शहीदों का स्मरण

बलिदानों के स्वर्णिम इतिहास का साक्षी हरियाणा

बलिदानों के स्वर्णिम इतिहास का साक्षी हरियाणा

मोहन मैत्रेय

एक राज्य के रूप में एक नवंबर, 1966 को अस्तित्व में आने वाले हरियाणा का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। यह धर्म भूमि एवं वीर भूमि है। यहां के निवासियों ने जीवनयापन के लिए हल का हत्था पकड़े रखा तो देश-रक्षा हेतु हाथ में तलवार भी थामे रखी। इतिहास साक्षी है कि हरियाणावासियों ने वीरता को सदियों तक चरितार्थ किया। यहां के अहीर, जाट, राजपूत सेना में अपना शौर्य निरंतर दिखाते आये हैं। यहां के मुसलमान नवाबों ने ब्रिटिश सरकार से लोहा लिया। नेताजी सुभाष बोस की आजाद हिंद फौज में हरियाणा के काफी सैनिक थे तो महिलाएं भी। जब गुरु तेगबहादुर की शहीदी हुई तो नारनौल की गौसाईं सेना ने मुगल सम्राट औरंगजेब के नाक में दम कर दिया।

इतिहासकारों ने हरियाणा को वैदिक सभ्यता का ‘पालना’ स्वीकार किया है। जिन प्रतापी नरेशों ने इसे पल्लवित-पोषित किया, इनमें सर्वप्रथम भरतों का उल्लेख मिलता है। भरतों का स्थान फिर पुरुओं ने लिया। ये अधिक दिन टिक नहीं पाये, पांचालों से पराजित हुए। कुछ समय उपरांत परिवर्तित स्थिति में पुरु तथा कुरुजनों की सम्मिलित सेनाओं ने पांचालों को खदेड़ दिया। इन जनों का नेता कुरु सैनिक रूप में कर्मठ नायक, राजनीति का प्रकाण्ड पंडित तथा आर्थिक मामलों का विशेषज्ञ था। इसने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया और इसी के नाम पर क्षेत्र का नामकरण कुरुक्षेत्र हुआ।

चौथी शती में चंद्रगुप्त मौर्य ने समस्त क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया। चौथी शती में मगध राजवंशीय शासक समुद्र गुप्त ने अपने राज्य में इस क्षेत्र का विलय कर लिया। छठी शती के आरंभ तक यह स्थिति बनी रही। 606 ई. में सिंहासनारूढ़ हर्षवर्धन ने एक विशाल राज्य की स्थापना की। मौर्य साम्राज्य के विघटन के पश्चात विदेशी आक्रमणकारियों ने उत्तर भारत में तूफान खड़ा कर दिया। जब समरकंद के शासक तैमूर ने 1398 में अढ़ाई लाख सैनिकों के साथ भारत पर आक्रमण किया तो सर्वखाप पंचायत के नेतृत्व में अस्सी हजार पुरुषों तथा चालीस हजार वीरांगनाओं ने उसे चुनौती देकर जोगराज के नेतृत्व में उसके पचहतर हजार सैनिकों का संहार कर दिया। 1191 में शहाबुद्दीन गौरी के साथ तरावड़ी में हुए सम्राट पृथ्वीराज के युद्ध में हरियाणा के तत्कालीन गवर्नर गोविन्दराय ने बल्लम के प्रबल प्रहार से गौरी के दांत तोड़ डाले।

22 युद्धों के विजेता और शरीर पर अनेक घाव खाये हेमू की शौर्य गाथा अपनी मिसाल है। रेवाड़ी में जन्मे हेमू ने तराजू फेंक, तलवार संभाल, पचास हजार घुड़सवारों एक हजार हाथियों, 50 बड़ी तोपों, पांच सौ छोटी तोपों से सुसज्जित सेना के सहयोग से 6 अक्तूबर, 1956 को दिल्ली पर विजय प्राप्त की और विक्रमादित्य की उपाधि धारण कर सिंहासनारूढ़ हुआ। 5 नवंबर, 1556 को जब पानीपत के मैदान में हेमू का मुगल सेना से युद्ध हुआ तो दुर्भाग्य से शत्रु का एक तीर उसकी आंख में लगा और वह अचेत हो गया। उसकी सेना भाग खड़ी हुई। मुगल बादशाह अकबर ने बेहोश वीर हेमू की गर्दन काट डाली।

मुगल सेना से लोहा लेने वाले हसन खां मेव का योगदान भी अत्यंत सराहनीय था। मेरठ छावनी में जब विद्रोह की ज्वाला भड़की तो 9 मई, 1857 को सैनिकों का कोर्टमार्शल करके कैद की सजा दी गई। यह समाचार जब अम्बाला छावनी पहुंचा तो सैनिकों ने छावनी के गोला-बारूद पर अधिकार करके अफसरों को बंदी बना लिया। थानेसर में पांचवीं इन्फेंट्री ने विद्रोह किया। नूह तथा होडल पर विद्रोहियों का अधिकार हो गया। बहादुर शाह जफर के विश्वस्त हफज्जल खां के नेतृत्व में रोहतक में विद्रोह हुआ। बहादुर शाह जफर की सहायता करने पर हांसी के कानूनगो लाला हुक्मचंद तथा मिर्जा मुनीर बेग को फांसी दी गई। हांसी में क्रांतिकारियों को पत्थर की शिरड़ी के नीचे रौंदा गया। उदमीराम (लिवासपुर) को अंग्रेजों के कत्लेआम की सजा मिली।

अमर सेनानी राव किशन गोपाल ने मेरठ में कोतवाल की नौकरी ठुकरा कर अपने भाई राव राजा तुलाराम के साथ नये आयाम दिये। नसीबपुर के संघर्ष में इन्हें वीरगति प्राप्त हुई। महम के नवाब को फांसी पर लटका दिया गया। वहां का चबूतरा शहीदों का स्मारक है। झज्जर के नवाब अब्दुर्रहमान खां, फरूखनगर के नवाब अहमद अली गुलाम खां, बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह ने बहादुर शाह जफर को सहयोग दिया। झज्जर के नवाब को 23 दिसंबर, 1857 को लालकिले के सामने फांसी पर लटकाया गया। फरूखनगर के नवाब को 23 जनवरी 1858 को चांदनी चौक में सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई। राजा नाहर सिंह को अंग्रेजों ने धोखे से बल्लभगढ़ से दिल्ली बुलाया। 9 फरवरी, 1858 को दिल्ली के चांदनी चौक में इस नर-नाहर को सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई। उसके अंतिम शब्द थे-- ‘दीपक बुझ न जाये।’

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