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चक्रव्यूह से मुक्त वसीयत का ‘आजादी महोत्सव’

सरलीकरण से राहत

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भविष्य की कानूनी लड़ाइयों से बचने के लिए आज भी दो गवाहों की मौजूदगी में स्पष्ट वसीयत लिखना ही एकमात्र अचूक मंत्र है। कानून ने अनिवार्य प्रोबेट की लाठी छीन ली है, लेकिन समझदारी का छाता आपके हाथ में छोड़ दिया है।

भारत में अपनी ही संपत्ति को अपनों के नाम छोड़ जाने की प्रक्रिया अक्सर एक कानूनी दुःस्वप्न बन जाती थी। लेकिन संसद ने ‘निरसन और संशोधन विधेयक, 2025’ के जरिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की बेड़ियां काटकर एक नई सुबह का आगाज किया है। सालों से चली आ रही ‘प्रोबेट’ की अनिवार्य शर्त को अब इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया गया है। सरल शब्दों में कहें तो, अब मरने वाले की अंतिम इच्छा यानी उसकी ‘वसीयत’ को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए अदालतों की लंबी कतारों और भारी-भरकम फीस से मुक्ति मिल गई है।

सरल शब्दों में समझें तो ‘प्रोबेट’ अदालत द्वारा जारी किया गया वह प्रमाणपत्र है, जो कानूनी रूप से यह तस्दीक करता है कि वसीयत पूरी तरह असली है और इसे बनाने वाला व्यक्ति (वसीयतकर्ता) इसे लिखते समय पूरी तरह होश-ओ-हवास और सही मानसिक स्थिति में था। अब तक हमारा कानून एक अजीब विरोधाभास और ‘क्षेत्रीय भेदभाव’ का शिकार था। अगर आप मुंबई, कोलकाता या चेन्नई जैसे पुराने ‘प्रेसिडेंसी टाउन्स’ में रहते थे, तो वसीयत होने के बावजूद संपत्ति हस्तांतरण के लिए प्रोबेट लेना अनिवार्य था।

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यह प्रक्रिया किसी दुःस्वप्न से कम नहीं थी; इसमें न केवल सालों का समय बर्बाद होता था, बल्कि संपत्ति की कुल कीमत का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 2 से 5 प्रतिशत तक) भारी-भरकम ‘कोर्ट फीस’ और वकीलों के खर्च की भेंट चढ़ जाता था। 2025 का यह नया सुधार इसी विसंगति पर प्रहार करता है। अब चाहे आप दिल्ली के दिल में हों, पटना की गलियों में या मुंबई के समंदर किनारे- कानून की नज़र में सब बराबर हैं। सरकार ने इस ‘अनिवार्यता’ को खत्म कर यह सुनिश्चित किया है कि अब विरासत पाने के लिए आपको अपनी ही जेब खाली नहीं करनी पड़ेगी।

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यह ऐतिहासिक बदलाव रातो-रात नहीं आया, बल्कि इसके पीछे न्यायपालिका के दशकों पुराने कानूनी मंथन की गूंज है। इस सुधार की बुनियाद असल में साल 2001 में ही रख दी गई थी, जब ‘क्लोरेंस पैस बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। हालांकि उस वक्त अदालत ने धारा 213 की वैधता को बरकरार रखा, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट संकेत भी दिया कि प्रोबेट की अनिवार्यता केवल कुछ विशेष और सीमित परिस्थितियों के लिए ही तर्कसंगत हो सकती है। इस फैसले ने भविष्य के लिए एक नई बहस छेड़ दी थी - कि क्या एक निर्विवाद वसीयत के लिए भी अदालती मुहर हर हाल में जरूरी होनी चाहिए?

साल 2005 में ‘मैरी कोचु बनाम थॉमस’ जैसे मामलों में अदालतों ने और भी सख्त रुख अपनाया। केरल हाईकोर्ट और बाद के विभिन्न फैसलों में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया कि प्रोबेट की अनिवार्यता का नियम अक्सर न्याय दिलाने के बजाय केवल कानूनी पेचीदगियां और बोझ बढ़ाता है। हाल के वर्षों में तो सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह दोहराया कि यदि वसीयत की सत्यता पर कोई संदेह नहीं है, तो वारिसों को जबरन अदालती चक्रव्यूह में घसीटना ‘ईज ऑफ लिविंग’ (सुगम जीवन) के बुनियादी सिद्धांतों के सरासर खिलाफ है। 2025 के इस नए कानून ने असल में न्यायपालिका की इन्हीं प्रगतिशील टिप्पणियों और वर्षों की कानूनी जद्दोजहद को एक ‘वैधानिक कवच’ प्रदान कर दिया है। संसद ने अदालतों की उस मंशा को कानून का रूप दे दिया है, जो लंबे समय से आम आदमी को वसीयत के नाम पर होने वाली कानूनी प्रताड़ना से बचाना चाहती थी।

धारा 213 के हटने से वसीयत अब एक बेहद शक्तिशाली दस्तावेज बन गई है। अब उत्तराधिकारी प्रोबेट के बिना भी सीधे संपत्ति का म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) और बैंक खातों का सेटलमेंट करा सकेंगे। प्रोबेट अब ‘अनिवार्य’ नहीं है, लेकिन ‘अप्रासंगिक’ भी नहीं है। भले ही सरकार ने इसे थोपना बंद कर दिया हो, लेकिन इसे बेकार समझना भारी भूल होगी। यदि परिवार में संपत्ति को लेकर विवाद की जरा भी आशंका है, तो प्रोबेट आज भी अदालत में सबसे मजबूत ‘सुरक्षा कवच’ है। विशेषज्ञों के अनुसार, बड़ी संपत्ति या आपसी अनबन की स्थिति में ‘स्वैच्छिक प्रोबेट’ कराना एक स्मार्ट मूव है- यह भविष्य के महंगे मुकदमों से बचने का एक सबसे सस्ता और पक्का बीमा है।

नि:संदेह, सरकार का यह कदम संकेत देता है कि भविष्य ‘डिजिटल उत्तराधिकार’ का है। जब प्रोबेट की अनिवार्यता खत्म होती है, तो लोगों में वसीयत लिखने का उत्साह बढ़ेगा। मध्यम वर्ग के लिए यह सबसे बड़ी राहत है, क्योंकि उनका जीवनभर का निवेश अब कानूनी दांव-पेंच में नहीं फंसेगा। संसद का यह फैसला ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ का जीवंत उदाहरण है, जिसने वसीयत को अदालती धूल और अंतहीन तारीखों से आजाद कर सीधे हकदारों को सौंप दिया है। यह कदम साहसिक है, लेकिन पाठकों को समझना होगा कि कानून ‘सरल’ हुआ है, ‘खत्म’ नहीं। सरकार ने प्रोबेट की अनिवार्यता हटाकर राह तो आसान कर दी है, लेकिन यह सरलीकरण ‘सावधानी’ का विकल्प नहीं है। अगर जरा सा भी अंदेशा हो कि भविष्य में ‘अपनों’ के बीच ‘सपनों’ की संपत्ति को लेकर ‘तलवारें’ खिंच सकती हैं, तो याद रखिए भविष्य की कानूनी लड़ाइयों से बचने के लिए आज भी दो गवाहों की मौजूदगी में स्पष्ट वसीयत लिखना ही एकमात्र अचूक मंत्र है। कानून ने अनिवार्य प्रोबेट की लाठी छीन ली है, लेकिन समझदारी का छाता आपके हाथ में छोड़ दिया है।

लेखक कुरुक्षेत्र विवि के विधि विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।

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