कृषि आय बढ़ाने में विफल मुक्त बाजार

कृषि आय बढ़ाने में विफल मुक्त बाजार

देविंदर शर्मा

देविंदर शर्मा

ऐसे समय पर जब आमतौर माना जाता है कि मुक्त बाजार व्यवस्था से कृषि उत्पादों को ज्यादा भाव मिल पाता है, जिससे किसानों की आमदनी बढ़ती है, इस पर यकीन करना कल्पना से परे है। कनाडा में वर्ष 2017 में गेहूं का जो भाव मिला, वह 150 साल पहले 1867 में लगी कीमत से कहीं कम था। यह बात केवल कनाडा पर ही लागू नहीं है बल्कि मीडिया खबरों के मुताबिक अमेरिका में भी किसानों का कहना है कि गेहूं की जो कीमत आज उन्हें मिल रही है, वह उस मूल्य से कहीं कम है जो वर्ष 1865 में खत्म हुए 4 वर्षीय गृहयुद्ध के समय मिला करती थी।

तो क्या इसे बाजार व्यवस्था की कार्यदक्षता कहें? आखिरकार गेहूं एक आम आदमी की रोजमर्रा की खुराक है और पिछले 150 सालों में विश्व की जनसंख्या में जो इजाफा हुआ है, उससे इसकी मांग और उपज में कल्पनातीत वृद्धि हुई है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन के मुताबिक गेहूं का उत्पादन वर्ष 2020-21 में 78 करोड़ टन होने का अनुमान है, जो पिछले साल से 75 लाख टन ज्यादा होगा। खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार आज दुनिया जिस किस्म की खाद्य असुरक्षा का सामना कर रही है, उससे गेहूं सहित अन्य अनाजों का उत्पादन अधिक रहने का अनुमान होना सकारात्मक संकेत है।

अब इससे पहले कि आपको हैरानी हो कि जब हमें स्कूल-कॉलेजों में अर्थशास्त्र के पाठ्यक्रम में यह पढ़ाया जाता है कि मुक्त बाजार व्यवस्था उत्पाद का न्यायोचित मूल्य मिलने का अवसर मुहैया करवाती है तो फिर यह कृषि क्षेत्र के लिए क्यों सही नहीं बैठती। इसके लिए अमेरिकी राष्ट्रीय किसान संघ (एनएफयू) की पड़ताल बताती है कि वर्ष 1965 के बाद से मूंगफली की निरंतर गिरती कीमतों ने 4 में से 3 किसानों को इसकी खेती से तौबा करवा डाली है। वह भी तब, जब खपत में वृद्धि लगातार होती रही। आपूर्ति-मांग के स्वर्णिम सिद्धांत को गलत ठहराते हुए मूंगफली का मूल्य वर्ष 1965 में 1 डॉलर प्रति पाउंड था, वह साल 2020 में घटकर 0.25 डॉलर प्रति पांउड रह गया, यह गिरावट 75 फीसदी है। और यदि आप अब भी यह सोच रहे हैं कि ऐसा फालतू उत्पादन की वजह है तो वाशिंगटन पोस्ट अखबार की खबर बताती है कि किस तरह देश का पूरा मूंगफली बाजार केवल 3 कंपनियों के कब्जे में है, असल में खरीद मूल्य वही तय करती हैं। 12000 मूंगफली उत्पादक किसानों द्वारा दायर किए गए मुकदमे के बाद आखिरकार इन कंपनियों ने जानबूझकर कम भाव लगाने का दोषी पाने जाने के बाद 10.3 करोड़ डॉलर इन उत्पादकों को देना माना था।

मूंगफली कोई एक अपवाद नहीं है। मंडी नियंताओं में इस तरह का मैच-फिक्सिंग वाला खेल दशकों से जारी है, फिर चाहे वह अमेरिका हो या यूरोप या फिर भारत। किसान यह जान लें कि मैच पहले से फिक्स किया जा चुका होता है। यह अकारण नहीं है कि मुद्रास्फीति को शामिल कर गणना उपरांत पता चलता है कि कृषि उत्पादों का भाव सालों से कमोबेश या तो एक जगह पर स्थिर है या फिर नीचे की ओर जा रहा है।

गेहूं-भाव के विषय की ओर वापस आते हैं। एक कनाडाई लेखक एवं आलोचक डारिन क्वालमैन ने अपने ब्लॉग में विचारोत्तेजक लेखों की लड़ी में खुलासा किया कि वर्ष 1867 के बाद से कृषि उत्पाद के भाव में गिरावट बेतरह हुई है। मुद्रास्फीति को जोड़ने के बाद गणना करें तो गेहूं की कीमत वर्ष 1867 में लगभग 30 डॉलर प्रति बुशेल (27 किलो) थी। लेकिन उसके बाद गेहूं का औसत भाव लगातार इस कदर गिरा मानो स्की स्लोप पर फिसला हो। वर्ष 1980 के दशक के मध्य में जब दुनियाभर में ध्यान कृषि उत्पादों के निर्यात करने पर ज्यादा होने लगा तो भाव में और गिरावट आई। वर्ष 2017 में गेहूं की कीमत प्रति बुशेल मात्र 5 डॉलर के आसपास लगी थी। हकीकत यह है कि एक कनाडाई किसान के परदादा ने 150 साल पहले गेहूं को जिस मूल्य पर बेचा था, आज उसका भाव 25 डॉलर कम लग रहा है।

