नेताओं का विकास ठीक-ठाक हो जाये, इसके लिए शहरों को पिछड़ना पड़ता है। अगर शहर का भी विकास हो जाये, तो नेता का विकास कैसे होगा।
कुछ शहरों की सड़कें इतनी टूटी-फूटी होती हैं कि वह शहर बहुत पिछड़ा हुआ लगता है। पर पिछड़े शहरों के नेता बहुत विकसित हो जाते हैं, बड़े-बड़े फार्म हाऊस, बड़ी-बड़ी गाड़ियां, नेताओं का विकास हो जाता है, शहर पिछड़ जाता है। नेताओं का विकास ठीक-ठाक हो जाये, इसके लिए शहरों को पिछड़ना पड़ता है। अगर शहर का भी विकास हो जाये, तो नेता का विकास कैसे होगा।
मुंबई, मुंबई वालों के लिए ऐसी समस्या है, जिसे वे न छोड़ सकते, न उसमें खुश रह सकते। मुंबई के हालचाल देखकर मुंबई वाले रोते हैं, तो दूसरे छोटे शहर वाले अपने शहर के सड़कों के गड्ढों को देखकर यही संतोष कर लेते हैं कि जब मुंबई जैसे शहर में सुनवाई न हो रही है, तो हमारी क्या औकात है। पर मुंबई की चर्चा बहुत होती है। अभी मुंबई के नगर निगम के चुनाव के रिजल्ट ऐसे पेश किये गये, मानो केंद्रीय चुनाव के रिजल्ट हों। वजह यह बतायी गयी कि इस निगम के पास बहुत ही मोटा बजट है, जिसके पास मोटा बजट होता है उसकी चर्चा बहुत होती है। एक कारोबारी थे मेरे शहर में, कविता का शौक लग गया उन्हें। वह तमाम कवियों को बुलाकर कविता सुनाते थे, खिलाते पिलाते थे। कई कवियों ने उन्हें महाकवि घोषित कर दिया। फिर वह कारोबारी कवि कुछ घोटालों में धरे गये, सब धंधा चौपट हो गया। फिर कवियों ने उन्हें महाकवि तो क्या कवि भी नहीं, इंसान तक मानने से इनकार कर दिया, मिलना-जुलना बंद। गुण सारे धन में होते हैं, बाकी सब मोह माया है।
मुंबई शहर अमीर है, नेता अमीर हैं, सड़कें गरीब हैं। नेता कहते हैं कि ‘इस बार हम मुंबई को शंघाई बना देंगे।’ सड़कें गरीब की गरीब रहती हैं, नेता विकसित हो जाता है। यूं हर बजट में गरीबों का ख्याल रखा जाता है। मुंबई के नगर निगम के बजट की बहुत बहुत चर्चा होती है। मुंबई नगर निगम का बजट ऐसा है जैसे एलियन या भूत, बताते सब हैं, दिखता किसी आम आदमी को नहीं। मुंबई की खस्ताहाल नालियां इस बजट की तलाश में न जाने कब से भटक रही हैं। खैर, बजट में हर साल ‘स्मार्ट सिटी’ का वादा आता है, लेकिन स्मार्ट सिर्फ नेता की स्पीच होती है। वादे-वादे हर चुनाव में वादे—गड्ढे भर जाएंगे। पानी समय पर मिलेगा। ट्रैफिक कम होगा। अस्पतालों में इलाज आसान होगा। पर गड्ढे भरने से पहले चुनाव आ जाते हैं। ट्रैफिक कम नहीं होता, बस नेता का भाषण लंबा हो जाता है।
हर साल वादे डूब जाते हैं, नेता उबर कर फिर आ जाते हैं, वादों के नये सैट लेकर। लोकतंत्र विकल्प यह देता है कि इसके वादे सुन लो या उसके वादे सुन लो। वादों से अगर बिजली बनाना संभव हो जाये, तो हर चुनाव के बाद कई भारतीय शहर बिजली का निर्यात करने में सक्षम हो जायेंगे।

