बदलती परिस्थितियों में भारत-बांग्लादेश संबंध काफी महत्वपूर्ण हैं। शेख हसीना से जुड़े विवादों से ऊपर उठकर मौजूदा व्यवस्था में बांग्लादेश के नए सियासी नेतृत्व से संबंध मजबूत करने चाहिए। ढाका में चीन और पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव के चलते यह और भी जरूरी है। ऐसे में संवाद प्रक्रिया के बीच प्रधानमंत्री मोदी की हालिया पहल सकारात्मक कही जाएगी।
बांग्लादेश के नए राष्ट्रपति मिर्जा फ़ख्र-उल-इस्लाम आलमगीर, जो कभी वामपंथी विचारधारा की ओर झुकाव रखते थे, मार्च 1971 में 23 साल के थे और उस वक्त उत्तरी पूर्वी पाकिस्तान के ठाकुरगांव में अपने घर थे, जब उन्होंने सुना कि पाकिस्तानी सेना के अफसरों ने देश में ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू कर दिया है और निहत्थे बांग्लादेशी राष्ट्रवादियों, बुद्धिजीवियों व नेताओं का नरसंहार कर रहे हैं। दो दिन बाद, 27 मार्च को, आलमगीर व उनके दोस्तों ने रेडियो पर मेजर ज़िया-उर-रहमान को सुना जो पाकिस्तानी सेना में अधिकारी थे और चटगांव (तब चिट्टागोंग) में गुप्त जगह से शेख मुजीबुर्रहमान की ओर से आज़ाद बांग्लादेश बनाने की अपील कर रहे थे- यह संदेश बीबीसी व रेडियो ऑस्ट्रेलिया ने प्रसारित किया था।
मेजर ज़िया ने अपना भाषण खत्म करते कहा, ‘जॉय बांग्ला’! यह नारा पहली बार उन्होंने दिया जो आने वाले हफ़्तों व महीनों में आज़ादी का प्रतीक घोष बन गया- जहां इंदिरा गांधी और जॉर्ज हैरिसन जैसे राजनेताओं ने इसे पसंद किया वहीं याह्या खान और हेनरी किसिंजर ने नापसंद किया- इसने पूरे देश को भारत के साथ मिलकर ‘मुक्ति वाहिनी’ बनाने के लिए एकजुट किया, आगे चलकर साल के अंत तक भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ और बांग्लादेश आज़ाद हुआ।
अप्रैल, 1971 में ठाकुरगांव में हालात बिगड़ने लगे थे। हालांकि, सीमा पार महज़ 55 किमी दूर बिहार के किशनगंज ज़िले में भी,ठाकुरगंज नामक एक जुड़वां शहर है- आलमगीर और उनका परिवार शरणार्थियों के सैलाब के साथ नागर नदी पार कर भारत के पश्चिम दिनाजपुर ज़िले में आ गया। वहां, इस्लामपुर में, साइकिल रिपेयर करने वाले दिलीप ने परिवार को एक कमरे में सोने की जगह दी। ज्योति बसु के पश्चिम बंगाल और कर्पूरी ठाकुर के बिहार ने शरणार्थियों को कपड़े दिए, यूथ कैंपों में पुरुषों को ‘ट्रेनिंग’ दी। कुछ हफ़्ते बाद, इंदिरा गांधी सरकार भी इस अभियान में खुलकर शामिल हुई। अन्य लोगों से साथ आलमगीर को देहरादून में गहन ‘प्रशिक्षण’ दिया गया।
55 साल से ज़्यादा वक्त बाद, अगर ढाका के कुलीनों की मानें तो बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के वरिष्ठ नेता और वर्तमान में राष्ट्रपति आलमगीर ने प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान को, जो उन्हीं मेजर जिया के बेटे हैं जिनके ‘जॉय बांग्ला’ नारे ने बंगालियों में जोश भर दिया था - और इसी नारे पर कई चीज़ों के नाम पड़े, जिनमें सीमा पर बंगाल-बिहार-त्रिपुरा-असम सीमावर्ती इलाकों में बने सैकड़ों शरणार्थी कैंपों की वजह से भारत में फैला संक्रामक बुखार भी शामिल था –उनको सलाह दी है कि उन्हें प्रधानमंत्री मोदी से मिलने दिल्ली जाना चाहिए, भले ही शेख हसीना कुछ भी कहती रहें।
माना जाता है कि आलमगीर को एतराज है कि एक महिला, शेख हसीना, भले ही वे बंगबंधु की बेटी हैं और भारत के साथ उनके बहुत करीबी रिश्ते हैं, यह चीज़ भारत-बांग्लादेश रिश्ते को बंधक नहीं बना सकती। यह भी कि 1971 की आज़ादी की लड़ाई ने न केवल दोनों देशों के नेताओं के बीच बल्कि लोगों में भी गर्भनाल जैसा रिश्ता स्थापित किया था। फिलहाल, तारिक़ का 23-25 अगस्त का प्रस्तावित दौरा टाल दिया गया है, क्योंकि दोनों पक्ष बारीकियों पर विचार करने में लगे हैं। लेकिन बीतेे हफ़्ते बांग्लादेश द्वारा रुख कड़ा करने व तारिक़ के भारत दौरे को हसीना के प्रत्यर्पण की शर्त से जोड़ने के बाद, प्रधानमंत्री मोदी के सुलह वाले संदेश का महत्व बांग्लादेश नकार नहीं कर सकता। प्रधानमंत्री के लिए यह पहल भी जरूरी थी- तारिक़ को भेजे संदेश में उन्होंने कहा : ‘आप आइए, हम आपका ‘सम्मानजनक स्वागत’ करेंगे।’ उन्हें पता है कि शेख हसीना की 5 अगस्त की प्रेस वार्ता से तारिक़ नाराज़ हैं।