कोई हैरानी नहीं कि जहां छोटे किसान बड़ी संख्या में खेती छोड़ गए हैं वहीं कनाडा में बड़े फार्मों का औसत रकबा कई गुणा बढ़कर 3000 एकड़ पहुंच गया है। ऐसे में जब कृषकों की संख्या में काफी कमी आई है तो मुक्त बाजार व्यवस्था का समर्थन करने वाले अर्थशास्त्रियों का वह सिद्धांत भी गलत साबित हुआ है जब कहा जाता है कि किसानों की संख्या घटने का मतलब है बाकियों की कृषि आय में वृद्धि होना। अकेले अमेरिका में पिछले 100 सालों से कम समय में 50 लाख खेत बड़े फार्मों में विलीन हो चुके हैं तो वहीं ऑस्ट्रेलिया में वर्ष 1980-2002 के बीच 25 फीसदी छोटे खेत नहीं रहे। हालांकि अब भी यही अर्थशास्त्री कहेंगे कि यह स्वस्थ घटनाक्रम है और कृषि को मुनाफादायक बनाएगा। लेकिन हैरानकुन यह कि पिछले समय से जिस तेजी से दुनियाभर में किसान खेती से किनारा कर गए हैं, उसके बावजूद बाकी बचे कृषकों की कृषि-आय में बढ़ोतरी नहीं हुई है, इसके उलट कृषि-संबंधी समस्याओं में इजाफा ही हुआ है।

यह वही अतार्किक दलील है जिसका प्रतिपादन नीति आयोग यह मानकर कर रहा है कि जब कृषि करने वालों की संख्या में कमी होगी तो बाकी बचे किसानों की आमदनी स्वयमेव बढ़ जाएगी। अगर यह सच में सही है तो कोई समझाए कि फिर कनाडा में कृषि क्षेत्र का ऋण 102 खरब डॉलर से ज्यादा क्यों हो गया है, जो कि वर्ष 2000 से दोगुणा है। इसी तरह अमेरिका में जहां कुल जनसंख्या का महज 1.2 प्रतिशत ही कृषि व्यवसाय में है, वहां कृषि घाटा वर्ष 2020 में 425 खरब डॉलर का कल्पनातीत आंकड़ा क्यों छू गया है? फ्रांस में भी जहां कुल श्रमशक्ति का सिर्फ 7 फीसदी खेती करता है वहां 44 प्रतिशत से ज्यादा किसानों के सिर पर 4 लाख यूरो का ऋण चढ़ा हुआ है और 25 फीसदी कृषक ऐसे हैं, जिनकी आय 350 यूरो प्रतिमाह से कम है और गरीबी रेखा से नीचे आते हैं।

बाजार आधारित व्यवस्था ने जहां किसानों को उनके हक का कृषि-मूल्य देने से इनकार किया है वहीं उपभोक्ता को लगातार बढ़ती कीमतें चुकानी पड़ रही हैं। अपने ब्लॉग में एक अन्य पोस्ट में क्वालमैन ने खुलासा किया है कि वर्ष 1975 से कनाडा और अमेरिका में गेहूं की कीमत प्रति बुशेल कमोबेश एक जगह टिकी हुई है, जबकि इस 27 किलो गेहूं से जो लगभग 60 पाउंड डबलरोटी तैयार होती है, उसके औसत मूल्य में 50 डॉलर की वृद्धि हुई है, यह वर्ष 1975 में 25 डॉलर से बढ़कर 2015 में 75 डॉलर हो गई थी। यही बात अन्य खाद्य उत्पादों पर सटीक बैठती है, वहीं विशालकाय खाद्य प्रसंस्करण निर्माता अपने उत्पादों की कीमतें लगातार बढ़ा रहे हैं और खरीदारों का एक बड़ा हिस्सा जुड़ता जा रहा है। ऐसे में खेत में लगने वाले भाव में होती कमी कृषि-दक्षता का पैमाना कैसे हो सकती है? अगर बाजार व्यवस्था कारगर होती तो फिर केवल खाद्य प्रसंस्करण और खुदरा बिक्री करने वाली विशालकाय कंपनियां ही क्यों लगातार मुनाफा बना रही हैं?

बाजार व्यवस्था में ऐसा कुछ नहीं है, जिसे पवित्रता की श्रेणी में रखा जाए। यह विश्वास करना कि मुक्त बाजार से किसानों को ज्यादा मूल्य मिलेगा, यह पुरानी पड़ चुकी अार्थिक अवधारणा और पढ़ाई है। पूरी दुनिया में मुक्त बाजार व्यवस्था कृषि आय बढ़ाने में ऐतिहासिक रूप से नाकामयाब सिद्ध हो चुकी है और अर्थशास्त्री इस तथ्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। किसी भी कृषि उत्पाद की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम न हो, यह मांग करके आंदोलनकारी किसान वास्तव में आर्थिक नीतियों और सोच में रही ऐतिहासिक भूलें सुधरवाना चाहते हैं। इस लड़ाई के सफल होने का मतलब है व्यावहारिक खेती का भविष्य बचाना और ‘सबका साथ... सबका विकास’ वाले नये आर्थिक नारे को सच बनाना।

लेखक खाद्य एवं कृषि मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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