धर्म के नाम पर न बांटने दिया जाये मनुष्यता को
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, ‘मैं चाहता हूं हिंदू और अच्छा हिंदू बने, मुसलमान और अच्छा मुसलमान बने, ईसाई और अच्छा ईसाई बने... यह और अच्छा बनने की प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए हमारे भीतर। यही ‘और अच्छा’ होना हमें अच्छा...
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, ‘मैं चाहता हूं हिंदू और अच्छा हिंदू बने, मुसलमान और अच्छा मुसलमान बने, ईसाई और अच्छा ईसाई बने... यह और अच्छा बनने की प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए हमारे भीतर। यही ‘और अच्छा’ होना हमें अच्छा मनुष्य बना सकता है। समझना हमें यह भी होगा कि दुनिया के सब धर्म अंततः हमें अच्छा इंसान बनने का ही संदेश देते हैं।
बहुत पुरानी बात नहीं है, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारत में पैदा होने वाले हर व्यक्ति को हिंदू कहकर देश की विविधता में एकता को रेखांकित किया था। अब फिर उन्होंने अमेरिका के न्यूयॉर्क में कहा है कि जो हिंदू यह मानता है कि मुसलमानों को भारत से बाहर कर देना चाहिए, वह हिंदू नहीं रह सकता। भागवत का यह कथन तब और महत्वपूर्ण बन जाता है, जब हम यह देखते हैं कि भारत में उनके अनुयायी बात-बात पर भारत के मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने की बात करते हैं, उनके सामाजिक बहिष्कार की बात करते हैं। ऐसे में यह सवाल तो उठता ही है कि उनकी किस बात पर विश्वास किया जाए— हिंदुओं और मुसलमानों के डीएनए के एक होने वाली बात पर या मुसलमानों को पाकिस्तान भेजे जाने वाली बात पर?
विविधता में एकता का संदेश भारत की एक पहचान है। शायद ही दुनिया का कोई और देश होगा, जहां इतने सारे धर्मों को मानने वाले साथ मिलकर रहते हैं। लेकिन हमारी एक सच्चाई यह भी है कि धर्म के नाम पर ही आए दिन मनुष्यता को बांटने की कोशिशें होती हैं। संघ के मुखिया मोहन भागवत के ही कई संगी-साथी आए दिन मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक होने का अहसास कराते दिखते हैं।
यह सही है कि 1947 में देश का विभाजन धर्म के नाम पर ही हुआ था, पर उतना ही बड़ा सच यह भी है कि नए भारत के संविधान-निर्माताओं ने भारत को हिंदू राष्ट्र नहीं माना था। किसी भी धर्म को मानने वाला क्यों न हो, भारत में रहने वाला हर नागरिक भारतीय माना गया था। यह भी सही है कि विभाजन के समय करोड़ों लोग भारत से पाकिस्तान और पाकिस्तान से भारत आए-गए थे, पर इस हकीकत से भी आंख नहीं चुराई जा सकती कि तब करोड़ों मुसलमानों ने भारत में रहना ही स्वीकार किया था। अवसर था उनके पास पाकिस्तान जाने का, पर ऐसा न करके उन्होंने इस देश की मिट्टी के प्रति अपने लगाव का ही उदाहरण दिया था। इसलिए, उनकी देशभक्ति पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं बनता। कुछ अरसा पहले आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने भारत में पैदा होने वाले हर व्यक्ति को हिंदू कहकर एक उदाहरण प्रस्तुत किया था। आज फिर ‘धर्म अलग हो सकते हैं, मगर मानवता एक है, सभी रास्ते ईश्वर तक ले जाने वाले हैं’ का संदेश देकर उन्होंने मनुष्यता के धर्म को स्वीकार करने का ही आग्रह किया है।
सवाल इस आग्रह के पीछे की सच्चाई का है। हमारा संविधान देश के हर नागरिक को अपना धर्म मानने, उसके अनुसार आचरण का अधिकार देता है। हर भारतीय को यह अधिकार भी है कि वह अपने विश्वास का प्रचार-प्रसार कर सके। फिर, धर्म के नाम पर किसी के कम या अधिक भारतीय होने का क्या अर्थ रह जाता है? सवाल यह उठता है कि हमारी पहचान हिंदू या मुसलमान के आधार पर होनी चाहिए अथवा भारतीय होने के नाते?
