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वॉशिंगटन में भारतीय हितों की रक्षा के निहितार्थ

द ग्रेट गेम

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भारत को जरूरत है आसान शर्तों वाले अमेरिकी बाज़ार की, उन्हें भी हमारी है। बहरहाल, भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कथित तौर पर व्यापार समझौता करवाने व भारत को पैक्स सिलिका में शामिल कराने में भूमिका निभाई। वहीं विदेश मंत्री मार्को रुबियो समझौते का ड्राफ्ट तैयार कर रहे हैं, जिसमें बाज़ार खोलने की बात है।

अमेरिका में हमारा आदमी वह नहीं है जिसके बारे में आप अंदाजा लगा सकते हैं, दरअसल, वह उनका सहयोगी है यानि भारत में अमेरिका के राजदूत, सर्जियो गोर। यह शख्स बहुत ज्यादा रोचक है। वे 1986 में उज़्बेकिस्तान के ताशकंद में, बतौर पूर्व सोवियत यूनियन नागरिक पैदा हुए थे (नाम सर्जियो गोरोखोव्स्की रखा गया); एक दशक के अंदर उनका परिवार अमेरिका चला गया, जहां उन्होंने अपना सरनेम छोटा कर लिया।

उम्र के चालीस साल पूरे करने से पहले ही श्रीमान गोर न केवल दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नज़दीकी बने हुए हैं, बल्कि ऐसा लगता है कि व्हाइट हाउस तक पहुंचने वाले रास्ते की मुश्किलें आसान बनाने में वे भारत की हर संभव मदद कर रहे हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो मेरी बात याद रखिए, अगले गणतंत्र दिवस पर वे एक उच्च पद‍्म सम्मान के पक्के दावेदार होंगे।

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अब श्रीमान गोर की शोहरत का दावा सिर्फ़ उस धमाकेदार खबर पर नहीं टिका है, जो उन्होंने बीते शुक्रवार दिल्ली में ब्रेक की थी, अर्थात, प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की बहुत जल्द भेंट हो सकती है; यह देखते हुए कि ट्रंप ने अभी हाल ही में कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ‘11 बहुत महंगे’ लड़ाकू जेट मार गिराए गए थे, भारत निश्चित रूप से इस पर नज़र रखेगा। माना जाता है कि गोर ने भारत के विरुद्ध अड़ियल रवैया अपनाए बैठे अमेरिकी प्रशासन को अंततः व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मनाया है - और भारत को 50 फीसदी टैरिफ की मुसीबत से राहत दिलवाई है, भले ही हम 5,000 साल पुरानी सभ्यता के वारिस हैं।

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इसके अलावा, कहा जा रहा है कि उन्होंने एआई और महत्वपूर्ण खनिजों के मामले पर भारत को अमेरिका के नेतृत्व वाले वैश्विक संगठन, ‘पैक्स सिलिका’ में प्रवेश पाने में भी मदद की है; मत भूलिए कि अमेरिकियों ने दो महीने पहले, दिसंबर में, इसी संगठन में भारत के लिए दरवाज़े बंद करवा दिए थे। (तो हृदय परिवर्तन की वजह क्या है?)

अब आप दलील देंगे कि यह सब तो आमतौर पर होता रहता है, कि यह तो गोर का काम है कि वह स्थानीय लोगों, मतलब हम भारतीयों के साथ ,तालमेल बनाकर रखें – और यहां पर मैं यह शब्द सोच-समझकर सलाह के रूप में उपयोग कर रही हूं, क्योंकि आपने अब तक वह पढ़ लिया होगा जो गोर के काफी ताकतवर साथी, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने एक हफ्ते से भी कुछ पहले म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में कहा था। यह भाषण ‘ईसाई आस्था’ और ‘पश्चिमी सभ्यता’ जैसे विशेषणों से भरा हुआ था– और कक्ष में मौजूद सभी राजनेता, जिनमें से अधिकांश गोरे थे, उन्होंने जोश में तालियां बजाईं। यह और बात है कि इन्हीं में से कई लोग लगातार अलग-अलग रंगों की त्वचा वाले लोग– भूरे, काले, पीले– जोकि भारत और चीन जैसे तीसरी दुनिया के देशों में रहते हैं, उनके साथ व्यापार समझौते करने की कोशिशें कर रहे हैं, क्योंकि बाजार वहीं पर हैं। म्यूूनिख में रुबियो के अनुसार, ‘हमें अपनी राष्ट्रीय सीमाओं पर भी नियंत्रण करना होगा। यह नियंत्रण कि कौन और कितने लोग हमारे देशों में आते हैं, यह कोई ज़ेनोफ़ोबिया (परदेसियों का भय) दिखाना नहीं है। यह नफ़रत नहीं है। यह राष्ट्रीय प्रभुसत्ता का एक बुनियादी काम है’।

आपको क्यूबाई मूल के अमेरिकी की अमेरिका के झंडे ‘स्टार्स एंड स्ट्राइप्स’ को लहराने की तीव्र या कुछ हद तक बेताब इच्छा की खातिर अवश्य ही तारीफ करनी होगी, किंतु विडंबना पर ध्यान दें। मार्को का क्यूबाई नागरिकता वाला परिवार उस वक्त तक अमेरिकी नागरिक नहीं बना था, जब 1971 में वे पैदा हुए थे। लेकिन, एक ताकतवर अमेरिकी विदेश मंत्री श्रीमान रुबियो ऐसा रुख अपना रहे हैं जो भविष्य के सुंदर पिचाई जैसों को अमेरिका में पैर जमाने की कोशिश करने में अड़चन बनेगा ( भारत अपने ‘सुंदर पिचाइयों’ को घर पर ही क्यों नहीं रोककर रख सकता है, यह एक अच्छा और अलग सवाल है)।

