प्रधानमंत्री जी ने 31 मई, 2026 को मल्हार का नाम लेकर मानो हम सबके मन की बात कह दी। मल्हार, सदियों-पीढ़ियों से हम छत्तीसगढ़ियों के मन में जो बसा है। बिलासपुर जिले के प्रसिद्ध पुरातत्वीय स्थल मल्हार ग्राम सीमा के निकट जुनवानी ग्राम स्थित है। प्राचीनता और पुरावशेषों की दृष्टि से जुनवानी मल्हार से अभिन्न ही है। मल्हार क्षेत्र से प्राप्त आरंभिक अभिलेख ब्राह्मी लिपि का प्रतिमा लेख है, जो विष्णु प्रतिमा पर दान के उल्लेख युक्त उत्कीर्ण है, इस काल के अन्य लेख स्मृतिपरक हैं।
परवर्ती काल के मेकल के सोमवंशी, शरभपुरीय, कलचुरी आदि राजवंशों के अभिलेख भी यहां प्राप्त हुए हैं। श्रीपुर के सोम-पाण्डुवंशी शासकों के अभिलेख तथा महाशिवगुप्त बालार्जुन के ताम्रलेख व शिलालेख भी प्रकाश में आए हैं। विवरणाधीन यह ताम्रलेख राजमुद्रा व छल्ले में गुंथे तीन पत्र, सन् 1987 के अंत में ग्राम जुनवानी अथवा मल्हार सीमा में कृषकों को प्राप्त हुआ था। राजमुद्रा का व्यास 9 सेमी. तथा संपूर्ण ताम्रलेख का मुद्रा सहित भार 2900 ग्राम है। ताम्रलेख के दायें हाशिये में छिद्र है, जिसमें गुंथे छल्ले के दोनों छोर मुद्रा से जुड़े हैं। मुद्रा के ऊपरी भाग में त्रिशूल और कमण्डलु के मध्य बैठे हुए नन्दी की आकृति है, इसके नीचे दो पंक्तियों का लेख है। सबसे नीचे पूर्ण विकसित पद्म है।
तीन पत्रों वाले इस लेख में कुल 41 पंक्तियां उत्कीर्ण हैं। प्रथम पत्र के बाह्य पार्श्व के मध्य में मात्र एक पंक्ति में तिथि अंकित है। शेष पांच पृष्ठों पर आठ-आठ पंक्तियां उत्कीर्ण हैं, इस दृष्टि से यह लेख महाशिवगुप्त बालार्जुन के अब तक ज्ञात ताम्रपत्र लेखों में सर्वाधिक लम्बा है, साथ ही 57वें राज्य वर्ष के फाल्गुन मास का होने के कारण अद्यतन ज्ञात अंतिम लेख भी है। पेटिकाशीर्ष ब्राह्मी लिपि वाले लेख की भाषा संस्कृत है। अक्षर सुडौल तथा गहराई से खुदे हैं। श्लोकों तथा मुद्रालेख के अतिरिक्त शेष लेख गद्य में हैं। लेख का उद्देश्य धार्मिक दान है।
ऐसा प्रतीत होता है कि इस लेख द्वारा दान में दी गई भूमि तत्कालीन व्यस्त क्षेत्र में रही होगी, अतः विवाद की संभावना होने से भूमि का माप स्पष्ट किया गया है।
साभार : बस्तर की आवाज डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम

