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सोशल मीडिया के मोहपाश से मुक्ति की जरूरत

सोशल मीडिया पर बच्चों की अति सक्रियता उनकीे शारीरिक-मानसिक सेहत, शिक्षा और सामाजिक सरोकारों पर असर डाल रही है। बच्चों को इस मोहपाश से बचाने की जरूरत है। भले ही हम बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध के...

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सोशल मीडिया पर बच्चों की अति सक्रियता उनकीे शारीरिक-मानसिक सेहत, शिक्षा और सामाजिक सरोकारों पर असर डाल रही है। बच्चों को इस मोहपाश से बचाने की जरूरत है। भले ही हम बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध के विचार पर एतराज़ करें, लेकिन ठोस उपाय जरूरी हैं ताकि यह लत कम से कम हो पाए।

ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया में हमारी बढ़ती सक्रियता में सब कुछ ठीक नहीं है -खासकर, जिस प्रकार फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म के प्रति आकर्षण हमारे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल रहा है: उनके बड़े होने की प्रक्रिया, सामाजिक मेलजोल, शिक्षा और आभासी दुनिया से जुड़ने के उनके ढंग पर।

क्या यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया ने पहले ही 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, और कई यूरोपीय देश भी इसी राह पर हैं? भारत में भी, 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने को लेकर विचार जोर पकड़ने लगा है। जरा कल्पना करें कि आपके बच्चे पर क्या गुजरेगी जब आप उससे कहें कि कुछ दिन के लिए वह स्मार्टफोन का इस्तेमाल न करे, और इसकी बजाय ध्यान केंद्रित कर पढ़ाई करने या अपने दोस्तों व प्रियजनों के साथ सीधे, आमने-सामने बात करें।

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जब मैं 16, 14 और 12 वर्षीय उन तीन बहनों के भाग्य के बारे में सोचता हूं, जिन्होंने गाजियाबाद की एक हाउसिंग सोसाइटी में अपने अपार्टमेंट की नौवीं मंज़िल से कूदकर जान दे दी, तो मुझे सच में डर लगता है। खबरों के मुताबिक, परिवार में कलह रहती थी, और सबसे विशेष बात, पिता अपनी तीनों बेटियों की सोशल मीडिया और टास्क-बेस्ड ऑनलाइन कोरियन गेम्स की लत से खुश नहीं थे। ऐसा लगता है कि वे तीनों यह 'झटका' बर्दाश्त नहीं कर सकीं और उन्होंने अपनी जान लेने का फैसला किया। इन दिनों मेरा यह भरोसा पुख्ता होता जा रहा है कि तकनीक दुधारी तलवार है। मसलन, स्मार्टफोन जैसे उपकरण के बारे में सोचिए। यह जादुई है। यह किसी बच्चे या किशोरवय को दें। वह तुरंत पूरी दुनिया से जुड़ जाता है, फिल्म देखेगा, गाने सुनेगा, वीडियो गेम खेलेगा, किताब पढ़ेगा, रील और वीडियो बनाएगा, मैसेज भेजेगा और अपने ढंग से फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप का इस्तेमाल करेगा।

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यह तकनीकज़दा 'स्मार्टनेस' उन्हें प्रभावित करेगी, लेकिन सच तो यह है कि स्मार्टफोन की यह लत उनसे कुछ ज़रूरी चीज़ भी छीन लेती है। जितना ज्यादा वे स्क्रीन की लत में फंसते जाएंंगे उतना ही असल दुनिया से दूर होते जाएंगे; जितना ज़्यादा ऑनलाइन गेम खेलेंगे, उतने ही अकेले पड़ते जाएंगे, क्योंकि खुली जगह में अपने दोस्तों के साथ फुटबॉल या क्रिकेट खेलने से परहेज करने लगते हैं; वे जितना ज़्यादा स्क्रॉल करेंगे, उतना ही ध्यान केंद्रित करने की क्षमता घटती चली जाएगी;और सबसे बढ़कर, अपने वीडियो 'वायरल' करने में वे जितना ज़्यादा समय खपाते हैं, उनके पास किताब को छूने, पढ़ने, महसूस करने, विश्लेषण करने और अनुभव करने के लिए उतना ही कम समय बचता है।

