Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

लिव-इन में दहेज कानून से संरक्षण की आस

लिव-इन जैसे संबंधों में भी दहेज और आर्थिक दबाव जैसे आरोप सवाल उठाते हैं। क्या संकट दहेज प्रथा में है, या हमारी सामाजिक मानसिकता में? जो आधुनिक संबंधों में भी स्वार्थ और वर्चस्व के तत्वों को पुनः स्थापित कर देती...

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

लिव-इन जैसे संबंधों में भी दहेज और आर्थिक दबाव जैसे आरोप सवाल उठाते हैं। क्या संकट दहेज प्रथा में है, या हमारी सामाजिक मानसिकता में? जो आधुनिक संबंधों में भी स्वार्थ और वर्चस्व के तत्वों को पुनः स्थापित कर देती है? कहीं दहेज या क्रूरता के आरोप टूटते लिव-इन संबंधों को कानूनी रूप से साधने, दबाव बनाने या प्रतिशोध लेने का माध्यम तो नहीं बन रहे?

हाल ही में देश को शीर्ष अदालत ने ‘लोकेश बी.एच. एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य’ के मामले के आपराधिक कानून से जुड़े प्रश्न पर विचार करने के लिए सहमति दी है। क्या किसी महिला के साथ विवाह जैसे संबंध (लिव-इन रिलेशनशिप) में रहने वाले पुरुष को भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498ए के तहत क्रूरता के अपराध के लिए अभियोजन के दायरे में लाया जा सकता है या नहीं। उल्लेखनीय है कि यह मुद्दा एक विशेष अनुमति याचिका में उठाया गया है, जिसमें कर्नाटक हाईकोर्ट के 18 नवंबर 2025 के निर्णय को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि धारा 498ए उन मामलों में भी लागू हो सकती है जहां संबंध विवाह के समान प्रकृति का हो।

गौरतलब है कि धारा 498ए भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत यह प्रावधान है कि यदि किसी महिला के साथ उसके पति अथवा पति के रिश्तेदार द्वारा क्रूर व्यवहार किया जाता है, तो वह दंडनीय अपराध माना जाएगा। इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य विवाहित महिलाओं को दहेज से जुड़े उत्पीड़न तथा अन्य प्रकार की शारीरिक या मानसिक यातना से कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है। इसी क्रम में, सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को इस वाद में पक्षकार के रूप में सम्मिलित करते हुए उसे नोटिस जारी किया है और प्रत्युत्तर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने मामले से संबंधित समस्त डिजिटल अभिलेख उपलब्ध कराने के भी आदेश दिए हैं। साथ ही, इस प्रकरण में अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित कार्यवाही पर अगली सुनवाई तक अस्थायी रोक लगा दी गई है।

Advertisement

यह प्रश्न सरल या एकरेखीय नहीं है। इसके एक पक्ष में स्त्री के अधिकार, गरिमा और सुरक्षा का संवेदनशील प्रश्न निहित है, तो दूसरे पक्ष में विधि की वह मर्यादा भी है जिसके अंतर्गत दहेज-निरोधक तथा क्रूरता संबंधी प्रावधानों को पारंपरिक रूप से वैध वैवाहिक संबंधों से जोड़कर देखा जाता है। एक ओर लिव-इन संबंध भारतीय समाज में गाहे-बगाहे अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं; वहीं दूसरी ओर, इनके साथ वे सभी जटिलताएं और विवाद भी सामने आ खड़े हो रहे हैं, जो प्रायः विधिसम्मत वैवाहिक संबंधों के संदर्भ में देखने को मिलते हैं। ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए जो कानून मूलतः वैवाहिक संस्था को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, उन्हीं प्रावधानों का आश्रय लेते हुए लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े कानून के दरवाजे खटखटाते हुए दिखाई दे रहे हैं।

Advertisement

इस प्रकार, यह विमर्श केवल दंडात्मक कानून की तकनीकी व्याख्या का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और विधिक सीमाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती भी है। सबसे अधिक विस्मयकारी पहलू यह है कि अनेक युवा तथाकथित आधुनिक जीवन-दृष्टि और स्वतंत्रता के आग्रह के साथ लिव-इन संबंधों में प्रवेश करते हैं, मानो वे सामाजिक तथा विधि-सम्मत परंपरागत व्यवस्थाओं को महत्व नहीं देते। परंतु विडंबना यह है कि जब विवाद या संकट उत्पन्न होता है, तो वही पक्ष उन कानूनी संरक्षणों की शरण में जाते दिखाई देते हैं, जो मूलतः पारंपरिक वैवाहिक संबंधों को ध्यान में रखकर निर्मित किए गए थे। यह विरोधाभास एक ओर सामाजिक मान्यताओं से विमुखता और दूसरी ओर उन्हीं से उपजे विधिक संरक्षण की अपेक्षा—कानून के समक्ष निरंतर एक नया संतुलन स्थापित करने की चुनौती उपस्थित कर रहा है।

