भूख और बाजार का वैश्विक संघर्ष

भूख और बाजार का वैश्विक संघर्ष

हर्षदेव

हर्षदेव

किसान कई अन्य देशों में भी अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। इन देशों में जर्मनी, हालैंड, फ्रांस भी शामिल हैं। जर्मनी के किसान उपज के वाजिब दाम न मिलने और पर्यावरण रक्षा के नए कायदों से खासे नाराज हैं। राजधानी बर्लिन में कुछ महीने पहले 40 हजार से ज्यादा किसान हजारों ट्रैक्टरों के साथ जमा हो गए। हालैंड में किसानों की बड़ी शिकायत पर्यावरण के नए नियमों से है। किसान आंदोलनों का गवाह अमेरिका भी रहा है। वहां 1980 के बाद आंदोलन इसलिए नहीं हुए, क्योंकि खेती की ज्यादातर जमीन पर कॉर्पोरेट कम्पनियों का कब्ज़ा हो चुका है। फिर भी सरकार को बहुत भारी मात्रा में उपज पर सब्सिडी देनी पड़ती है।

हर किसान आंदोलन दरअसल भूख और भण्डार (बाजार) की लड़ाई है। कहना गलत नहीं होगा कि बाजार पर हमेशा जमींदार, जागीदार या शासक ने किसी न किसी रूप में अधिकार बनाए रखा है। यही वजह है कि मांग से ज्यादा खाद्यान्न पैदा होने के बावजूद भारत में 19 करोड़ लोगों को भूखा सोना पड़ता है। यह तथ्य संयुक्त राष्ट्र खाद्य सुरक्षा की 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक है। अफ्रीका के कई साधनहीन देशों में तो स्थिति भुखमरी की बनी हुई है। देश में चल रहा वर्तमान किसान आंदोलन उसी संघर्ष की कड़ी का एक हिस्सा है। यह वस्तुतः बाजार के कब्जेदारों और किसानों का संघर्ष है। बाजार पर दुनियाभर के देशों की निर्भरता जितनी बढ़ती गई है, उसी अनुपात में किसानों का हक़ छीनने के हथियार पैने होते गए हैं। बाजार पर आधिपत्य रखने वालों ने इसका उपाय खेती की जमीन को ही अपने कब्जे में ले लेने के तरीके के रूप में खोज लिया। अमेरिका और यूरोप के अनेक देशों में यह किया जा चुका है।

खेती की जमीन पर किसानों के बजाय बाजार नियामकों के कब्जे के विचार को सुसंगत शक्ल देने के काम डॉ. विलियम हेफ्फरमैन ने किया। मिसूरी विश्वविद्यालय में ग्रामीण समाज शास्त्र के विभाग प्रमुख डॉ. हेफ्फरमैन ने एक अध्ययन के आधार पर कृषि के औद्योगिकीकरण की बात कही और बताया कि आने वाले समय में समूची खाद्य शृंखला पर कुछ गिनी-चुनी कम्पनियों का आधिपत्य हो जाएगा।

डॉ. हेफरमैन ने अपने निष्कर्षों में बताया था कि खाद्य शृंखला के क्षेत्र में संरचनात्मक परिवर्तन इतने व्यापक और प्रबल होंगे कि कृषि नीति की योजनाओं के दायरे में रहकर उनके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। उन्होंने इन परिवर्तनों को ‘कृषि का औद्योगिकीकरण’ का नाम दिया। और, उसी के नतीजे में अब आर्थिक शब्दावली में ‘खाद्य उत्पादन’ जैसे पदबंध इस्तेमाल किए जाने लगे हैं। उनका कहना था कि नई खाद्य व्यवस्था के बाहर रहकर कृषि नीति बनाना संभव नहीं होगा।

इस संदर्भ में यह जानना भी जरूरी है कि समूची खाद्य शृंखला पर कुल जमा चार बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा हो चुका है। ये हैं कारगिल (विलियम वैलेस कारगिल द्वारा 1885 में स्थापित खाद्यान्न खरीद, भण्डारण और बिक्री करने वाली वैश्विक कम्पनी), एडीएम (आर्चर डेनियल मिडलैंड कंपनी), कोनआग्रा (खाद्य प्रसंस्करण की वैश्विक कम्पनी) और मोनसेंटो (जैविक परिवर्तन वाले बीज और फसल की शुरुआत करने वाली पहली कम्पनी)। मोनसेंटो ने ऐसे बीज तैयार कर लिए जिनका एक बार की फसल में ही उपयोग हो सकता है। इस प्रकार मुठ्ठीभर कम्पनियों के हाथ में पूरी खेती की बागडोर आ जाने का एक परिणाम यह हुआ कि बीज, खाद, सिंचाई, उपज की मात्रा जैसी सूचनाओं की सही जानकारी मिलना भी दूभर होता गया। ये कंपनियां क्योंकि विश्वस्तर पर कारोबार कर रही हैं, फलतः आप यह पता ही नहीं लगा सकते हैं कि किस देश में वे किस नीति को लागू किए हुए हैं। इसके साथ ही अपने विशाल कारोबार में उन्होंने दर्जनों छोटी कंपनियों को भी सहयोगी के रूप में भागीदार बनाया हुआ है।