सवाल यह भी उठता है कि आज़ादी के अस्सीवें साल में गर्व से स्वयं को हिंदू या मुसलमान कहने-समझने का क्या अर्थ है? होना तो यह चाहिए था कि समय के साथ भारतीयता की हमारी पहचान और मज़बूत होती, पर हो उल्टा ही रहा है! हम भारत माता की जय का नारा तो लगाते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि भारत माता है क्या? देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत-माता की एक परिभाषा हमें दी थी। इस देश के सारे नागरिक मिलकर भारत-माता को आकार देते हैं। इस तर्क को यदि हम समझ लेते हैं तो फिर स्वयं को भारतीय प्रमाणित करने के लिए कोई नारा लगाने की ज़रूरत नहीं रह जाती। यही भारतीयता हमारी पहचान होनी चाहिए। इसी भारतीयता पर हमें गर्व करना चाहिए। हमारी विविधता में एकता का यही अर्थ है, यही अर्थ होना चाहिए।
जब मोहन भागवत सात समुद्र पार जाकर विविधता में एकता का संदेश देते हैं, उसकी महत्ता समझाते हैं, तो इसका अर्थ सिर्फ यही होना चाहिए कि यह संदेश हर भारतीय के लिए है। सच कहें तो दुनियाभर के लिए है यह संदेश। मैं कैसे अपने आराध्य को पूजता हूं, यह मेरा निजी कर्म है। इसके आधार पर मेरी कोई पहचान निर्धारित नहीं हो सकती। मेरी वास्तविक पहचान मेरा इंसान होना है— न हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा! इस रहस्य की गुत्थी कब खोलेंगे हम? कब समझेंगे इसके मर्म को। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, ‘मैं चाहता हूं हिंदू और अच्छा हिंदू बने, मुसलमान और अच्छा मुसलमान बने, ईसाई और अच्छा ईसाई बने... यह और अच्छा बनने की प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए हमारे भीतर। यही ‘और अच्छा’ होना हमें अच्छा मनुष्य बना सकता है। समझना हमें यह भी होगा कि दुनिया के सब धर्म अंततः हमें अच्छा इंसान बनने का ही संदेश देते हैं। बिना अच्छा इंसान बने, हम न अच्छा हिंदू हो सकते हैं, न अच्छा मुसलमान। लगभग सवा सौ साल पहले, कहना चाहिए ठीक 133 साल पहले, भारतीय मनीषी स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में ‘भाइयो और बहनो’ के संबोधन से अच्छा इंसान होने का एक मंत्र दुनिया को दिया था। यह दुनिया के नाम भारत का एक संदेश था। इस संदेश में कहीं ऐसा भाव नहीं था कि भारत दुनिया का गुरु है, संदेश भाईचारे का था। आज भी इसी संदेश को स्वीकारने की आवश्यकता है।
विविधता में एकता वाली संघ के मुखिया की बात कुछ ऐसा ही संदेश देने वाली है। मोहन भागवत ने यह बात भले ही अमेरिका में जाकर दोहराई हो, पर यह बात हम भारतवासियों के लिए भी है। हैरानी की बात तो यह है कि देश के भीतर हम इस एकता का महत्व समझने से इनकार करते हैं। बात ज़रूर होती है इसकी, पर आचरण में हम इसे याद नहीं रखना चाहते। हमारे राजनेता जब ‘अस्सी और बीस’ की बात करते हैं, या फिर ‘कपड़ों से व्यक्ति को पहचानने’ का दावा करते हैं अथवा कब्रिस्तान और श्मशान की दुहाई देते हैं, तो हमारी इस अनेकता में एकता को ही झुठला रहे होते हैं।
बहरहाल, हकीकत यह है कि धर्म को राजनीति का हथियार बनाकर ‘हम और वे’ का जो खेल खेला जा रहा है, वह खतरनाक है। देश को बांटने वाली नहीं, जोड़ने वाली राजनीति की आवश्यकता है। बंटने का यह भाव किस सीमा तक जा पहुंचा है, इसका जीता-जागता उदाहरण है यह शिकायत कि ‘रघुपति राघव राजा-राम’ वाले भजन में गांधीजी ने ‘ईश्वर-अल्ला तेरा नाम’ क्यों जोड़ दिया? इस तरह के सवाल उठाने वाली मानसिकता राष्ट्रीय हित और मनुष्यता की दृष्टि से बहुत खतरनाक है। इस खतरे को पहचानना और इससे बचने की ईमानदार कोशिश करना ज़रूरी है। पर, दुर्भाग्य से, हो इसका उल्टा रहा है। जाने-अनजाने हम इस खतरे को बढ़ा रहे हैं। हमारी त्रासदी यह भी है कि हम बंटने वाली राजनीति को समझने की कोशिश भी नहीं करना चाहते। इसलिए संघ के मुखिया के विविधता में एकता वाले उद्गार को ईमानदारी से स्वीकारना होगा। भारत में पैदा होने वाला हर व्यक्ति हिंदू है, इस बात के मर्म को समझना होगा। विविधता में एकता का तकाज़ा है कि हम भारत में जन्म लेने वाले हर नागरिक को भारतीय समझें! यही बात स्वयं को भारतीय समझने पर भी लागू होती है। भागवत यह बात अपने अनुयायियों को समझाएं, तब बात बनेगी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

