हम बदलाव के गवाह बनें, सिर्फ़ एक खास दिन ही नहीं, बल्कि साल के हर दिन। ताकि यदि कोई एक भी महिला अपने ही किसी करीबी के अन्याय-दुर्व्यवहार के खिलाफ़ आवाज़ उठाए और कहे कि ‘ना का मतलब ना होता है’, तो उसे पता हो कि आप उसके साथ खड़े हैं।
पिछले कुछ हफ़्तों में, महिलाएं एक बार फिर से राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में हैं, कि उन्हें क्या कहना चाहिए, कितना बोलना चाहिए और कब चुप हो जाना चाहिए। सबसे ऊपर यह कि जब कोई महिला ‘न’ कहे, चाहे धीरे से या ज़ोर से तो पुरुष रुकते क्यों नहीं?
पितृसत्ता के बारे में सदियों से बहुत कुछ कहा गया है, लेकिन हालिया ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के विरोध-प्रदर्शन के दौरान लगे नारे, या कोई एक खबर रही जिसने इस शब्द की जटिलता को बखूबी बयां किया। जो इंस्टाग्राम पर भी खूब छाई रही : एक युवती कह रही थी कि अपनी मां को विरोध-प्रदर्शन में लाने से डरें नहीं कि आंसू गैस का गोला लगने पर वह रो पड़ेंगी; क्योंकि पितृसत्ता ने उनके सारे आंसू पहले ही सुखा दिए हैं। तंजयुक्त छोटे से इस गंभीर वाक्य में, इस महिला प्रदर्शनकारी ने हमें गहन मंथन को बाध्य किया। हम घर-बाहर महिलाओं के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं, मानो उनकी कोई आवाज़ ही न हो और न ही आवाज़ उठाने की क्षमता?
हमने वह वीडियो देखी हैं जिसमें 20 जुलाई को संसद तक हुए सीजेपी के विरोध-प्रदर्शन में पुलिसकर्मी एक युवती से लाठी से अक्षम्य कृत्य कर रहा था और एक पुरुष आईपीएस अधिकारी एक महिला प्रदर्शनकारी को थप्पड़ मार रहा था। अब तक हमने ‘द ट्रिब्यून’ समेत कई मीडिया माध्यमों पर उन युवतियों के इंटरव्यू सुने हैं, जिन्होंने बताया कि विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने के बाद उन्हें किस तरह की गालियों और बदसलूकी का सामना करना पड़ा—जिनमें से ज़्यादातर यौन-उत्पीड़न से जुड़ी थीं। हमने सुना है कि कैसे कई महिलाओं की पहचान उनकी मर्ज़ी के बिना सार्वजनिक कर दी गई– इसको लेकर हमारी शब्दावली में नया शब्द ‘डॉक्सिंग’ शब्द शामिल हुआ था; यह शब्द 1990 के दशक की शुरुआत में पश्चिम की हैकर संस्कृति से आया है। इसका शाब्दिक अर्थ है किसी दस्तावेज़ को ‘ड्रॉप’ करना या साझा करना—और कैसे इन महिलाओं को तंग किया गया और धमकियां दी गईं, क्योंकि आरोपी पुरुष, जो कि पूरी तरह अनजान थे, उन्हें लगा कि इन महिलाओं को उनकी ‘औकात’ दिखाना ज़रूरी है।
ऐसे समय में 2012 में वीभत्स निर्भया गैंगरेप को याद किए बिना नहीं रहा जा सकता—उसका असली नाम ज्योति था, और अब हम उसका नाम ले सकते हैं क्योंकि वह अब इस दुनिया में नहीं है—तब दिल्ली की सड़कों पर महिलाएं उतरी थीं और विरोध करते हुए दिल्ली पुलिस के लाठीचार्ज और वॉटर कैनन का सामना किया था। लगभग दस दिन पहले, हमने 2013 के तरुण तेजपाल मामले में पीड़िता की मां के शुक्रगुजार शब्द पढ़े थे—जब बॉम्बे उच्च न्यायलय की गोवा बेंच (जिसमें एक महिला जज शामिल थीं) ने गोवा की निचली अदालत के 2021 के फैसले को पलट दिया था; निचली अदालत का वह फैसला भी एक महिला जज ने ही सुनाया था, जिसमें उन्होंने तरुण तेजपाल को एक लिफ्ट में पीड़िता के साथ रेप के आरोप से बरी कर दिया था। सोचिए तब एक मां पर क्या बीती होगी जब उसकी बेटी की गुहार अनसुनी रह जाती है, जब उसकी बेटी ‘न’ कहती है, और सामने वाला आदमी उस पर कान धरने से इनकार कर देता है।
यह समझने हेतु किसी को महिलावादी होने की ज़रूरत नहीं है कि गाली-गलौज की शब्दावली ज़्यादातर महिलाओं—खासकर बहनों और माताओं—के अपमान पर ही क्यों टिकी होती हैं, या क्योंकर यौन शोषण, उत्पीड़न, छेड़छाड़ और रेप हिंसा के हथियार हैं। ये बातें तो बहुत पुरानी हैं।
