खाने का बहाना और राही अनजाना : The Dainik Tribune

तिरछी नज़र

खाने का बहाना और राही अनजाना

खाने का बहाना और राही अनजाना

अजय अनुरागी

व्यक्ति खाने के लिए बना है, खाना बेहद जरूरी है। जो खाता नहीं है वह व्यक्ति ही क्या?

व्यक्ति होने के दूसरे गुण भी हैं मगर खाना सर्वोपरि है। खाना ही व्यक्ति की सामर्थ्य को दर्शाता है। खाने की तुला पर ही व्यक्ति का शक्ति परीक्षण होता है। जो लोग खा रहे हैं वह समाज में सम्मान पा रहे हैं। ऊंचे आसन पर बिठाए जा रहे हैं। गुलदस्ते उनके हाथों में मुस्कुरा रहे हैं। उनके चरणों की ओर झुकने की होड़ मची हुई है। उनकी चरण धूलि भभूति से कम नहीं। अहोभाग्यम। आहा खाद्यम!

जो खा नहीं पा रहे हैं वे हाथ मल रहे हैं। आंखें निकाल रहे हैं। मुट्ठियां भींच रहे हैं। अफसोस कि खा नहीं पा रहे हैं। वह कौन से तत्व हैं जिनके कारण वे खाने तक नहीं पहुंच पाते?

खाने वाले मानते हैं कि देश की कोई भी जगह ऐसी नहीं है जहां खाया न जा सके। यह खाने वाले पर निर्भर करता है कि उसे खाना आता है कि नहीं आता है।

कुछ लोग खाने के मामले में सिद्धांतवादी होते हैं। वे सिद्धांततः यह तय कर लेते हैं कि यहां खाया जा सकता है और वहां नहीं खाया जा सकता। यह खाना चाहिए, वह नहीं खाना चाहिए। मैं यहां तक खाऊंगा, वहां तक नहीं खाऊंगा। कुल मिलाकर खाऊंगा तो सही, किंतु अपनी शर्तों पर खाऊंगा। खाओ मगर स्वाभिमान से। आन बान शान से।

एक सैद्धांतिक व्यक्ति को तय कर लेना जरूरी है कि वह कब, कहां और कैसे खाना शुरू करे। उसे यह भी निर्धारित कर लेना चाहिए कि एक बार में ही पूरा खाया जाए या टुकड़ों में खाया जाना उचित रहेगा। व्यावहारिक रूप से खाने वाले खाद्य पदार्थ की प्रकृति देखकर खाया करते हैं। उसी के अनुसार खाने की तमाम बातों पर तत्काल विचार करते हैं- कहां, कब, कितना और कैसे खाया जाना है। इसे वे परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित करते रहते हैं। खाने की स्थितियां अनुकूल नहीं हों तो एक बार में कोशिश कर छोड़ दीजिए ताकि दूसरी बार में आसानी से मुंह में जा सके।

खाने के परंपरावादी लोग भाग्य को प्रमुख मानते हैं। उनके अनुसार खाना भाग्य का लेखा है। विधाता ही उसे खाने की सीट पर बैठाता है। विधि-इच्छा के विपरीत लोग कितनी ही कोशिश कर लें किंतु खाने की टेबल तक नहीं पहुंच पाते हैं। विधाता उनके भाग्य में कुछ ऐसा लिख देता है कि परिश्रम किए बिना ही व्यक्ति खाने की जगह पहुंच जाता है।

कर्मशील नर भी संसार में हैं जो खाने को श्रम का परिणाम मानते हैं। प्रयास करते हुए वे खाने की सीट को हथियाते हैं। उनके लिए खाना कोई मुश्किल काम नहीं होता। वे जिस स्थान पर होते हैं वहीं से खाना शुरू कर देते हैं।

जो खा रहे हैं वे हंस रहे हैं, मुस्करा रहे हैं, दूसरों की थाली खींच कर ला रहे हैं और अगले शिकार पर गिद्ध दृष्टि जमा रहे हैं।

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