अंतर्मन

देने की कला में निहित है सुख-सुकून

देने की कला में निहित है सुख-सुकून

रेनू सैनी

हम सभी बातचीत की कला, जीने की कला आदि से परिचित हैं। लेकिन क्या हम देने की कला से भी उतने ही परिचित हैं, जितने इन दो कलाओं से। वे व्यक्ति जो देने की कला से परिचित होते हैं, कम सामर्थ्य और सुविधाओं के होते हुए भी दूसरों के हृदय में अपना एक विशेष स्थान बना लेते हैं। संप्रेषण, बातचीत, पाक एवं जीने की कला सिखाने के लिए जगह-जगह केन्द्र एवं संस्थान बने हुए हैं। लेकिन देने की कला को सिखाने के लिए अभी तक ऐसे संस्थान नहीं हैं। यह कला आज भी परिवारों के द्वारा ही सिखाई जाती है अथवा स्कूलों मंे शिक्षक पर निर्भर करती है कि वे शिक्षा के साथ-साथ इस कला को कैसे विद्यार्थियों को सिखाते हैं।

देने की कला में सर्वाधिक योगदान सकारात्मक नज़रिए का होता है। इस संदर्भ में पैट्रिशिया नील कहते हैं कि, ‘प्रबल सकारात्मक मानसिक नज़रिए से जितने चमत्कार होते हैं, उतने किसी जादुई दवा से नहीं होते।’ इसलिए सकारात्मक सोच के कारण कुछ व्यक्ति अनेक बाधाओं के बावजूद भी आसमान का चमकता हुआ सितारा बन जाते हैं और अपनी देने की कला के कारण समय आने पर धन-दौलत, प्रसिद्धि सभी कुछ प्राप्त कर लेते हैं।

सोलापुर के सूखाग्रस्त गांव में जिला परिषद प्राइमरी स्कूल के शिक्षक रंजीत सिंह दिसाले को शायद कोई जान भी न पाता, यदि वे देने की कला का खूबसूरती से प्रयोग नहीं करते। उन्होंने अपनी सकारात्मक सोच के कारण पिछड़े इलाके में शिक्षा का नवीनीकरण कर न केवल गरीब विद्यार्थियों के अंदर शिक्षा की जोत जलाई, बल्कि ग्लोबल टीचर प्राइज अवॉर्ड जीतकर यह साबित कर दिया कि देने की कला ऐसी कला है जो दूसरे व्यक्तियों के जीवन स्तर को तो उच्च करती ही है, इसके साथ स्वयं के स्तर को भी इतना ऊपर उठा देती है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। उन्हीं की तरह के एक और शिक्षक हैं बिपिन बिहारी मिश्रा। वे ओडिशा के क्योंझर जिला स्थित राजनगर में छात्राओं के लिए हाई स्कूल चलाने में अपनी पूरी बचत लगा देते हैं। इस समय उनकी आयु 82 वर्ष है। उनका मानना है कि देने की कला का ज्ञान प्रत्येक बच्चे को दो-तीन साल की उम्र से ही सिखाना आरंभ कर देना चाहिए क्योंकि इस कला को प्रारंभ में ही सरलता से अपनाया जा सकता है। कई मायनो में जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता जाता है, वह लेने की आशा अधिक करने लगता है। इसलिए बड़े होने पर देने की कला को सरलता से अपनाना कठिन हो जाता है।

देने की कला व्यक्ति को जीवन के कई मोड़ों पर असीम खुशी देती है। वे इस संदर्भ में अपना ही उदाहरण देते हुए कहते हैं कि करीब दस साल पहले मेरी ज़मीन के दस्तावेजों में कुछ कमियां थीं। ज़मीन के स्वामित्व या उपयोग को लेकर मुझे आगे चलकर किसी परेशानी का सामना न करना पडे़, इसलिए मैंने उस कमी को कोर्ट से सुधरवाने का निर्णय लिया। मैं स्थानीय कोर्ट गया। शायद वहां उस समय ब्रेक चल रहा था। यह देखकर मैंने वहां उपस्थित व्यक्ति को अपना नाम लिखकर दिया और जज से मिलने की इच्छा प्रकट की। अर्दली पर्ची लेकर चला गया। पर्ची लेकर गए केवल कुछ ही सेकंड हुए होंगे कि तुरंत अंदर से एक व्यक्ति आया और उसने उन्हें चैम्बर में आने के लिए कहा। मैं जैसे ही चैम्बर में दािखल हुआ तो जज ने आते ही मेरे चरण स्पर्श किए। मैं दंग रह गया। मैंने कहा, ‘क्षमा करिए, मैंने आपको पहचाना नहीं।’ इस पर जज महोदय मुस्कराते हुए बोले, ‘पहले बताइए क्या काम है?’

मैंने तुरंत ज़मीन के दस्तावेज उनके सामने रख दिए। उन्होंने उन्हें पढ़ा। मुझे पता था कि इस कार्य के लिए वे गवाह को बुलाएंगे। मैं तुरंत बोला, ‘मुझे नहीं मालूम था कि काम इतनी जल्दी हो जाएगा। मैं गवाह कल लेकर आता हूं।’ उन्होंने कहा इस काम के लिए गवाह की कोई आवश्यकता नहीं है। सब कार्य पूर्ण होने पर जज महोदय बोले, ‘सर, यह उन दिनों की बात है, जब आप राजनगर हाई स्कूल में कुछ विद्यार्थियों को नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करते थे तो उनमें मैं भी एक छात्र था। तब आपने मुझे पैसे दिए और इस तरह मैं दसवीं कक्षा पार कर पाया। अगर आज मैं इस पद पर सुशोभित हूं तो केवल और केवल आप के कारण। मैंने जिस दिन इस पदभार को ग्रहण किया, उसी दिन यह निर्णय कर लिया था कि मैं हर अशक्त व्यक्ति की हरसंभव मदद करूंगा और आपकी देने की कला की इस शृंखला को टूटने नहीं दूंगा।’ मैं रुदन भरे स्वर में बोला, ‘देने की कला का सुख मिलता है, यह ज्ञात था, मगर अपरिमित एवं अपार मिलता है, यह आज ज्ञात हुआ।’

देने की कला व्यक्ति के अंदर सकारात्मक सोच का ही परिणाम होती है। इसलिए कुछ लोग अनगित बाधाओं एवं कमियों के होते हुए भी देना नहीं भूलते। वे हर मोड़ पर बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तुरंत उपस्थित हो जाते हैं। इसके विपरीत धनी एवं किसी कमी के न होते हुए भी कुछ लोग हर वक्त रोना ही रोते रहते हैं। शायद यही कारण है कि वे हर दम सुख और सुकून को तलाशते रहते हैं। सुख और सुकून कहीं बाहर नहीं, केवल देने की कला में छिपा है। अगर यकीन नहीं आता तो आज ही किसी जरूरतमंद व्यक्ति की नि:स्वार्थ मदद कर के देख लीजिए, जवाब आपको स्वयं मिल जाएगा।

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