परेशानी की बात यह है कि 21वीं सदी में भी यह नियंत्रण बरकरार है। जैसे-जैसे भारत ‘विकसित भारत’ बनने और एक क्षेत्रीय ताकत के तौर पर उभरने की ओर बढ़ रहा है, सत्ता में बैठे ताकतवर लोगों द्वारा महिलाओं के शरीर-मन पर नियंत्रण बनाने की ज़रूरत और बलवती होती दिख रही है। बीजेपी के पूर्व सांसद और कुश्ती संघ के पूर्व प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह को हाल ही में एक निचली अदालत ने कई महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों से बरी कर दिया है—बरी होने के बाद उन्होंने पत्रकारों से बात की और एनडीटीवी की एक साहसी युवा महिला पत्रकार का मुंह पर मजाक उड़ाया, जो उनसे सख्त सवाल पूछ रही थी।
तभी तो महिलाएं उत्तरोत्तर उस हथियार का सहारा लेने को अग्रसर हैं, जिसके बारे में वे जानती हैं कि वह उन्हें कभी निराश नहीं करेगा। इसीलिए आपको जंतर-मंतर और रांची में हर विरोध प्रदर्शन में सबसे ज्यादा पोस्टर अंबेडकर के दिखाई देते हैं। गांधी, नेहरू या सुभाष चंद्र बोस के भी होते हैं लेकिन उतने नहीं। केवल अंबेडकर ही, एक दलित, जिन्होंने अपनी मुश्किल परिस्थितियों से उबरकर संविधान लिखने का नेतृत्व किया, यह समझते थे कि जाति और धर्म से परे सभी महिलाओं और पुरुषों को समानता और न्याय का अधिकार देना क्यों ज़रूरी है। वे जाति के नाम पर होने वाली हिंसा को समझते थे—याद रखिए कि जाति जीवन भर आपका पीछा करती है और यहां तक कि आपकी मौत के बाद भी आपके बच्चों और आगे की पीढ़ियों में बनी रहती है, और एक महिला अपनी जाति तभी बदल सकती है जब वह किसी दूसरी जाति के पुरुष से शादी करे। अंबेडकर को समझ थी कि आज़ादी का मतलब सिर्फ़ ब्रिटिश राज से आज़ादी और एक नए देश का वादा नहीं था, बल्कि लागू किए जाने वाले अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार भी है; कि संविधान हर नागरिक की पसंद की आज़ादी और उसके दायरे को बनाए रखने के लिए बाध्य है। इसमें ‘न’ कहने की आज़ादी भी शामिल थी। यही बात लोगों को सबसे ज़्यादा नाराज़ करती है—चाहे वह नियंत्रण बनाने वाले माता-पिता हों, पार्टनर हो या कोई अजनबी— कि सामने वाला व्यक्ति ‘न’ कहने की इस आज़ादी का इस्तेमाल कर रहा है। उस ‘न’ का मतलब ‘न’ ही होता है। जीन-पॉल सार्त्रे ने 1943 में अपनी किताब ‘बीइंग एंड नथिंगनेस’ में तर्क दिया था कि आज़ादी और ज़िम्मेदारी दोनों का विचार लोगों में अंतर्निहित है। अंबेडकर ने सार्त्रे के शब्दों को कानून का वज़न दिया। संविधान बनाते समय उन्होंने ज़रूर कहा होगा ‘आगे बढ़ो महिलाओं, दुनिया बदलो’। संविधान तुम्हारी रक्षा के लिए है।
जंतर-मंतर और रांची में मौजूद महिलाओं और पुरुषों का भी यही अभिप्राय है; वे मौजूदा हालात, सत्ता और ऊंच-नीच के ढांचे को चुनौती देना चाहते हैं। श्रद्धा सिंह, यशस्विनी सिंह, नेहा बोरा। (नेहा के बारे में बात करना दिलचस्प है—एक तरफ वह संविधान में यकीन रखती हैं, तो दूसरी तरफ वह क्रांति की पक्षधर एक वामपंथी पार्टी से जुड़ी हैं।) वह नाबालिग लड़की जिसका नाम नहीं बताया जा सकता; उसके साथ बदले की भावना के साथ बलात्कार, जान से मारने की धमकी और दूसरे तरह के यौन दुर्व्यवहार की इतनी भयावह स्थिति रही कि सहमी मां-बेटी को घर बदलना पड़ा—यह सब उसके बाद हुआ जब प्रधानमंत्री मोदी ने एक वीडियो में उसके द्वारा अपना और अपनी मां के अपमान किए जाने का ज़िक्र किया था। आप पूछ सकते हैं कि आज की इतनी असमान और हिंसक दुनिया में महिलाओं के पास क्या विकल्प हैं। मेरा सुझाव है कि आप उन सभी महिलाओं का साथ दें जो एक ज़्यादा न्यायपूर्ण समाज बनाने की कोशिश में, हर तरह की रुकावटों और वर्जनाओं को तोड़ रही हैं।
इस बदलाव की गवाह बनें, सिर्फ़ आज़ादी के दिन ही नहीं, बल्कि साल के हर दिन। ताकि यदि इनमें से कोई एक भी महिला अपने ही किसी करीबी कुकर्मी के खिलाफ़ आवाज़ उठाए और कहे कि ‘न का मतलब न होता है’, तो उसे पता हो कि आप उसके साथ खड़े हैं।
लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।