फिर मुक्त व्यापार की वह दलील जिसे पश्चिमी जगत सोवियत यूनियन के पतन और शीत युद्ध खत्म होने के बाद से आगे बढ़ा रहा है — यह मानना पड़ेगा कि इसी ने भारत को अपनी जटिल नीति में सुधार करने और वैश्विक स्तर पर मुकाबला करने के लिए मजबूर किया था — और दक्षिणी गोलार्ध के मुल्कों ने अपने बाजार खोलने की एवज में, श्रमिकों के मुक्त आवागमन की मांग की थी। अर्थात सबसे काबिल लोगों को उस जगह पर जाने की मुक्त आवाजाही की सहूलियत होनी चाहिए जहां जॉब्स हो ; महज पासपोर्ट के रंग के आधार पर उनके साथ भेदभाव न हो। क्योंकि पिछले साल ट्रंप ने मुक्त व्यापार की दलील को निरस्त कर दिया था, अब उनके विदेश मंत्री नए समझौते के प्रारूप को अंतिम रूप दे रहे हैं — हमारे सामान के लिए अपना बाज़ार खोलो, लेकिन हमसे यह उम्मीद मत रखो कि तुम्हारे लोगों की नौकरियों के लिए हम अपनी अर्थव्यवस्था खोलेंगे।

रुबियो के म्यूनिख वाले भाषण के सबसे खास हिस्से के लिए जरा रुकिए। ‘कोलंबस के युग के बाद से, 1945 में पहली बार, पश्चिम सिकुड़ रहा था… बड़े पश्चिमी साम्राज्य अपने पूर्ण पतन के दौर में पहुंच गए थे, जिसको नास्तिक वामपंथी आंदोलन और औपनिवेशीकरण विरोधियों ने और गति दी और आने वाले सालों में दुनिया के नक्शे के एक बड़े हिस्से को दरांती-हथौड़े वाले लाल झंडे से ढांप दिया’।

रुबियो की बातों से आपको गुस्सा आ सकता हैं, लेकिन बेहतर होगा कि गहरी सांस लेकर सोचें। कम से कम अब हम जानते हैं कि ट्रंप समर्थक असल में हमारे बारे में क्या सोचते हैं — एशिया और अफ्रीका भर में चले हमारे स्वतंत्रता आंदोलनों के बारे में, भारत की भांति उपनिवेश रहे देशों के लोगों द्वारा उन पश्चिमी ताकतों की सेवा में लड़े गए युद्धों के बारे में, जिन्हें उन्होंने अपनी बस्ती बना रखा था।

यह सोचना कि भारत उसी बोर्ड ऑफ़ पीस में शामिल होने पर विचार कर रहा है — जिसकी सदस्यता के लिए देशों ने 1 बिलियन डॉलर का भुगतान किया है — बीते शुक्रवार वाशिंगटन डीसी में हुई इसकी पहली बैठक में, ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से ‘खड़े होने’ के लिए कहा, जब उन्होंने एक बार फिर दर्शकों को यह कहानी सुनाई कि कैसे उन्होंने ही ऑपरेशन सिंदूर का पटाक्षेप करवाया था। बेचारे शहबाज़ शरीफ़! यहां एक अन्य विरोधाभास है कि यूके, फ्रांस और जर्मनी जैसी पुरानी औपनिवेशिक ताकतों ने ट्रंप के बोर्ड ऑफ़ पीस में शामिल होने से इनकार कर दिया है।

निश्चित रूप से, सर्जियो गोर का आपकी तरफ होना एक बढ़िया बात है — सभी देशों को दोस्तों की ज़रूरत होती है, खासकर जब ऑपरेशन सिंदूर के दावे हवा में छाएं हों — और मार्को रुबियो को जल्द ही आपके साथ भोजन यानी दोस्ती करने आना है (गोर ने बताया है कि वे जल्द दिल्ली आ रहे हैं), यह साबित करता है कि पूर्व में किसी के उपनिवेश रहे देशों को हमेशा उन संघर्षों पर गर्व होना चाहिए जो उन्होंने यहां तक पहुंचने के लिए लड़े हैं।

इसे आत्मनिर्भरता, गुट-निरपेक्षता, रणनीतिक स्वतंत्रता — आप चाहे जो भी नाम अपनी मर्जी से दें। सच तो यह है कि भारत को अमेरिकी बाजार की दरकार है (और इसके लिए शर्तें आसान होने की जरूरत है), लेकिन अमेरिकियों को भी भारत की ज़रूरत है। मोदी ट्रंप के साथ अच्छी तरह दोस्ती निभाएं, लेकिन साथ ही यह भी तय करना चाहिए कि इसकी कीमत क्या चुकानी पड़ेगी। जहां तक रुबियो की बात है, उन्हें हमेशा याद रखना चाहिए कि पुरानी कॉलोनियों की याद‍्दाश्त बहुत होती है। म्यूनिख में कोलंबस का उनका ज़िक्र असल में अधूरा था। कोलंबस ने भले ही अमेरिका को ‘खोजा’ हो, लेकिन असल में वे खोजने भारत को ही निकले थे।

लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।

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