खेती किसानी के भविष्य के बारे में डॉ. हेफरमैन जैसे अमेरिकी समाजशास्त्रियों और उनके विचारों पर चलने वाले कारोबारियों ने पहले ही बहुत सटीक खाका तैयार कर लिया था। उन्होंने कहा था कि यदि अगले दशक में खेती की जमीन के कुल मालिक 25 हजार रह जाएं तो बहुत बड़ी तादाद में लोग इस काम से छुट्टी पा लेंगे। बाद में अमेरिकी सरकार ने इन सिफारिशों को लागू करना शुरू किया और जो किसान अपनी जमीन छोड़ने के लिए तैयार थे, उनके लिए पर्याप्त धन देने की व्यवस्था की गई। सरकार ने नारा दिया था, ‘हम हर खेत को नहीं बचा सकते लेकिन हम हर किसान परिवार को बचा लेंगे।’

भारत जैसे कमजोर देशों पर इन्हीं एकाधिकारवादी नीतियों को अपनाने की बाध्यता विश्व व्यापार संगठन समझौते के कारण है। खेती-किसानी करनी है तो अब किसान को खेत मालिक के रूप में नहीं, मजदूर बनकर खेती करनी होगी। मजदूरी का मेहनताना उनको मिलेगा। सबसे पहले अमेरिका इसकी मिसाल बना। वहां 1980 के दशक की शुरुआत तक किसानों ने फसल के बाजिब मूल्य के लिए निरंतर संघर्ष किया। यहां तक कि दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलनरत किसानों की ही तरह अमेरिका में भी तब कई हजार किसान ट्रैक्टरों के साथ राजधानी वाशिंगटन में जा धमके। उसी के नतीजे में सरकार ने ऐसे नियम-कानून बनाए कि किसानों की मांगों को पूरा करने के नाम पर कृषि भूमि पर धीरे-धीरे कॉर्पोरेट घरानों/बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कारोबारी कब्ज़ा हो गया।

ठीक यही काम कृषि सुधार का लक्ष्य बताकर लाए गए तीन नए कानून करेंगे। इन कानूनों के पीछे अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित ही काम कर रहे हैं। इसीलिए जो बाइडेन की सरकार ने भी इन कानूनों के प्रति समर्थन व्यक्त किया है। नए कानूनों की इबारत 1990 के दशक से ही तैयार की जा रही थी। डॉ. विलियम हेफरमैन अपने प्रतिपादन में कृषि की ही बात नहीं करते हैं, वह मांसाहारी जनता के लिए उपयोग में आने वाले पशुओं के कारोबार पर नियंत्रण की बात भी करते हैं। उन्होंने विभिन्न पक्षियों, दुग्ध उत्पादक मवेशियों और खाद्य के रूप में प्रयुक्त पशुओं के मुद्दों का भी कृषि और ग्रामीण समाज शास्त्रीय दृष्टि से अध्ययन किया और बताया कि मनुष्य जाति के लिए भोजन अनिवार्य और निरंतर बनी रहने वाली जरूरत है। इसके फलस्वरूप भविष्य में आर्थिक शक्ति उसी के हाथ में होगी, जिसका कृषि और खाद्य शृंखला पर नियंत्रण रहेगा। इस नियंत्रण के लिए हम आने वाले समय में घोर प्रतिस्पर्धा देखेंगे।

यह जानना उपयोगी होगा कि एडीएम कंपनी खाद्य वस्तुओं का प्रसंस्करण और उनके वाणिज्य से जुड़ी हुई विश्व की सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी है जिसकी 2019 में आय 64.66 अरब डालर थी। इस अमेरिकी घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भारत के किसानों के लिए यह है कि वहां भी खेती के कारोबार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने का फैसला न बहुमत से हुआ और ना ही जनता की राय से। यह सोचा-समझा निर्णय उन पर थोप दिया गया और ऐसा करने वाले लोगों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक थी। कह दिया गया कि यही उचित है। हालांकि अब फिर नए सिरे से वर्तमान खाद्य व्यवस्था को लेकर पेचीदा सवाल उठ रहे हैं और भविष्य की पीढ़ियों का हवाला देकर उनके जवाब मांगे जा रहे हैं। निश्चय ही, भारत का किसान आंदोलन जर्मनी या अन्य देशों में संघर्षरत खेती करने वालों के लिए मार्गदर्शन का काम करेगा।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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