यही विरोधाभास बताता है कि सोशल मीडिया उपयोग ने बच्चों की सेहत पर असर डालना शुरू कर दिया है, उनकी व्यग्रता बढ़ा दी है, अवसाद पैदा कर दिया और उनके आत्म-सम्मान को चोट पहुंचाई है। अमेरिकी सामाजिक ज्ञानमनोवैज्ञानिक जोनाथन हैड्ट ने सोचने पर मजबूर कर देने वाली अपनी किताब 'द एंक्सियस जेनरेशन' में इस त्रासदी का विश्लेषण किया है। जैसा कि हैड्ट का तर्क है कि डिजिटल युग में पैरेंट्स द्वारा बच्चों पर ध्यान कम दिए जाने की वजह से, लत के समान और परस्पर होड़ करवाने वाले सोशल मीडिया तक उनकी पहुंच बिना किसी रोक-टोक हो गई है। वहीं, इसी प्रकार, 'असल दुनिया में ओवर-पैरेंटिंग' की प्रवृत्ति (हर वक्त बच्चे के पीछे पड़े रहना) हमारे बच्चों की सामान्य विकास प्रक्रिया रोक रही है। यह देखकर दुख होता है कि बचपन अब ‘खेल आधारित’ नहीं रहा; ‘फ़ोन आधारित’ बन गया है। इसलिए, कोई हैरानी नहीं कि स्मार्टफ़ोन हमारे बच्चों को उनके ठीक इर्द-गिर्द के माहौल से दूर करता जा रहा है और असल ज़िंदगी की दोस्ती की जगह सतही ऑनलाइन चैट ले रही है। इसी को लेकर हैड्ट चेताते हैं कि इस ‘व्यग्र पीढ़ी’ में नींद की कमी, ध्यान भटकना और अकेलापन न्यू नॉर्मल बनता जा रहा है। भारत में इस संकट की गंभीरता को समझें — शिक्षा के स्तर की वार्षिक रिपोर्ट (2024) के अनुसार, हमारे 76 प्रतिशत बच्चे (14-16 साल समूह) सोशल मीडिया तक पहुंच करने के लिए स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल करते हैं।

इतना ही भयावह है जोखिमज़दा कच्चे दिमागों पर कंटेंट क्रिएटर्स या यू-ट्यूब ‘इन्फ्लुएंसर’ का प्रभाव। एक स्थिति की कल्पना करें: आपका बच्चा तब तक सो नहीं पाता जब तक वह हर रात किसी मशहूर ‘इन्फ्लुएंसर’ की मनगढ़ंत कहानियां न सुन ले — उत्तराखंड के एक छोटे से शहर का एक नौजवान जिसके 31 मिलियन से ज़्यादा सब्सक्राइबर हैं और वह अपनी फैंसी कारों— मर्सिडीज-बेंज जी-वैगन, पोर्शे 718 बॉक्सटर और टोयोटा फॉर्च्यूनर लेजेंडर -का गर्वपूर्ण प्रदर्शन करता रहता है!

देखने वाले युवा को इस चकाचौंध भरी जीवनशैली से अपनी नाकाबिलियत और आत्म-सम्मान की कमी महसूस हो सकती है। जब इस किस्म का कोई ‘इन्फ्लुएंसर’ कच्चे मन वाले किसी किशोरवय की उम्मीदों को आकार देना शुरू देता है, तो वह यह मानने लग सकता है कि अगर कोई हर सुबह अपने परिवार के क्रिया-कलाप सोशल मीडिया पर डालकर इतना कमा सकता है, तो कड़ी मेहनत करने, मन लगाकर पढ़ाई करने और रचनात्मक कौशल बेहतर बनाने का क्या मतलब। क्या यही वजह है कि हम जहां-तहां युवाओं को फोन से रील बनाते, अपने वीडियो अपलोड करते, यूट्यूब या इंस्टाग्राम पर अपनी मौजूदगी दर्ज करवाते और त्वरित लोकप्रियता एवं सफलता पाने की कोशिश करते देखते हैं? ‘लाइक और सब्सक्राइब’ — मानो यह हमारे जमाने का पसंदीदा मंत्र बन गया है!

सवाल है हम अपने बच्चों को इस मोहपाश से कैसे बचा सकते हैं। भले ही हम अपने बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के विचार पर एतराज़ करें, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि अब समय है कि हम कुछ ठोस उपाय करें ताकि यह लत न्यूनतम हो पाए।

दरअसल, बतौर अध्यापक/ अभिभावक, हमें उनके साथ प्यार और हमदर्दी से बातचीत करनी चाहिए, असली और आभासी में फर्क की शिनाख्त करने को प्रोत्साहित करना चाहिए, दोस्तों -पड़ोसियों से सामाजिक मेल-जोल करना, मैदान में खेलने, किताबें पढ़ने की आदत को सक्रिय करना — हां, छपी हुई किताबें, और सोचने-समझने, आलोचनात्मक विचार एवं मंथन करने की ताकत को बढ़ावा देना चाहिए। उनके साथ संवाद करना और यह समझाना भी उतना ही ज़रूरी है कि हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी स्क्रीन पर दिखने वाली बनावटी सुंदरता, शोहरत और शान-शौकत वाली छवियों जैसी नहीं होती,और सबसे जरूरी है, 'सामान्य' और 'कुछ कमी' होने के बावजूद प्यार, कौतुहल और असली रिश्तों से परिपूर्ण होना ज्यादा अच्छा है।

हालांकि, मुझे पक्का नहीं है कि बतौर वयस्क,हम सच में यह ज़रूरी काम करने में सक्षम हैं या नहीं। या फिर क्या हम भी – अपनी 9 से 5 बजे काम की एकरसता से उपजी बोरियत के बाद – अपने स्मार्टफोन के आगे समर्पण करना पसंद करते हैं, और इस तरह अपने बच्चों के साथ गहरा और सार्थक जुड़ाव बनाने में नाकाम रहते हैं?

लेखक समाजशास्त्री हैं।

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