कोयंबटूर की जनता ने तय कर लिया कि जब भी कोई ऐसी विकास परियोजना लागू होगी तो जद में आ रहे सारे पेड़ों को स्कूल, पार्क, मंदिर परिसर या किसी ग्रीन बफर ज़ोन में स्थानांतरित किया जाएगा। फलत: कुछ ही सालों में 5,000 पेड़ स्थानांतरित किए गए। इनमें 85 फीसद पेड़ लहलहा रहे हैं।
बेशक, हरियाली खुदा की सबसे बड़ी नेमतों में से एक है। इसी से जीवन में आशा, उमंग और ताज़गी जैसे भाव जागते हैं। सड़क चौड़ीकरण, हाईवे निर्माण या विकास की किसी दूसरी परियोजनाओं के लिए जब पेड़ रुकावट बन जाते हैं तो उन्हें काटने का दर्द अब हर नागरिक को समझ में आने लगा है। तमिलनाडु के कोयंबटूर शहर के लोगों को तब बहुत दुख हुआ जब सड़क चौड़ीकरण की वजह से 7,600 पेड़ों को खत्म कर दिया था। यह दुख इतना गहरा था कि वहां की कोयंबटूर की जनता ने तय कर लिया कि जब भी कोई ऐसी विकास परियोजना लागू होगी तो जद में आ रहे सारे पेड़ों को स्कूल, पार्क, मंदिर परिसर या किसी ग्रीन बफर ज़ोन में स्थानांतरित किया जाएगा। फलत: कुछ ही सालों में 5,000 पेड़ स्थानांतरित किए गए। सुखद परिणाम यह आया कि इनमें 85 फीसद पेड़ लहलहा रहे हैं यानी पेड़ों को नई जगह रास आ गई है। एक स्वचेतना अभियान यह भी सफल हो रहा कि लोगों ने अपने लिए एक नियम बनाया कि हर कटने वाले पेड़ के बदले लोग दस पौधे लगा रहे तथा उसकी देखभाल का जिम्मा भी खुद ही ले रहे।
इसी तरह पेड़ों को बचाने के कई छोटे-छोटे ही सही अभियान में लोगों की रुचि बढ़ती जा रही। पेड़ों के कटने से दुखी हैदराबाद के रामचंद्र अप्पारी ने भी ट्री ट्रांसलोकेटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया तथा इसी तकनीक से वे हैदराबाद के करीब पांच हजार पेड़ों को नई जगह दे चुके हैं। उनकी कंपनी ग्रीन मॉर्निंग हॉर्टिकल्चर सन् 2010 से काम कर रही है। वे कहते हैं वर्ष 2008 में हैदराबाद की सड़कों को चौड़ी करने के लिए पेड़ कटने लगे तब उन्हें बहुत दुख हुआ। तब ऑस्ट्रेलिया में रह रहे अपने दोस्त से पेड़ों को स्थानांतरित किए जाने के उपायों पर पूछा। बस तभी से अब अपनी कंपनी के मार्फत सात हजार से ज्यादा पेड़ों को नया जीवन दे चुके हैं।
दरअसल, एक पेड़ को शिफ्ट करने की लागत दस हजार रुपये से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक आती है। वर्ष 2010 में स्थापित उनकी कंपनी ग्रीन मॉर्निंग हॉर्टिकल्चर का टर्न ओवर लगातार बढ़ रहा है। वे कहते हैं हर शहर में प्रशासन को पेड़ों को स्थानांतरित करने के टेंडर निकालने चाहिए तथा इस तकनीक को बढ़ाना चाहिए। कम होते पेड़ों के लिए यह तकनीक वरदान साबित होगी। हैदराबाद के ही वट फाउंडेशन के प्रमुख पेडि रेड्डी वर्ष 2010 से पेड़ बचाने का काम कर रहे हैं। पेड़ों के प्रति इतना लगाव है कि अब तक करीब 2200 पेड़ों को नया जीवन दे चुके हैं।
