कोशिकाओं से चिप पर बन रहे हैं मानव अंग
इंग्लैंड के फ्रांसिस क्रिक इंस्टिट्यूट और स्विस कंपनी, एल्वियोलिक्स के शोधकर्ताओं ने सिर्फ एक व्यक्ति से ली गई स्टेम कोशिकाओं का इस्तेमाल करके चिप पर मानव फेफड़े का पहला मॉडल विकसित किया है। ये चिप एक व्यक्ति में सांस लेने...
इंग्लैंड के फ्रांसिस क्रिक इंस्टिट्यूट और स्विस कंपनी, एल्वियोलिक्स के शोधकर्ताओं ने सिर्फ एक व्यक्ति से ली गई स्टेम कोशिकाओं का इस्तेमाल करके चिप पर मानव फेफड़े का पहला मॉडल विकसित किया है। ये चिप एक व्यक्ति में सांस लेने की गति और फेफड़ों की बीमारी को उत्पन्न करते हैं, जिससे टीबी जैसे संक्रमण के इलाज का परीक्षण करने और व्यक्ति विशेष दवा देने की उम्मीद जगी है।
मनुष्य के रोगों को बेहतर ढंग से समझने और उनका प्रभावी उपचार खोजने के लिए वैज्ञानिक निरंतर नए तरीके विकसित कर रहे हैं। कुछ वैज्ञानिक इंसानी कोशिकाओं से चिप पर शरीर के अंग उगा रहे हैं जबकि कुछ रिसर्चर अंगों के डिजिटल संस्करण बनाने की चेष्टा कर रहे हैं। इंग्लैंड के फ्रांसिस क्रिक इंस्टिट्यूट और स्विस कंपनी, एल्वियोलिक्स के शोधकर्ताओं ने सिर्फ एक व्यक्ति से ली गई स्टेम कोशिकाओं का इस्तेमाल करके चिप पर मानव फेफड़े का पहला मॉडल (लंग-ऑन-चिप) विकसित किया है। ये चिप एक व्यक्ति में सांस लेने की गति और फेफड़ों की बीमारी को उत्पन्न करते हैं, जिससे टीबी जैसे संक्रमण के इलाज का परीक्षण करने और व्यक्ति विशेष दवा देने की उम्मीद जगी है।
दरअसल, फेफड़ों में एल्वियोली नामक हवा की थैली गैस के आदान-प्रदान के लिए आवश्यक जगह होती है और साथ ही यह थैली सांस से अंदर जाने वाले वायरस और बैक्टीरिया के खिलाफ अवरोधक का भी काम करती है। ये रोगाणु फ्लू या टीबी जैसी सांस की बीमारियां पैदा करते हैं। शोधकर्ता चिप पर फेफड़े बनाकर प्रयोगशाला में मानव कोशिकाओं और बैक्टीरिया के बीच होने वाले द्वंद्व को पुननिर्मित कर रहे हैं। प्लास्टिक की इस चिप पर मानव फेफड़ों की छोटी इकाइयां हैं जिनमें छोटी-छोटी नलियां और कम्पार्टमेंट होते हैं। इस मामले में, उनका मकसद हवा की थैलियों को फिर से बनाना था ताकि यह समझा जा सके कि वे संक्रमण पर कैसे प्रतिक्रिया करती हैं। अभी तक ये लंग ऑन-चिप डिवाइस मरीज से ली गई कोशिकाओं और व्यावसायिक रूप से उपलब्ध कोशिकाओं के मिश्रण से बनाए जाते थे। इस तरह के चिप किसी एक व्यक्ति के फेफड़ों के काम या बीमारी की प्रगति को पूरी तरह से दोहरा नहीं सकते थे।
