दहेज़ की समस्या शाश्वत रूप से हमारे समाज में व्याप्त है। समाज में अगर वर्ग भेद नहीं होता, सभी लोगों का आर्थिक स्तर एक सा होता तो शायद यह समस्या भी नहीं होती। पहले के युग में कम उम्र में बच्चों की शादियां कर दी जाती थीं। कम उम्र के लड़कों पर घर गृहस्थी की ज़िम्मेदारी डाल दी जाती थी। लड़कियों का पिता की सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं होता था इसलिए वे अपनी बेटी को विवाह के समय यथा सामर्थ्य इतना सामान दे देते थे कि उनकी गृहस्थी की गाड़ी सुचारु रूप से चल सके।
यह एक स्वस्थ परम्परा थी, लेकिन कालांतर में इसमें विकार आने लगे। अमीर घर की लड़कियों को मिलने वाली दहेज़ की राशि और सामान को देख-देख कर लोगों में अजब तरह की ईर्ष्या और होड़ की भावना पनपने लगी और दहेज़ लोभियों ने अपनी बहुओं को मायके से और पैसा और कीमती सामान लाने के लिए दबाव डालना शुरू किया। यातनाएं दी जाने लगीं। यह दहेज़ प्रथा का विकृत स्वरूप था। दहेज़ विरोधी कानून बने, बच्चों की शादी की उम्र भी बढ़ा दी गई, लेकिन दहेज़ के दानव से पीछा नहीं छूटा।
लड़कियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए नए क़ानून बने जिनमें पिता की सम्पत्ति में उसका भी बराबर का हिस्सा सुरक्षित किया गया लेकिन इसकी वजह से परिवार में ही आंतरिक विघटन और क्लेश का वातावरण बन गया। दोनों घरों में स्वामित्व का हक मिलने पर भी उसे दोनों जगहों से संत्रास झेलना पड़ता। इन सारी बातों के अलावा शादी विवाह में इतना दिखावा और फिजूलखर्ची का चलन हो गया कि औसत आमदनी के व्यक्ति के लिए ऐसी आडम्बरपूर्ण शादियां करना बिलकुल बस के बाहर हो गया। इस समस्या का निदान क़ानून बनाने से नहीं होगा। क़ानून तो पहले से मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन कहां होता है। इसके लिए समाज के विभिन्न वर्ग के लोगों को ही मिलजुल कर पहल करनी होगी।
निस्संदेह, शादियां सादगी के साथ होनी चाहिए। उपहारों के लेन देन का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। इस व्यवस्था से दहेज़ लोभी लोगों की मानसिकता में ज़रूर फर्क आएगा। जो खर्च वे स्वयं नहीं कर सकते उसके लिए बहू के घरवालों पर दबाव डालते हैं। शादियां सादगी से की जाएंगी तो बेवजह के दिखावे और शान शौकत के प्रदर्शन में किये जाने वाले खर्चों में भी कमी आएगी और इससे कई परिवारों को ज़रूर राहत मिलेगी।
साभार : सुधीनामा डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम

