हर साल हिंदी दिवस आता है, सरकारी दफ्तर सजते हैं, भाषण होते हैं और अखबारी कतरनें सहेजी जाती हैं। फिर हिंदी अपनी नियति पर लौट जाती है। सवाल यही है—क्या करोड़ों लोगों की भाषा को एक दिन के कर्मकांड में बांध देना पर्याप्त है?
आज हम एक बार फिर हिंदी दिवस मना रहे हैं। हम साल-दर-साल इसे मनाकर क्या हासिल करते हैं? सवाल यह है कि 53 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली हिंदी को साल में एक दिन तक सीमित करना कितना जरूरी है? क्या हम इसे धार्मिक कर्मकांड की तरह नहीं मनाने लगे हैं...? केंद्र सरकार, बैंकों व राज्य सरकारों के दफ्तरों के लिए हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ा मनाने के लिए बाकायदा बजट आता है। उन्हें कार्यक्रम की कवरेज कराकर अखबारी कतरनें और चित्र अपने हिंदी विभागों को भेजने की रस्म अदायगी करनी पड़ती है। यानी हिंदी के लिए एक दिन का कर्मकांड। अक्सर व्यंग्यकार पितृपक्ष के दौरान आने वाले इस दिन को एक स्मृति दिवस के रूप में मनाने पर तंज करते हैं। वाकई कुछ ऐसा ही कि एक दिन की याद और फिर राजरानी अंग्रेजी का वर्चस्व। आखिर हम इस कर्मकांड से कब मुक्त होंगे? हिंदी को लेकर हमारे ये अहसास रोज क्यों नहीं जगते?
हिंदी आज देश की राजभाषा है। वह बात अलग है कि कुछ राज्यों के राजनीतिक स्वार्थों की वजह से हिंदी को वह दर्जा नहीं मिल पाया जो उसे हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देना चाहा। महात्मा गांधी से लेकर तमाम गैर-हिंदी भाषियों के हिंदी के उत्थान के लिए दिये गए योगदान के लिए हिंदी समाज ऋणी है। लेकिन दुर्भाग्य है कि आज दक्षिणी राज्यों को हिंदी से तो परहेज है मगर सात समुद्र पार से आयी साम्राज्यवाद की भाषा अंग्रेजी से कोई परेशानी नहीं है।
हकीकत यह भी है कि हिंदी को जटिल व पांडित्यपूर्ण बनाने वाले लोगों की वजह से हिंदी गैर हिंदी भाषी इलाकों में लोगों की जुबान पर नहीं चढ़ पायी। अंग्रेजी से किए गए गूढ़ अनुवाद ने भी समस्या को और अधिक जटिल बनाया। वास्तव में इस देश को एक संपर्क भाषा की जरूरत है। भारत को एक महाद्वीप कहा जाता है जहां कोस-कोस पर भाषा के स्वरूप में बदलाव आ जाता है। लेकिन देश को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए कोई तो संपर्क भाषा होनी चाहिए। दुखद है कि आजादी के आठ दशक बाद भी आखिर क्यों हम हिंदी के समकक्ष ऐसी हिंदुस्तानी भाषा तैयार न कर पाये जो सबको मंजूर हो। उसमें तालमेल रखने वाले तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयाली जैसी अन्य भाषाओं के आसानी से समझ में आ सकने वाले शब्द शामिल किए जाते। हिंदी भाषियों की भी दिक्कत है कि वे दक्षिण की भाषाएं सीखने की कोशिश नहीं करते। यह बात दक्षिण भारत के लोगों को अकसर अखरती है। यही वजह है कि जानने के बावजूद वे हिंदी बोलने से परहेज करते हैं।
आज सोशल मीडिया का जमाना है। हिंदी की वीडियो देखते-देखते ही वायरल हो जाती हैं। दक्षिण भारत में भी खूब देखी व पसंद की जाती हैं। लेकिन जब हिंदी भाषा की बात आती है तो विरोध के स्वर उभरने लगते हैं। आज एआई और सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्मों ने भाषा की दीवारों को तोड़ दिया है। डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर हिंदी खूब धड़ल्ले से देखी-पढ़ी जा रही है। अब तो एआई से अनुवाद के जरिये हर भाषा को समझा, पढ़ा और लिखा जा सकता है। तो फिर ये भाषायी दीवारें क्यों?
उत्तर भारत में दैनिक ट्रिब्यून ने आम बोलचाल की हिंदी को बढ़ावा देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। अपने स्वर्णजयंती मनाने की ओर बढ़ रहे इस पत्र ने हिंदी भाषा, हिंदी साहित्य और सरल-सुबोध समाचारों के जरिये हिंदी की सेवा करने की कोशिश की है। सरदार दयाल सिंह मजीठिया के द्वारा लगाया गया ‘द ट्रिब्यून’ का पौधा भी अपनी यात्रा के डेढ़ सौ साल पूरे करने की दिशा में उन्मुख है। वर्ष 1978 में जब मातृ संस्थान ‘द ट्रिब्यून’ परिवार द्वारा हिंदी व पंजाबी में समाचारपत्र शुरू किये गये तो तत्कालीन माननीय ट्रस्टी एम.एस. रंधावा की सोच थी कि हिंदी, पंजाबी भाषाी समाज से जुड़ने के लिए उनकी भाषा में समाचार विचारों का प्रकाशन होना चाहिए। दूरदृष्टा ट्रस्टी साहिबान ने इन समाचारपत्रों की मौलिकता को बनाये रखा। उन्होंने इसे अंग्रेजी का अनुवाद बनाने से परहेज किया। जिससे इन समाचार पत्रों की ही अपनी विशिष्ट पहचान हिंदी व पंजाबी समाज में बनी।
हकीकत में हिंदी को देशव्यापी स्वीकार्यता के लिए सहज-सरल बनाने की जरूरत है। ये काम हमारी हिंदी फिल्मों ने खूब किया। कभी किसी एक फिल्मी गीत को गुनगुनाने वाले आप को कश्मीर से कन्याकुमारी तक मिल जाएंगे। कई ऐसे शब्द हैं जो किसी शब्दकोष में न हों। लेकिन जुबान पर चढ़ जाते हैं। वजह साफ है कि बोलने की सहजता। देश के विभिन्न चैनलों में होने वाली संगीत प्रतियोगिता में गैर हिंदी भाषी इलाकों के बच्चे अधिकार से हिंदी गाने गाते हैं। उन्हें देखकर नहीं लगता कि वे अहिंदी भाषी इलाकों से आए हैं। लेकिन जब उनसे हिंदी के बारे में बात करें तो वे कह देते हैं कि वे हिंदी नहीं जानते। तो फिर वे हिंदी का गाना बखूबी कैसे गा लेते हैं? हिंदी के मठाधीशों को भी हिंदी के इस गुण का अर्थ समझना होगा।
कोई भी भाषा अपने साथ सदियों के संस्कार व अनुभव समेटे हुए होती है। उस भाषा का साहित्य भाषायी संस्कारों से समृद्ध होता है। साहित्य समाज की संवेदनशीलता का पर्याय होता है। पिछले दिनों एक युवक को कहते सुना कि प्रेमचंद को पढ़ने के बाद उसका जीवन बदल गया। अच्छा साहित्य समाज में बड़े बदलाव ला सकता है। लगातार डिजिटल होती नई पीढ़ी के दौर में साहित्य से मोहभंग होना हमारी चिंता का विषय होना चाहिए। फटाफटी दौर में बच्चों में गंभीर अध्ययन करने व पुस्तकों के महत्व को नजरअंदाज करना हमारी चिंता का विषय होना चाहिए। हमारे साहित्यकारों को भी सोचना होगा कि वे ‘स्वांतः सुखाय’ के लिए न लिखें, समाज की आकांक्षाओं को शब्दों में पिरोयें। तभी साहित्य समाज का दर्पण बन सकेगा।
समाज हो या परिवार, भाषा एक संपर्क साधन का काम करती है। परिवार व समाज को जोड़ने का काम भाषा बखूबी कर सकती है। भारत में विभिन्न राज्यों के लोगों को जोड़ने में अन्य भाषाओं के शब्दों वाली संपर्क भाषा जोड़ने का काम बखूबी कर सकती है। खासकर अपना भाषायी मुहावरा गढ़ने वाली नई पीढ़ी जेन-ज़ी इस काम को बखूबी कर सकती है। आज भारत युवाओं का देश है। देश में साठ फीसदी से अधिक युवा हैं। ये युवा फर्राटे से हिंदी बोलते हैं, हिंदी समझते हैं। इनकी पसंद सोशल मीडिया, हिंदी फिल्में और ओटीटी प्लेटफार्म का मनोरंजन है। लेकिन मोबाइल पर सांकेतिक भाषा में टूटी-फूटी हिंग्लिश लिखने वाले आधे युवा ऐसे हैं कि वे हिंदी लिख-पढ़ नहीं पाते। पढ़ते हैं तो अटक-अटक कर। यह बड़ी युवा आबादी एक पेज हिंदी में नहीं लिख पाती है। ये युवा अंग्रेज बन नहीं सकते और हिंदी के हो नहीं सकते। यह एक गंभीर समस्या है और हिंदी के भविष्य के कर्णधारों को लेकर चिंता पैदा करते हैं। इनमें बड़ी संख्या उन युवाओं की है जो अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों से निकले हैं। तो क्या आने वाले समय में युवाओं की बड़ी आबादी के लिए हिंदी महज मौखिक भाषा बनकर रह जाएगी? हिंदी के कर्णधारों को इस गंभीर समस्या के बारे में विचार करना होगा।
आज हिंदी दिवस पर संकल्प लेने की जरूरत है कि हम साल में 365 दिन हिंदी के व्यावहारिक उत्थान के लिए प्राणपण से काम करेंगे। इसे संपर्क व देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाली भाषा के रूप में काम करेंगे। यदि हम ऐसा करते हैं तो फिर हिंदी दिवस मनाने की जरूरत न होगी।