इस अध्ययन में क्रिक की टीम ने चिप पर फेफड़े का एक नया मॉडल विकसित किया है, जिसमें सिर्फ एक डोनर की स्टेम कोशिकाओं से ली गई आनुवंशिक रूप से एक जैसी कोशिकाएं होती हैं। प्रयोगशाला द्वारा पहले विकसित की गई एक विधि के आधार पर शोधकर्ताओं ने प्लोरिपोटेंट (बहुक्षमता) स्टेम कोशिकाओं से ‘एल्वियोलर एपिथेलियल’ कोशिकाएं और ‘वैस्कुलर एंडोथेलियल’ कोशिकाएं बनाईं। ये ऐसी कोशिकाएं हैं जो शरीर में किसी भी कोशिका में विकसित हो सकती हैं। इन एपिथेलियल और एंडोथेलियल कोशिकाओं को एक बहुत पतली झिल्ली के ऊपर और नीचे अलग-अलग उगाया जाता है ताकि हवा की थैली के अवरोध को पुननिर्मित किया जा सके।
इसके बाद, वैज्ञानिकों ने चिप में मैक्रोफेज नामक इम्यून कोशिकाएं डालीं, जिन्हें उसी डोनर की स्टेम कोशिकाओं से बनाया गया था। चिप में बीमारी के शुरुआती चरण निर्मित करने के लिए उन्होंने टीबी के बैक्टीरिया डाले। टीबी से संक्रमित चिप में टीम ने बड़े मैक्रोफेज समूह देखे। संक्रमण के पांच दिन बाद, एंडोथेलियल और एपिथेलियल कोशिकाओं के अवरोध टूट गए, जिससे पता चला कि हवा की थैली का फंक्शन खराब हो गया था। इस अध्ययन के वरिष्ठ लेखक मैक्स गुटिरेज ने कहा कि आज ऐसी तकनीकों की मांग बढ़ रही है जिनमें जानवरों के अंगों का प्रयोग नहीं होता। ऑर्गन-ऑन-चिप जैसे तरीके प्रयोगशाला में इंसानी सिस्टम को फिर से बनाने के लिए जरूरी होते जा रहे हैं क्योंकि जानवरों और इंसानों के बीच फेफड़ों की संरचना, इम्यून कोशिकाओं की बनावट और बीमारी के विकास में अंतर होता है। नई चिप से हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि टीबी जैसे संक्रमण किसी व्यक्ति पर कैसे असर डालेंगे। साथ ही यह टेस्ट भी किया जा सकेगा कि एंटीबायोटिक्स जैसे उपचार कितने प्रभावी हैं।
वैज्ञानिकों के अन्य दल ने चूहे के मस्तिष्क के कॉर्टेक्स का डिजिटल संस्करण बनाया है। हमारा मस्तिष्क ऊपर से अखरोट की गिरी जैसा दिखता है। इसकी उभरी हुई सिलवटों वाली सतह को सेरिब्रल कॉर्टेक्स कहा जाता है। ज्ञान और स्मृति जैसे अनेक उच्च स्तरीय संज्ञानात्मक कार्य मस्तिष्क के कॉर्टेक्स से जुड़े हुए हैं। दुनिया के वैज्ञानिक कॉर्टेक्स की गहन जांच करके मस्तिष्क की कार्य प्रणाली का अध्ययन करना चाहते हैं।
अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के एक दल ने जापान के शक्तिशाली फुगाकू सुपरकम्प्यूटर का उपयोग करके चूहे के मस्तिष्क के कॉर्टेक्स का एक डिजिटल मॉडल बनाया है, जो अब तक बनाया गया सबसे बड़ा और सबसे वास्तविक मॉडल है। डिजिटल मस्तिष्क एक वास्तविक मस्तिष्क की तरह व्यवहार करता है, जिससे वैज्ञानिक रोग की प्रगति, तंत्रिका गतिशीलता और संभावित उपचारों का अध्ययन कर सकते हैं। जैविक डेटा सेट को शक्तिशाली मॉडलिंग सॉफ़्टवेयर के साथ जोड़कर अंतरराष्ट्रीय टीम ने साबित कर दिया है कि बड़े पैमाने पर जैवभौतिक रूप से सटीक मस्तिष्क मॉडल बनाना अब संभव है। चूहे के कॉर्टेक्स का यह पूरी तरह से डिजिटल संस्करण है।
