राजस्थान

दूर नहीं हुए गहलोत-पायलट के गिले-शिकवे

दूर नहीं हुए गहलोत-पायलट के गिले-शिकवे

यश गोयल

यश गोयल

एक माह बाद घर लौटे सचिन पायलट समर्थित विधायकों की ‘राजनीतिक इच्छा’ बरकरार है। कुल 32 दिन तक हरियाणा सरकार की शरण में रहने के बाद सचिन पायलट समर्थित 19 विधायक गहलोत सरकार के विधानसभा में शक्ति-परीक्षण से एक दिन पहले लौट आये थे। उनकी सोच थी कि पार्टी हाईकमान उनकी मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगा। मगर, ऐसे आसार दिख नहीं रहे।

वास्तव में 14 अगस्त को विधानसभा के विशेष-सत्र में अशोक गहलोत सरकार का 124 मतों से विश्वास जीत जाना विपक्षी भाजपा को घोर निराशा में डाल गया। यह प्रकरण पायलट खेमे को भी अलग-थलग कर गया। गत एक माह में पार्टी नेतृत्व ने कोई संकेत नहीं दिया कि पायलट जिन्हें डिप्टी सीएम और प्रदेश अध्यक्ष, विश्वेंद्र सिंह को टूरिज्म मंत्रालय और रमेश मीणा को खाद्य मंत्रालय पदों से हटाया गया, उन्हें कोई पद वापस दिया जायेगा। 16 अन्य विधायकों की कोई राजनीतिक पद-विभाग पाने की अभिलाषा भी पूरी नहीं हुई।

गहलोत सरकार के मजबूती से लौटते ही कांग्रेस के महासचिव अविनाश पाण्डे को राजस्थान प्रभारी पद से हटा कर अजय माकन को पदस्थ किया गया। अविनाश गहलोत के इशारे पर पीसीसी चला रहे थे और पायलट को साइड लाइन किया जा रहा था। पार्टी में लौट आने की मांगों को सुलझाने और न्याय दिलाने के लिए एआईसीसी ने अहमद पटेल के नेतृत्व में तीन सदस्यीय कमेटी बनाई थी, जिसमें अजय माकन और राज्य से चुने राज्यसभा एमपी वेणुगोपाल भी हैं। इस माह के प्रारंभ में माकन के पांच दिवसीय दौरे पर मुख्यमंत्री गहलोत और पायलट ने उनका ऐसे व्यक्तिगत स्वागत किया जैसे कोई जांच कमेटी का निष्पक्ष सदस्य राज्य में पहली बार आया हो। माकन दूसरे दिन ही दिल्ली लौट गये। जाते-जाते माकन ये कह गये कि गहलोत सरकार के सभी मंत्री 2 अक्तूबर को अपनी जन घोषणा-पत्र की उपलब्धियों पर रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत करें और पार्टी लीडर्स बतायें कि उन्होंने संगठन के लिए क्या-क्या किया?

माकन के दूसरे प्रस्तावित दौरे से पहले पायलट अपने चुनाव क्षेत्र टोंक और अन्य जिलों में भी खोया हुआ संपर्क साधने गये। उन्हें हर जगह अभूतपूर्व समर्थन और प्यार मिला। मीडिया प्रचार भी मिला। यही नहीं, पायलट के 43वें जन्मदिन (7 सितंबर को) पर 200 विधानसभा क्षेत्रों में पायलट के प्रशंसकों ने 45000 यूनिट रक्तदान करके विश्व कीर्तिमान स्थापित किया।

विधानसभा सत्र के बाद जो मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा चली वह तब ठंडी हो गयी जब राज्य चुनाव आयोग ने 3848 ग्राम पंचायतों में 4 चरणों में चुनाव घोषित कर दिये। माकन ने दूसरे दौरे में जयपुर और अजमेर संभाग में कार्यकर्ताओं और एमएलए के मन टटोलने की बैठकें, और सत्ता-संगठन को मजबूत करने की परख की, मगर अजमेर जिले में पायलट समर्थकों ने माकन के समक्ष नारेबाजी की और धरना दिया। वे माकन से मुलाकात कर पायलट को तुरंत सत्ता में लेने की वकालत कर रहे थे। भूतपूर्व विस अध्यक्ष और पायलट ग्रुप के विधायक दीपेंद्र सिंह शेखावत ने माकन को अपने सुझाव बंद लिफाफे में दिये। अन्य मसलों में विधायकों ने माकन से किसानों के बिजली बिल माफ करने, कर्मचारी ट्रांसफर और राजनीतिक नियुक्तियों पर जोर दिया, जो सब मुख्यमंत्री के दायरे में आते हैं।

इसी बीच, कांग्रेस हाईकमान ने कई नये महासचिव बनाये हैं। राजस्थान के अलवर से भंवर जीतेंद्र सिंह (राहुल गांधी के मित्र) और उदयपुर के रघुवीर मीणा को सदस्य बनाया। यही नहीं, बाड़ाबंदी में गहलोत के साथ रही क्राइसिस मैनेजमेंट टीम के नेताओं सुरजेवाला, विवेक बंसल और माकन को भी सीडब्ल्यूसी में लिया गया। मगर, पायलट ग्रुप के 19 में से किसी का नंबर नहीं लगा।

पायलट ने गुर्जर आरक्षण का एक पासा फेंक कर अपने समुदाय को जगाने का प्रयास किया। मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में पायलट ने सरकारी भर्तियों में पांच प्रतिशत एसबीसी आरक्षण की पालना न होने की बात कही। तत्काल ही गहलोत ने दूसरा पासा फेंक, 15 प्रभारी-मंत्रियों के जिले बदल दिये, जिसमें पायलट के टोंक जिले का प्रभारी बनाया डॉ. रघु शर्मा को जो हैल्थ मिनिस्टर भी हैं। हटाये गये मंत्री विश्वेंद्र सिंह का करौली-धौलपुर का प्रभार हटा कर अन्य मंत्रियों को दे दिया। इसी तरह भूतपूर्व मंत्री रमेश मीणा से झालावाड़, बारा का प्रभार छीन लिया।

बहरहाल, मंत्रिमंडल विस्तार होने की संभावना दूर-दूर तक नहीं है। राजनीतिक नियुक्तियां कब और कैसे होंगी, कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता। दिलचस्प है कि अशोक गहलोत के पास 20 मंत्रालय हैं, जिनमें वित्त और गृह प्रमुख हैं। मंत्रिमंडल विस्तार में गहलोत के लिए बसपा से आये 6, कई समर्थित निर्दलीयों को कोई न कोई पद (मंत्री/राजनीतिक नियुक्ति) देने की प्राथमिकता रहेगी।

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