पर्यावरण संकट से उपजे स्वास्थ्य के खतरे

पर्यावरण संकट से उपजे स्वास्थ्य के खतरे

तारा कार्था

तारा कार्था

प्रधानमंत्री के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार समेत अन्य उच्चस्तरीय विशेषज्ञों की यही राय है कि भारत में कोविड-19 की तीसरी लहर बनने की पूरी संभावना है, हालांकि यह कब आएगी, ठीक से नहीं कहा जा सकता, क्या पता अगले दो-तीन महीनों में या उसके बाद। जिस हिसाब से हमारे यहां संक्रमण का आधार बहुत वृहद है, उसके मुताबिक आगामी लहर और भी बड़ी होने के आसार हैं, पुनः आम सहमति यह है कि आंकड़ों का मौजूदा अनुमान गंभीर बनी वास्तविकता से बहुत कम है।

अब एक अन्य निश्चित स्थिति के बारे में विचार करें। साल के अंत में, जब भारत का सामना वार्षिक एबीसी (एशियन ब्राउन क्लाउड) से होगा, जिसमें हवा में व्याप्त विषैले तत्व व्यक्ति के फेफड़ों में जहर भर देते हैं तो कोविड जैसे हालात में यह और भी खतरनाक बन सकता है। सिलेंडर वाली ऑक्सीजन की कमी भूल जाएं, यदि आपको आम हवा में ऑक्सीजन मिल जाए तो भी खुशकिस्मती होगी। इस साल, इसे रोकने के लिए सरकार को अपने पास उपलब्ध स्रोतों और तौर-तरीकों वाले कड़े कदम उठाने को मजबूर होना पड़ेगा। लेकिन क्या यह इतना आसान है। एबीसी होने देना हम गवारा नहीं कर सकते, अगर यह होता है तो चिन्हित अधिकारियों को जिम्मेवार ठहराया जाना चाहिए।

एबीसी पर पहली मर्तबा वर्ष 1999 में गौर किया गया था। इसके लिए नेपाल में वैज्ञानिक अध्ययन और निगरानी केंद्र बनाए गए। दूसरे शब्दों में, इसके बारे में सरकारों को काफी पहले से पता है, इसमें कोई हैरानी नहीं। दूसरा, यह समझना जरूरी है कि एबीसी का मतलब केवल प्रदूषण नहीं है। ग्लेशियर पिघलने, सूर्य की किरणों की तीव्रता बढ़ने, हर हफ्ते होने वाली असामयिक बारिश और गिरते खेती उत्पादन में इसका बहुत बड़ा हाथ है। तीसरा, एबीसी लगभग पूर्ण रूप से मानव-निर्मित है, जिसमें सल्फर कण (ईंधन तेल जलने पर) के अलावा नाइट्रेट कण (वाहन उत्सर्जन) और ब्लैक कार्बन कण (डीजल, बायोमास और कोयले का पूरी तरह न जल पाना) का घालमेल है। दूसरे शब्दों में, ये आपका ही पैदा किया है।

लेकिन अच्छी खबर यह है कि मानव निर्मित इस आपदा को कुछ हद तक खुद इनसान ही रोक सकते हैं, सुबूत है कि यह संभव है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि पिछले साल हुए लॉकडाउन में महज 53 दिनों में भारत के सिंधु-गांगेय मैदानी इलाकों में प्रदूषण स्तर गिरकर दो दशक पहले जितना हो गया था।

जाहिर है, सर्वप्रथम हमें पराली जलाने से रोकना होगा। यह वास्तव में विरोधाभासी है कि दिल्ली की सीमाओं पर धरने पर बैठे किसानों ने सरकार से पहला वचन यही लिया कि पराली जलाने पर जुर्माना नहीं लगाया जाएगा। परिणामस्वरूप हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली में यह एकाएक प्रदूषण बढ़ने का कारण बना और जैसा कि अनुसंधान बताते हैं यह फसल उत्पादन और भूजल उपलब्धतता में आगे और कमी बनने में योगदान करता है, पंजाब में यह स्तर पहले ही न्यूनतम हो चुका है। इसलिए ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि किसान अपनी ओर से पराली जलाना छोड़ देंगे। राज्य सरकारें इसके लिए विकल्प उपलब्ध करवा रही हैं, लेकिन यह करना उतना सस्ता नहीं, जितने में कुछेक क्रिकेट मैच आयोजित हो जाएं। इसलिए सरकार को तैयार रहना होगा कि जहां कहीं पराली जलती दिखे, इसे बुझाने को व्यावसायिक आग बुझाने वाली हवाई जहाज कंपनी या भारतीय वायुसेना का इस्तेमाल करे। कोई नहीं चाहेगा कि अगली फसल तैयार करने को खेत सुखाने में हफ्तों का इंतजार करना पड़े। पहले-पहल किए गए इन प्रयासों को टेलीविजन पर खूब प्रचारित किया जाए, इसे देखकर बाकी अपने आप राह पर आ जाएंगे। तो क्या इसके विरोध में एक नया आंदोलन खड़ा हो जाएगा? हो सकता है। लेकिन मौजूदा किसान आंदोलन पहले ही पुरानी खबर बन चुका है और प्रदूषण से कोविड महामारी में इजाफा होने पर त्रस्त जनता की सहानुभूति में और कमी होगी। यह संदेश साफ और ऊंचे सुर में पहुंचे, इसे सुनिश्चित किया जाए और यह काम ‘56 इंच का सीना’ वाले को जिताऊ-वोटें दिलवा सकता है।

दूसरा, वातावरण परिवर्तन पर होने वाले सम्मेलनों में जो उच्चस्तरीय सुझाव हमें सुनने को मिलते हैं, उन्हें एक तरफ रखा जाए। प्रदूषण में सबसे बड़ा आम कारक है जमीन से उठते धूल कण और यह सब तरफ फैल जाते हैं, चूंकि सरकारों को अनाप-शनाप पैसा खर्चने का चाव होता है, लिहाजा सड़क साफ करने वाली महंगी मशीनें खरीद लेती हैं। उदाहरणार्थ गुरुग्राम नगर निगम ने ऐसी 6 मशीनें तो खुद की खरीदी हैं, प्रत्येक की कीमत 1 करोड़ है, और कुछेक 30 लाख रुपये प्रति माह किराए पर ले रखी हैं। यह कोढ़ में खाज करने जैसा है। गुरुग्राम इलाके में भवन निर्माण से भारी मात्रा में धूल और मलबा पैदा होता है। खाली पड़े लंबे-चौड़े सरकारी मैदान हैं, चूंकि वहां की मिट्टी-गारा तक कहीं और इस्तेमाल के लिए निकाला जा चुका है, लिहाजा जरा-सी हवा चलने पर बंजर पड़ी जमीन से धूल उड़ने लगती है। इसका आसान उपाय है घास लगाना। एक बार मानसून होने पर, यह हर उस जगह पर मजबूत जड़ पकड़ लेगी जहां अभी धरती की ऊपरी सतह पूरी तरह बर्बाद नहीं हुई है। यदि खुद से घास नहीं फैले-फूले तो एक अभियान चलाकर रोपी जा सकती है, इस पर होने वाला खर्च मशीनों पर लगे धन की तुलना में अंशमात्र होगा। इसी बीच नगर निगम जो हर साल ‘जंगली’ झाड़-झंखाड़ काटने को दल भेजने पर गर्व करता है, ये मुहिमें रोकनी होंगी। घास न केवल मिट्टी को जकड़कर रखती है बल्कि वातावरण को ठंडा भी करती है। बड़े भवन निर्माताओं (बिल्डर्स) को सख्त आदेश दिए जाएं कि सालाना छंटाई की आड़ में वे पेड़-पौधे बर्बाद नहीं करेंगे। अगली मर्तबा करते वक्त कोई ऐसा आसपास होना चाहिए, जो समझा सके कि छंटाई का असली मतलब क्या होता है। लेकिन फिलहाल न तो किसी वनस्पति का एक पत्ता तक कटे और न ही उखाड़ी जाए। जिलाधीश को यह आदेश तमाम रेज़ीडेंट वेलफेयर संगठन और स्थानीय निकायों को एकदम सुस्पष्ट करने की जरूरत है।

वह एक क्षेत्र जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है या जो अनियमित वर्ग में आता है, वह है कचरे का पुनर्चक्रीकरण और कबाड़ इकट्ठा करने वाली एजेंसियां, जो ज्यादातर एक माफिया की तरह काम कर रही हैं और इनमें चीन के निवेशकों का पैसा लगा है। सरकार को चाहिए कि इन्हेंे अपनी निगरानी में लाकर, कड़ी नियमावली लागू कर इस पेशे को नियमित वर्ग में शामिल करे। जब तक पर्यावरणविद इनके कामकाज की पूरी तरह पड़ताल नहीं कर लेते तब तक सब बड़ी कंपनियां अपना तथाकथित पुनर्चक्रीकरण मुल्तवी रखें।

इस सबसे ज्यादा खराब है, बेरोकटोक यहां-वहां भवन बनाकर रातों-रात खिसक जाने वाले बिल्डर्स, जिनके काम करने के अवैज्ञानिक तरीकों से शहरों और गावों की हवा में भारी मात्रा में धूल कण फैलते हैं। हरी खाली जगहों पर, आवासीय कालोनियों और लगभग हर ओर मलबा फेंक दिया जाता है। मकान बनाकर अपनी बाकी जिम्मेवारी से भाग जाने वाली ऐसे बिल्डर्स से सफाई शुल्क वसूल किया जाए। शहरी नियोजन एवं योजना विभाग समेत शहरी विकास निकाय संदिग्ध कारणों से किसी को भी भवन निर्माण या अतिरिक्त मंजिल या फ्लोर-टू-एरिया रेशो में बदलाव की इजाजत दे देते हैं, परिणामस्वरूप बेहतरीन रिहायशी कालोनियां भी ‘मुम्बइया चॉल’ जैसी बन गई हैं। जिम्मेवारी का मतलब है मलबे के छोटे-से-छोटे टुकड़े को युद्धस्तर पर साफ करना। सर्दियों में भवन निर्माण पर लगा पूर्ण प्रतिबंध किसी भी सूरत में भंग न किया जाए, चाहे कोई अधिकारियों को कितना भी पैसा क्यों न चढ़ा ले।

अंतिम विश्लेषण, लेकिन इन तमाम बिल्लियों के गले में घंटी बांधेगा कौन? इसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय में एक समूह का गठन किया जाए। फिलहाल स्वास्थ्य की चिंता सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बन गई है और इसकी महत्ता का जितना जल्द अहसास हो, उतना सबके लिए बेहतर है, खासकर सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के लिए। लिहाजा पहले अपने कृत्य साफ-सुथरे रखें, फिर उसके बाद मूल जरूरतों पर ध्यान दें।

लेखिका राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय में अध्यक्ष रही हैं।

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