जनवरी, 2004 को ‘रीमा अग्रवाल बनाम अनुपम एवं अन्य के मामले’ में देश की शीर्ष अदालत ने कहा ‘धारा 498ए को लागू करने के लिए ‘पति’ शब्द के अंतर्गत कौन-कौन आएगा, यह प्रश्न वास्तव में जटिल है। शब्दार्थ की दृष्टि से, विभिन्न विधि शब्दकोशों और शब्दावली में ‘पति’ तथा ‘विवाह’ की जो परिभाषाएं दी गई हैं, उनसे यह प्रतीत हो सकता है कि दंडात्मक प्रावधान लागू करने के लिए वैध विवाह का अस्तित्व अनिवार्य शर्त है।’ अदालत ने यह भी कहा कि ‘दहेज’ की अवधारणा मूलतः विवाह से जुड़ी होती है और दहेज निषेध अधिनियम के प्रावधान भी विवाह के संदर्भ में ही लागू होते हैं। यदि स्वयं विवाह की वैधता ही विवादित हो, तो इससे अतिरिक्त विधिक जटिलताएं उत्पन्न हो जाती हैं।

अजयनाथ बनाम केरल राज्य, में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 498ए के अंतर्गत अभियोजन चलाने के लिए अभियुक्त और पीड़िता के बीच वैध वैवाहिक संबंध होना अनिवार्य है। तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि यदि कथित विवाह प्रारंभ से ही शून्य हो, तो धारा 498ए के अंतर्गत अभियोजन कायम नहीं रह सकता। वर्ष 2003 के कलियापेरुमल बनाम तमिलनाडु राज्य निर्णय में न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि धारा 498ए अथवा उससे संबंधित प्रावधान स्वतः लागू नहीं हो जाते; इनके लिए विधि द्वारा मान्य वैवाहिक संबंध का अस्तित्व आवश्यक है। यदि विवाह ही वैध न हो या दहेज से जुड़ा तत्व स्थापित न हो, तो आपराधिक दायित्व आरोपित नहीं किया जा सकता।

इस प्रकार न्यायालय ने विवाह को इन प्रावधानों के लागू होने की आधारशिला के रूप में स्वीकार किया। इसी तर्क का विस्तार तथाकथित ‘पति के संबंधियों’ तक भी होता है। जब विधिक दृष्टि से ‘पति’ का दर्जा ही सिद्ध न हो, तो उसके संबंधियों के विरुद्ध की गई कार्रवाई भी स्वतः कमजोर पड़ जाती है। यही नहीं जुलाई, 2024 में केरल उच्च न्यायालय ने ‘डॉ. अश्विन वी. नायर बनाम केरल राज्य एवं अन्य’में यह निर्णय दिया कि किसी महिला का लिव-इन पार्टनर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए के तहत ‘पति’ की परिभाषा में नहीं आता। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘पति शब्द का अर्थ है विवाहित पुरुष, जो विवाह में महिला का साथी हो। अतः विवाह ही वह तत्व है जो महिला के साथी को ‘पति’ का दर्जा देता है। विवाह का अर्थ है कानून की दृष्टि में वैध विवाह। इसलिए, बिना वैध विवाह के यदि कोई पुरुष किसी महिला का साथी बनता है, तो वह भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के उद्देश्य से ‘पति’ की परिभाषा में नहीं आएगा।’

लिव-इन संबंधों की अवधारणा स्वयं इस दावे के साथ सामने आई कि यह पारंपरिक वैवाहिक बंधनों और उनसे जुड़ी सामाजिक बुराइयों विशेषतः दहेज जैसी कुरीतियों से मुक्त एक आधुनिक और स्वैच्छिक संबंध है। दहेज को लंबे समय से एक ऐसी परंपरागत सामाजिक बुराई के रूप में रेखांकित किया गया है, जिसने स्त्रियों के अधिकारों का शोषण किया और वैवाहिक संस्था को कलंकित किया। यदि लिव-इन संबंध स्वतंत्रता, समानता और आधुनिक चेतना के प्रतीक माने जाते हैं, तो फिर वहां दहेज जैसा प्रश्न उत्पन्न ही कैसे होता है?

यदि वास्तव में ऐसे संबंधों में भी दहेज या आर्थिक दबाव जैसे आरोप सामने आ रहे हैं तो यह गंभीर आत्ममंथन की मांग करता है। क्या समस्या केवल दहेज नामक प्रथा में है, या हमारी सामाजिक मानसिकता में, जो आधुनिक संबंधों में भी परंपरागत स्वार्थ और वर्चस्व के तत्वों को पुनः स्थापित कर देती है? या फिर यह भी विचारणीय है कि कहीं दहेज अथवा क्रूरता के आरोप कभी-कभी टूटते हुए लिव-इन संबंधों को कानूनी रूप से साधने, दबाव बनाने या प्रतिशोध लेने का माध्यम तो नहीं बन रहे? यह प्रश्न केवल विधिक व्याख्या का नहीं, बल्कि सामाजिक ईमानदारी और आधुनिकता की वास्तविक परिभाषा का भी है।

लेखिका समाजशास्त्री हैं।

Advertisement
×