नेचर जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार मानव सभ्यता की शुरुआत से मौजूदा पेड़ों की संख्या में अब तक 46 फ़ीसदी की कमी आ चुकी है। दुनियाभर में हर साल दस अरब पेड़ काटे जा रहे हैं जबकि हर साल सिर्फ पांच अरब पेड़ ही लगाए जा रहे है। चिंता की बात यह भी है कि हर दो सेकंड में एक फुटबॉल के मैदान जितना जंगल काटा जा रहा है। अकेले भारत में दस लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जंगल कट रहे हैं।
ग्लोबल वार्मिंग तथा प्रदूषण की मार झेलते शहरों के लिए पेड़ों की कमी भी जिम्मेदार है। हमारे शास्त्रों में भी लिखा गया है कि एक पेड़ लगाना सौ गायों का दान देने के समान है। पद्मपुराण में जिक्र है कि जलाशय के निकट पीपल का पेड़ लगाने से व्यक्ति को सैकड़ों यज्ञों के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि पेड़ों की कतार धूल मिट्टी को 75 फीसद तक कम कर देती है और 50 फीसदी तक शोर को कम करती है। जो इलाका पेड़ों से घिरा होता है वह दूसरे दूसरे इलाकों की तुलना में 9 डिग्री ठंडा रहता है। वहां का एक पेड़ इतनी ठंडक पैदा करता है जितना एक एसी दस कमरों में 20 घंटों तक चलने पर करता है।
कम होते पेड़ों की वजह से कई दुष्प्रभाव होते हैं, जिसमें प्राकृतिक बाधाएं भी शामिल हैं। वनों की कटाई की वजह से भूमि का क्षरण होता है क्योंकि वृक्ष पहाड़ियों की सतह को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वनों के विनाश के कारण वन्यजीव खत्म हो रहे हैं। पेड़ों की कई प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर हैं तथा कुछ तो लुप्त हो गई हैं। वनों की कटाई से वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है। बारिश भी अनियमित हो जाती है। इन सबके कारण ‘ग्लोबल वार्मिंग’ में इजाफा होता है। रेगिस्तान फैल रहा है। नदियों का पानी उथला कम, गहरा तथा प्रदूषित हो रहा है क्योंकि उनके किनारों और पहाड़ों पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। जंगल के लिए आदिवासियों का अस्तित्व आवश्यक है। जंगल का उपयोग कैसे करना है आदिवासियों को इसकी पूरी जानकारी रहती है क्योंकि वन संरक्षण के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान होता है। पौधारोपण की कमी के कारण इस अनमोल प्राकृतिक संपत्ति का तेजी से क्षरण हो रहा है, जो जीवन और पर्यावरण के संतुलन को खराब कर रहा है। जंगल की कटाई के कारण जंगली जानवर गांवों में शरण ले रहे हैं।
जोधपुर के खेजडली गांव में 230 वर्ष पूर्व 363 लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान तक दे दी थी। तब से लेकर आज तक उस गांव में बलिदान दिवस मनाया जाता है। इसके तहत वहां मेला लगता है, जिसमें विश्नोई समाज के हजारों लोग शिरकत करते हैं तथा बलिदानियों को श्रद्धांजलि देते हैं।
वैसे भारत में कुछ साल पहले ‘चिपको आंदोलन’ काफी चर्चित हुआ था, जिसके अगुवा सुंदरलाल बहुगुणा थे। दरअसल, यह आंदोलन इसलिए प्रारम्भ किया गया था कि भारत के उत्तरी क्षेत्र में सरकार ने पेड़ों की अंधाधुंध कटाई प्रारम्भ कर दी थी। सुंदरलाल बहुगुणा ने सैकड़ों की संख्या में ग्रामीणों को एकत्र किया और इनमें से एक ग्रामीण एक पेड़ से चिपक गया ताकि उसे काटा न जा सके। इस आंदोलन को काफी सफलता मिली थी।

