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पाक सेना के तीर से अधीर हामिद मीर

पाक सेना के तीर से अधीर हामिद मीर

अरुण नैथानी

अरुण नैथानी

जाहिरा बात है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र सेना की जकड़ से छटपटाता रहता है तो लोकतंत्र की पैरोकार संस्थाओं की अस्मिता भी दांव पर ही होगी। पाक का अतीत बताता है कि वहां स्वतंत्र-निर्भीक पत्रकारिता करना तलवार की धार पर चलने जैसा रहा है। पत्रकारों पर लगातार हमले होना आम बात है। पत्रकारों का कहना है कि वर्ष 2018 से अब तक सरकार व सेना के दबाव में कम से कम तीन हजार मीडिया कर्मियों की नौकरियां गई हैं। अंतर्राष्ट्रीय संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर का कहना है कि पत्रकारों के लिये काम करने के लिहाज से पाकिस्तान दुनिया के पांच खतरनाक देशों में से एक है। बीते अप्रैल में ही पाक के वरिष्ठ पत्रकार अबसार आलम राजधानी इस्लामाबाद में अज्ञात हमलावरों की गोली से घायल हो गये थे। दरअसल, पत्रकारों पर अज्ञात लोगों द्वारा हमले किये जाते हैं, हमलावरों की पहचान कभी उजागर नहीं होती। हालिया चर्चा पाकिस्तान के मशहूर पत्रकार हामिद मीर को लेकर हो रही है, जिनकी सेना के खिलाफ की गई सख्त टिप्पणी के बाद उनके बहुचर्चित टीवी टॉक शो ‘कैपिटल टॉक’ का प्रसारण बंद कर दिया गया।

दरअसल, पिछले दिनों पाक सेना के आलोचक व पत्रकार असद अली तूर पर हुए हमले के खिलाफ आयोजित कार्यक्रम में हामिद मीर ने सेना को लेकर तल्ख टिप्पणी की थी। असद तूर के घर पर तीन अज्ञात लोगों ने हमला किया था। तूर का आरोप था कि उनसे मारपीट की गई और उनकी रिपोर्टिंग को लेकर चेतावनी दी गई। इसी बाबत मीर ने पत्रकारों पर लगातार हो रहे हमलों की जवाबदेही तय करने के साथ ही पत्रकारों पर हो रहे शृंखलाबद्ध हमलों में शामिल लोगों की पहचान उजागर करने की मांग की थी। हामिद मीर ने कड़े शब्दों में कहा था ‘आप हमारे घरों में घुसकर हमले कर रहे हैं। जाहिर है कि हम आपके घरों में घुसकर हमले नहीं कर सकते। आपके पास टैंक हैं, तोप हैं, मगर हम तमाम ऐसी बातें उजागर कर सकते हैं, जो आपके घर के भीतर की हैं।’

इस बयान के बाद पाक के बहुचर्चित टीवी चैनल जियो के प्रबंधकों पर सेना का दबाव बढ़ा और पाक के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक टॉक शो ‘कैपिटल टॉक’ को हामिद मीर द्वारा प्रस्तुत करने पर रोक लगा दी। चैनल के प्रबंधकों ने माना कि उन पर सेना का दबाव था। इसके खिलाफ राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया हुई। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि दमन करने वाले माहौल में मीडिया संस्थानों के सामने अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करने की जिम्मेदारी निभाने की बड़ी चुनौती है, जो जाहिर करता है कि पाक में प्रेस को वास्तविक आजादी हासिल नहीं है। यही वजह है कि सत्ता प्रतिष्ठानों के हस्तक्षेप के चलते इस साल के आरंभ में बीबीसी को अपने उर्दू के रोजाना बुलेटिन का प्रसारण स्थगित करना पड़ा था।

दरअसल, जियो टीवी पर बीस साल से कैपिटल टॉक कार्यक्रम होस्ट करने वाले हामिद मीर हमेशा से ही सत्ता प्रतिष्ठानों और सेना के निशाने पर रहे हैं। इससे पहले भी दो बार उन पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। दो बार उनकी नौकरी जा चुकी है। उन पर हमले भी हुए हैं। लेकिन उनका यह कार्यक्रम पाकिस्तान में बेहद लोकप्रिय है और सत्ताधीशों की तरफ से किसी कार्रवाई पर पाकिस्तानी अवाम की तरफ से तल्ख प्रतिक्रिया सामने आती है।

एक पत्रकार के परिवार में 23 जुलाई, 1966 में लाहौर में जन्मे हामिद मीर वारिस मीर व मुमताज मीर की संतान हैं। उन्होंने एक पत्रकार, स्तंभ लेखक व संपादक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनायी। दो संतानों के पिता मीर दबंग पत्रकारिता के लिये जाने जाते हैं। आतंकवाद से जुड़े विषयों के विशेषज्ञ व सुरक्षा मामलों के जानकार मीर पाकिस्तान के मशहूर अखबार जंग के जियो टीवी से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। वर्ष 2011 में जब उन्हें तालिबान से धमकी मिली थी तो उनका एक बयान खासा चर्चित हुआ था कि वह उनसे मिलने सिर्फ कलम लेकर आएंगे। वे बड़ी हस्तियों के साक्षात्कार लेने के लिये चर्चित रहे हैं, इनमें ओसामा बिन लादेन, कोलिन पॉवेल तथा लालकृष्ण आडवाणी भी शामिल रहे हैं। बलूचिस्तान में सेना द्वारा लोगों के अधिकारों के हनन का मुद्दा मीर ने जोरदार ढंग से उठाया था। इसके बाद मीर को 19 अप्रैल, 2014 में जियो न्यूज के दफ्तर जाते वक्त मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने छह गोलियां मारी थीं, ड्राइवर द्वारा बहादुरी दिखाते हुए गाड़ी भगा ले जाने से उनकी जान बचायी जा सकी थी। तब प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने न्यायिक जांच के लिये तीन सदस्यीय कमेटी बनायी थी और हमलावर को पकड़वाने के लिये एक करोड़ का इनाम भी घोषित किया था। वर्ष 2012 में भी उन्हें मारने के लिये उनकी कार के नीचे बम लगाया गया था, जिसे बाद में निष्क्रिय कर दिया गया था। यही वजह है कि उनका कार्यक्रम स्थगित किये जाने के बाद मीर ने कहा कि प्रतिबंध के बावजूद संविधान से मिले अधिकारों के लिये मैं आवाज उठाता रहूंगा। अब कहा जा रहा है कि सरकार व सेना के दबाव के बाद कुछ पत्रकार संगठनों द्वारा जारी बयान में मीर ने कहा है कि उनका इरादा सेना की छवि को धूमिल करने का नहीं था और न ही उन्होंने भाषण में किसी का नाम लिया था।

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