग्स ‘रिक्रिएटिड’ - जिसका मतलब है वे जिस संग्रहालय में रखी थीं, वहां उनकी हालत इतनी खस्ता हो गई कि उन्हें दूसरी जगह ले जाना संभव नहीं।
अब हज़ार साल पुरानी मूर्तियों को गौर से देखने पर आपको भान होता है कि उन्हें साफ किया गया है –दशकों की जमी धूल,गंदगी हटाने के बाद वे इतनी चमक रही थी। डीएफआई आपकी इस परिकल्पना की पुष्टि करती है। उम्मीद करें कि सफाई करने वालों ने यह करने में उच्च गुणवत्ता वाले द्रवों का इस्तेमाल किया होगा जो आगे चलकर पत्थर का क्षरण न करे- यह प्रक्रिया क्या थी, जानकर अच्छा लगेगा। गोदरेज इंडस्ट्रीज और सरकार के बीच इस प्रकार का पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल भविष्य के लिए एक मॉडल है। हालांकि, साफ नहीं कि क्या गोदरेज वालों ने रत्न अवशेष देश को दान कर दिए हैं या सरकार ने उन्हें खरीद लिया है।
ऐसे में जब दिल्ली के बीचोंबीच युगे-युगीन भारत संग्रहालय आकार ले रहा है, जोकि प्रधानमंत्री के नए आवास से कुछ ही दूरी पर है और जिसका निर्माण कार्य पूरा होने जा रहा है, अपनी दृष्टि अयोध्या पर डालें, जहां राम मंदिर से सटा भारतीय मंदिर वास्तुकला पर एक संग्रहालय बनाया जा रहा है। यह निजी भागीदारी वाली परियोजना है, लेकिन सरकार इस पर निगाह रखे है। इसकी शानदार परिकल्पना वास्तुकला कंपनी ज़ाहा हदीद आर्किटेक्चरल कंसर्न की है –हालांकि युगे-युगीन भारत संग्रहालय बनाने का ठेका इस कंपनी ने देबाशीष गुहा के आर्कोप कॉन्सोर्टियम व लॉस एंजिल्स स्थित कुलपत यंत्रसास्त के हाथों गंवाया है–जबकि परियोजना को फंडिंग टाटा की सहायक कंपनी इकोफर्स्ट कर रही है।
चलिए अब चंडीगढ़ में अपने घर वापसी करते हैं और इसलिए सेक्टर 10 में सरकारी म्यूज़ियम का एक और दौरा अनिवार्य हो गया, जहां पर बुद्ध की गांधार प्रतिमाएं भी प्रदर्शित हैं - जिन्हें भारत आज़ाद होने पर लाहौर संग्रहालय के साथ आधा-आधा बांटा गया - सिर्फ यह देखने को कि क्या बदलाव की बयार देश के इस हिस्से तक पहुंची है या नहीं। आप अब भी वहां रखे रजिस्टर में अपना नाम लिखते हैं, ठीक वैसे ही जैसे सचिवालय में किसी नौकरशाह से मिलने जाने पर–मानो प्रवेश के लिए संग्रहालय का टिकट काफी न हो। संग्रहालय अभी भी सुनसान है। मिनिएचर गैलरी में रखी कुछ चीज़ों को हटा दिया गया है क्योंकि छत की मरम्मत हो रही है, लेकिन वह काम रुका हुआ है क्योंकि ऐसा लगता है कि फंड खत्म हो गया।
जैसा कि ला-कॉर्बुज़िए ने कभी कहा होगा... ‘जितना ज़्यादा कुछ चीज़ें बदलती हैं, उतनी ही कुछ दूसरी चीज़ें जस की तस रहती हैं।’
लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।