मोदी को जल्द ही समझ आ गया कि स्थिति को सिर्फ़ वही संभाल सकते हैं। बंगबंधु की बेटी और एक अति विशिष्ट हस्ती, जिन्हें अभी भी लगता है उन्होंने कुछ गलत नहीं किया, बेशक उनके पिता ने भारत को पाकिस्तान को दोफाड़ करने में मदद की थी, पर इससे रिश्तों को बंधक बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। दुनिया बदल चुकी है। बांग्लादेश फिर अनिश्चितता के भंवर में है, जहां चीन और पाकिस्तान जैसी शार्क मंडरा रही हैं। प्रधानमंत्री के तौर पर तारिक़ का पहला दौरा बीजिंग और कुआलालंपुर का रहा, न कि दिल्ली का। इतने दशक बाद भी, रावलपिंडी का सैन्य प्रतिष्ठान बांग्लादेशियों को डोरे डालने की कोशिश कर रहा है- ढाका में एक बार फिर से आईएसआई के जासूसों का जमावड़ा है।
निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री जानते हैं कि भारत के पूर्वी हिस्से को बचाकर रखना ज़रूरी है-यह न सिर्फ़ दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार है, बल्कि भारत के आठ पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा के लिए भी अहम है; जहां भारत के पांच राज्यों की सीमाएं बांग्लादेश से लगती हैं; पिछली बार जब 2001-2006 में बीएनपी की सरकार रही थी और तारिक़ की मां खालिदा ज़िया प्रधानमंत्री थीं, तब चटगांव में हथियारों का बड़ा जखीरा ऐन वक्त पर पकड़ा गया था।
यह भी अहसास है कि भारत के पड़ोस में उथल-पुथल है। मोहन भागवत और दत्तात्रेय होसबोले जैसे वरिष्ठ आरएसएस नेताओं द्वारा रिश्ते सुधारने की अपील के बावजूद पाकिस्तान के साथ रिश्ते ठंडेे हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री ने आखिर भारतीय राजदूत से मुलाकात की है, लेकिन चीन से संबंधों बारे धमकी भरे अंदाज़ में बातें करते रहते हैं। भूटान, श्रीलंका व मालदीव शांत हैं, लेकिन उन पर चीन का साया मंडरा रहा। ज़ाहिर, भारत बांग्लादेश को खोना गवारा नहीं कर सकता। उसे पुराने रिश्ते फिर मज़बूत करने के तरीके खोजने होंगे। साल 1971 और 2026 में बड़ा फ़र्क यह कि अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते बेहतर हुए हैं,यानी आज भारत न सिर्फ़ बांग्लादेश में बल्कि पड़ोस के सभी हिस्सों में अमेरिकियों संग मिलकर काम कर रहा है; जबकि 1971 में अमेरिका व पाकिस्तान में पक्की यारी थी।
शायद, प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका, चीन जैसी बड़ी ताकतों से सीखना चाहिए कि वे कैसे खेल खेलती हैं-वे एक ही समय में छोटे देशों के साथ भी संबंध बनाए रखते हैं और अपनी स्थिति भी सुरक्षित रखते हैं। वहीं, भारत की अनोखी सभ्यतागत मजबूती मांग करती है कि वह अपनी आर्थिक क्षमता से कहीं बढ़कर भूमिका निभाए, खासकर अपने पड़ोस में, जहां भाषा, धर्म, संस्कृति और जातीयता जैसे मुद्दे रिश्तों पर असर डाल रहे हैं और यह भारत के हितों को निरंतरता देते हैं। इसीलिए पीएम मोदी ने समझदारी दिखाई कि शेख हसीना को लेकर तारिक रहमान के नखरे नज़रअंदाज़ किए और फिलहाल इस विवादित मसले को एक तरफ कर रखा है, शायद ऐसा करने से समाधान जल्द निकल आए। संभवतः वार्ता में तय हो कि जब अपनी सार्वजनिक घोषणा के अनुसार शेख हसीना दिसंबर में बांग्लादेश लौटेंगी,तो उन्हें व उनके परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाए - और इस तरह भारत-बांग्लादेश के बीच बेहद महत्वपूर्ण रिश्ते कायम रहेंगे।
इसीलिए भारत और उसके सभी पड़ोसियों - काराकोरम से लेकर कॉक्स बाज़ार तक - के साथ रिश्ते कायम रखने की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए। हां, पड़ोसियों की ओर से ‘इंडिया फर्स्ट’ वाली भावना हो, तो भारत की तरफ से ‘नेबरहुड फर्स्ट’ की भावना होनी चाहिए, यानी खुले दिल से मदद करना। बेशक, इतने अलग-अलग किस्म का पड़ोस संभालना आसान नहीं। भरोसा बहाल करने में समय लगेगा। ‘अर्थशास्त्र’ के आधार पर, प्रधानमंत्री ने बांग्लादेश के साथ पहला कदम उठाया है। अब उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ना होगा।
लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।