यह वैज्ञानिकों को एक आभासी वातावरण में अल्जाइमर या मिर्गी जैसी स्थितियों का पुनर्निर्माण करके मस्तिष्क के काम करने के तरीके का पता लगाने की एक नई विधि प्रदान करता है। वे देख सकते हैं कि क्षति तंत्रिका नेटवर्क के माध्यम से कैसे आगे बढ़ती है। इस मॉडल से अनुभूति और चेतना से संबंधित प्रक्रियाओं की भी जांच की जा सकती है। यह मॉडल संरचना और गतिविधि दोनों को दर्शाता है, जिसमें लगभग एक करोड़ स्नायु कोशिकाएं (न्यूरॉन्स), 26 अरब स्नायु कनेक्शन (सिनेप्स) और 86 जुड़े हुए मस्तिष्क क्षेत्र शामिल हैं।
यह उपलब्धि फुगाकू सुपरकम्प्यूटर की वजह से संभव हुई है, जो जापान का प्रमुख सिस्टम है। यह दुनिया के सबसे तेज सुपर कम्प्यूटरों में गिना जाता है। यह सिस्टम प्रति सेकंड अरबों गणनाएं करने में सक्षम है। अमेरिका के एलन इंस्टिट्यूट के शोधकर्ताओं ने जापान की इलेक्ट्रो-कम्युनिकेशंस यूनिवर्सिटी और तीन अन्य जापानी संस्थानों की टीमों के साथ मिलकर इस परियोजना को साकार किया।
विज्ञानी अब कॉर्टेक्स के इस मॉडल का उपयोग यह पता लगाने के लिए कर सकते हैं कि बीमारियां कैसे विकसित होती हैं, मस्तिष्क तरंगें ध्यान को कैसे प्रभावित करती हैं, या दौरे मस्तिष्क में कैसे फैलते हैं। पहले, इस तरह के अध्ययनों के लिए वास्तविक जैविक ऊतक की आवश्यकता होती थी और एक समय में केवल एक ही प्रयोग किया जा सकता था। अब शोधकर्ता आभासी स्थान में कई तरह के आइडिया की जांच कर सकते हैं। ये मॉडल लक्षणों के प्रकट होने से पहले ही तंत्रिका संबंधी विकारों के शुरुआती लक्षणों को उजागर करने में मदद कर सकते हैं और वैज्ञानिकों को डिजिटल सेटिंग में संभावित उपचारों या चिकित्सा पद्धतियों का मूल्यांकन करने में सक्षम बना सकते हैं।
एलन इंस्टिट्यूट के शोधकर्ता, एंटोन आर्किपोव का कहना है कि हम पर्याप्त कम्प्यूटिंग शक्ति के साथ इस प्रकार के मस्तिष्क मॉडल को प्रभावी ढंग से चला सकते हैं। यह हमें विश्वास दिलाता है कि बहुत बड़े मॉडल न केवल संभव हैं, बल्कि सटीकता के साथ हासिल करने योग्य भी हैं। वैज्ञानिकों का यह प्रयास तंत्रिका विज्ञान और उन्नत कम्प्यूटिंग क्षमताओं को एक मंच पर लाया है। चूहे के डिजिटल कॉर्टेक्स को देखना वास्तविक समय में जीव विज्ञान को देखने जैसा है। वैज्ञानिकों का दीर्घकालिक लक्ष्य संपूर्ण-मस्तिष्क मॉडल बनाना है, जिसमें मानव मस्तिष्क भी शामिल है।
लेखक विज्ञान मामलों के जानकार हैं।

