पिछले दिनों एक प्रेत-लेखक यानी घोस्ट राइटर का साथ मिला। यानी ऐसा लेखक जो लिखता तो है, लेकिन कहीं भी उसका नाम नहीं आता। नाम उसका आता है जो उसे लिखने के लिए हॉयर करता है। यह प्रेत-लेखक भी 80-85 के आसपास के हैं। उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने किन-किन हस्तियों के लिए प्रेत-लेखन किया है। उनके पूरे फ्लैट में किताबें, पत्रिकाएं और अखबारें फैले हुए थे। एक पत्रिका को मैंने उठा लिया। लगभग 40 चालीस पुरानी। जब मैं इस पत्रिका के पन्ने उलटा-पलटा रहा था तो यह क्रिकेट और फुटबाल खेल की कवरेज से भरा हुआ था।
मुझे चालीस साल पुराने छपे विज्ञापनों को देखने में मजा आया। फ्रंट-कवर के अंदर वाला साइड में थम्स-अप का इश्तिहार दिखा, जिसमें सुनील गावस्कर और इमरान खां एक साथ बैठे थम्स-अप की बोतल का मज़ा ले रहे हैं। फोटो देखकर मैं यही सोच रहा था कि दोनों देशों के हालात भी इतने बरसों में कहां से कहां पहुंच गए हैं। फिर अवंती गैरेली मोपेड का विज्ञापन देखकर पुराने दिन याद आ गए। लूना भी दिख गई। कितना अर्सा हो गया था लूना को देखे। आज से चालीस साल पहले लोग इतने भारी-भरकम नहीं थे, लोग दुबले-पतले, स्लिम-ट्रिम होते थे जो ये हल्की-फुल्की मोपेड उनको आसानी से ढो लेती थी। एक बंदे को क्या, उसके पीछे उसकी बीवी भी बैठ जाती थी।
मैं जब इस मैगजीन में से तस्वीरें खींच रहा था तो वह प्रेत-लेखक हंसने लगे, क्या करोगे? मैंने बताया कि इनकी मदद से एक कहानी बुनूंगा। बाटा के पॉवर शूज़ भी दिख गए। फिर कावासाकी बजाज मोटरसाइकिल। खैर, उस दौर में जिस दौर की यह मैगज़ीन है, हमें तो तीन मोटरसाइकिल का ही पता था, एक तो राजदूत, जिसे कहा जाता था दूध वाले खरीदते हैं, दूसरा फैशनेबेल येज्दी और तीसरा थोड़ा रुआब वाले खरीदते थे, बुलेट। मेरे बड़े भाई से मुझे 1986 जनवरी में येज़्दी मोटरसाइकिल मिली। किसी पुरानी मैगज़ीन को देखना, उसमें छपे कंटेंट को पढ़ना भी उस गुज़रे दौर की बहुत-सी मीठी यादें को फिर से जी लेने जैसा अनुभव है। कुछ और यादें। दिल्ली में हम लोग 1990 में श्रीमतीजी के जी मौसा जी के घर गए। पढ़ने-लिखने के शौकीन, कपूर साहब के कमरे में देखा तो हर तरफ़ किताबें ही किताबें, इंग्लिश के टीचर थे, अधिकतर इंग्लिश की। मैं उनके साथ उनकी किताबों के बारे में अपनी यादें साझा करता तो हम खूब हंसते।
साभार : डॉ. प्रवीण चोपड़ा डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम

