फ्रांस की फांस

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके द्वंद्व

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके द्वंद्व

विष्णुगुप्त

विष्णुगुप्त

पूरी दुनिया में एक बायकाट के दुष्परिणामों को लेकर शांति, सद‍्भाव और सहचरता में विश्वास रखने वाले लोग चिंतित हैं। उसके दुष्परिणामों का साक्षात दर्शन भी कर रहे हैं। यह बायकाट उस फ्रांस के खिलाफ है, जिसने अपनी संप्रभुता और बहुलतावाद की संस्कृति के रक्षण के लिए कुछ अहर्ताएं तय करने की कोशिश की है। जिसने अपनी संप्रभुता को हिंसक ढंग से प्रभावित करने वालों के खिलाफ आवाज उठायी है। सिर्फ आवाज देने मात्र से ही एक बड़ी आबादी बायकाट की हिसंक और खतरनाक प्रवृत्ति पर सवार हो गयी। फ्रांस की उत्पादित वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाने और बहिष्कार करने की गोलबंदी सुनिश्चित हो रही है। खतरनाक बात यह है कि बायकाट कोई लोकतांत्रिक ढंग से नहीं हो रहा है बल्कि धार्मिक आधार पर हो रहा है। कुवैत, जार्डन, कतर और तुर्की में फ्रांस की उत्पादित वस्तुुओं को माॅल और दुकानों से हटा दिया गया। जबकि तुर्की, ईरान और पाक ने सीधे तौर पर फ्रांस की संप्रभुता को चुनौती दी है।

विरोध का तौर-तरीका दुनिया की शांति व सद‍्भाव के लिए एक खतरनाक चुनौती भी बन रहा है। धीरे-धीरे यह बायकाट का हथकंडा घृणा में भी तबदील हो रहा है। खासकर इस्लाम और गैर-इस्लामिक समुदाय के बीच एक विभाजन रेखा बन रही है। खासकर यूरोपीय देशों में और अमेरिका में विभाजन की तलवारें खिंची हुई हैं, आपस में अविश्वास, घृणा और वर्चस्व की प्रवृत्तियां टकरा रही हैं।

बायकाट की जड़ में कार्टून विवाद ही है। इसके कारण फ्रांस की संप्रभुता हिंसक तौर पर लहूलुहान है और फ्रांस के बहुलतावाद पर संकट के बादल छाये हुए हैं। फ्रांस की मशहूर पत्रिक शार्ली एब्दो ने कई साल पहले एक कार्टून प्रकाशित किया था। शार्ली एब्दो ने तब कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए ऐसे कार्टून का प्रकाशन कर वह अतिवादी मानसिकता का दमन करना चाहती है। जिसके बाद शार्ली एब्दो पत्रिका के कार्यालय पर आतंकवादी हमला हुआ। पूरे एक दर्जन लोग मारे गये। शार्ली एब्दो पत्रिका के संपादक सहित पूरी संपादकीय टीम को मौत के घाट उतार दिया गया। पत्रिका के कार्यालय को राख कर दिया गया। हमले की जिम्मेदारी आईएस ने ली थी। उसके बाद सोशल मीडिया पर खुशी मनाने का जिहादी अभियान दिखा।

शार्ली एब्दो प्रकरण ने फ्रांस की सिविल सोसायटी को झकझोर कर रख दिया था। सिविल सोसायटी ने देखा कि वे जिस बहुलतावाद की संस्कृति के सहचर हैं और जिसके लिए वर्षों से समर्पण सुनिश्चित किये हैं, वह तो खतरे में है, बहुलतावाद की जगह खतरनाक और हिंसक एकांगी संस्कृति ले रही हैै, इसमें अन्य विचारों के लिए कोई जगह नहीं है, संस्कृतिगत विरोधी विचारों के समाधान का रास्ता तो इसी तरह की हिंसा और आतंकवाद है। धीरे-धीरे यह सोच राष्ट्रीय सोच बन गयी। इस सोच के समर्थन में मूल संस्कृति आ गयी। जब मूल संस्कृति जगती है, जब मूल संस्कृति का पुनर्जागरण शुरू होता है तो आयातित संस्कृति के साथ उसका टकराव बढ़ता है। फ्रांस में ऐसा ही हुआ है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कभी एकांगी नहीं हो सकती। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सपूर्णता में सुनिश्चित होती है। मूल संस्कृति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आतंकवादी हमले का समर्थन कैसे हो सकता है? इसी प्रश्न को लेकर फ्रांस में चिंता पसरी, फ्रांस के लोग अभियानी बन गये। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए फ्रांस के मूल संस्कृति के सहचर लोग शार्ली एब्दो पत्रिका के समर्थन में आ गये। बहसें शुरू हो गयी। फ्रांस के एक शिक्षक ने अपनी कक्षा में कार्टून की व्याख्या कर दी। शिक्षक के  खिलाफ फतवे शुरू हो गये। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि शिक्षक की हत्या कर दी गयी।

शिक्षक की बर्बर हत्या से पूरा फ्रांस दहल गया। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सीधे तौर पर कहा कि सोच का यह चेहरा घिनौना है, हिंसक है और अमानवीय है, फ्रांस की बहुलतावाद की संस्कृति की जगह हिंसक संस्कृति को खुली छूट नहीं मिलेगी, उसकी हिंसक प्रवृत्तियां हर हाल में रोकी जायेंगी, विरोधियों को अपना व्यवहार अहिंसक बनाना होगा और मजहबी एजेंडे को छोड़ना ही होगा। इमैनुएल मैक्रों एक शासक हैं, शासक के तौर पर उन्हें अपने राष्ट्र की संप्रभुता की चिंता स्वाभाविक है, उन पर हिंसक प्रवृत्तियों को कुचलने का दायित्व भी है। पिछले दस सालों में फ्रांस ने कोई एक नहीं बल्कि दर्जनों भीषण आतंकवादी हमले झेले हैं और सैकड़ों निर्दोष जिंदगियां खत्म हुई हैं। बायकाट के जुनून से फ्रांस में हिंसक प्रवृत्तियों के खिलाफ अभियान रुक जायेगा, ऐसा संभव नहीं है। लेकिन इस बायकाट की गोलबंदी से मजहबी जुनून को ही खाद-पानी मिलेगा।

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