यह इच्छा अब भी ज़िंदा है कि किसी दिन, किसी फ़ाइल के आख़िरी पन्ने पर, हाशिये में ही सही, नाम आ जाए। ताकि कोई कह सके—हां, इस आदमी को सम्मान तो मिला था, फ़ाइल देर से ही सही, मिली तो थी।
ताउम्र इस बात का मुझे अफ़सोस रहेगा कि मेरे नाम को कभी भी किसी फ़ाइल ने अपने पन्नों में जगह नहीं दी। जबकि मैं हमेशा से ही वही सब कुछ करता आया हूं, जो अपना नाम चमकाने के लिए वे लोग करते हैं, जिनका नाम फ़ाइलों में बिना दस्तक दिए आ जाता है। एक अपना नाम है, जो अजगर की तरह कुंडली मारकर बैठा है—न आगे सरकता है, न पीछे हटता है, बस वहीं पड़ा रहता है।
मैं कोई यूं ही रास्ते से उठा आदमी नहीं हूं। पढ़ा-लिखा हूं। कवि हूं, साहित्यकार हूं। एक-दो संस्थाओं का पदाधिकारी भी रहा हूं। भाषण दे लेता हूं, लोग सुन भी लेते हैं। मंच से उतरते समय दो-चार लोग हाथ मिलाकर कहते भी हैं—‘बहुत अच्छा बोला।’ अख़बारों में कभी-कभार छप भी जाता हूं। यानी मान-सम्मान, पद, प्रतिष्ठा—सब कुछ है। बस एक ही कमी है और वही सबसे भारी—आज तक किसी फ़ाइल में नाम नहीं आया।
यह कमी नई नहीं है। बचपन से पीछा कर रही है। स्कूल में मास्साब ने कभी नहीं कहा—‘श्याम, तुमने अच्छा लिखा है।’ कॉलेज में भी नाम सूची के बीच कहीं दबा रह गया। नौकरी की, ईमानदारी से की, समय पर पहुंचा, समय पर लौटा, लेकिन फ़ाइल तो दूर, बॉस की ज़ुबान पर भी नाम नहीं चढ़ा। तब धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि कुछ नाम मेहनत से नहीं, माहौल से चमकते हैं।
इन दिनों तरह-तरह की फ़ाइलों की चर्चा रहती है। कुछ फ़ाइलें ऐसी भी होती हैं जिनमें नाम आने या न आने पर देशभर में बहस छिड़ जाती है। टीवी स्टूडियो गर्म हो जाते हैं, अख़बारों के पन्ने भर जाते हैं। सच क्या है, यह जांच का विषय होता है। मेरी विडंबना यह है कि मेरा नाम तो किसी बहस लायक फ़ाइल तक में भी कभी पहुंचा ही नहीं। न समर्थन मिला, न विरोध—सीधी-सी अनदेखी।
कई रातें इसी उधेड़बुन में कट गईं कि आख़िर नाम चमकता कैसे है। धीरे-धीरे यह समझ आया कि काम करने से नाम नहीं आता, काम रुकवाने से आता है। मैंने कभी काम नहीं रुकवाया। बैठकें समय पर शुरू हों, निर्णय समय पर हों—मैं इसी अपराध में लगा रहा। शायद यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी।
अब उम्र के इस मोड़ पर खड़ा होकर लगता है कि नाम चमकाने की भी एक उम्र होती है। वह उम्र निकल गई। मेरा नाम अब सम्मान की अलमारी में टंगा है—इस्त्री किया हुआ, साफ़-सुथरा, लेकिन कभी पहना नहीं गया।
फिर भी मन के किसी कोने में यह इच्छा अब भी ज़िंदा है कि किसी दिन, किसी फ़ाइल के आख़िरी पन्ने पर, हाशिये में ही सही, नाम आ जाए। ताकि कोई कह सके—हां, इस आदमी को सम्मान तो मिला था, फ़ाइल देर से ही सही, मिली तो थी।

