नाइट्रोजन चक्र बदलाव से अन्न-पेयजल संकट
नया अध्ययन बताता है नाइट्रोजन चक्र परिवर्तन खाद्य उत्पादन, पानी की सुरक्षा, पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य और जलवायु स्थिरता को गहरे तक प्रभावित कर रहा है। जलवायु परिवर्तन ने पृथ्वी पर कई परिवर्तन कर दिए हैं। इनमें से कई परिवर्तन...
नया अध्ययन बताता है नाइट्रोजन चक्र परिवर्तन खाद्य उत्पादन, पानी की सुरक्षा, पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य और जलवायु स्थिरता को गहरे तक प्रभावित कर रहा है।
जलवायु परिवर्तन ने पृथ्वी पर कई परिवर्तन कर दिए हैं। इनमें से कई परिवर्तन ऐसे हैं जिनसे हम वाकिफ नहीं हैं। बढ़ती गर्मी, बारिश के पैटर्न में बदलाव और कार्बन डाइऑक्साइड के ऊंचे स्तर से फसलों को होने वाला नुकसान हमें दिखाई देता है लेकिन जलवायु के परिवर्तन समूची खाद्य प्रणालियों को कितना प्रभावित कर रहे हैं, इसका जरा भी अंदाजा हमें नहीं है। मिट्टी की सतह के नीचे और पौधों के ऊत्तकों के अंदर चुपचाप परिवर्तन हो रहा है। भूमि पारिस्थितिकी तंत्र में नाइट्रोजन की हलचल अब बदली हुई जलवायु परिस्थितियों पर तेजी से प्रतिक्रिया कर रही है। नाइट्रोजन में ये परिवर्तन खाद्य उत्पादन, पानी की सुरक्षा,पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य और जलवायु स्थिरता को प्रभावित करते हैं। पृथ्वी पर जीवन चक्र में नाइट्रोजन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। यह तत्व नाइट्रोजन प्रोटीन, एंजाइम और आनुवंशिक सामग्री बनाकर जीवन को सहारा देता है। पौधे पत्तियों,जड़ों और अनाज को उगाने के लिए मिट्टी से नाइट्रोजन अवशोषित करते हैं। मिट्टी के जीवाणु जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण जैसी विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से नाइट्रोजन को उपयोग योग्य रूपों में बदलते हैं।
नाइट्रोजन का संतुलित प्रवाह स्थिर पारिस्थितिकी तंत्र और अच्छी फसल के लिए आवश्यक है। अतिरिक्त नाइट्रोजन हवा और पानी में चला जाता है, जिससे प्रदूषण बढ़ता है और गर्मी बढ़ाने वाली ग्रीनहाउस गैसें बनती हैं। दूसरी ओर,नाइट्रोजन की सीमित उपलब्धता फसलों के विकास को धीमा करने के साथ-साथ खाद्य आपूर्ति को भी कम कर देती है। पृथ्वी पर नाइट्रोजन चक्र के बारे में एक नए अध्ययन में चीन के जेजान विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक मियाओ चंग का कहना है कि गर्म होती दुनिया में नाइट्रोजन खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के लिए एक निर्णायक कारक बनती जा रही है। यह अध्ययन दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन नाइट्रोजन चक्रों को इस तरह से बदल रहा है जो या तो सतत विकास का समर्थन कर सकता है या पारिस्थितिकी तंत्र को महत्वपूर्ण सीमाओं से परे धकेल सकता है। वैज्ञानिकों ने वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र मॉडल के साथ फील्ड में 30 वर्षों के प्रयोगों का विश्लेषण किया। उन्होंने इसमें विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में फसल भूमि, जंगलों और घास के मैदानों को सम्मिलित किया। उन्होंने उर्वरक, खाद, वायुमंडलीय जमाव और जैविक स्थिरीकरण के रूप में पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ने वाली नाइट्रोजन पर गौर किया। फसल कटाई, गैस उत्सर्जन के रूप में पारिस्थितिकी तंत्र से बाहर निकलने वाली नाइट्रोजन को भी मापा गया।
इस विश्लेषण के असमान परिणाम सामने आए। कुछ स्थानों पर विशिष्ट जलवायु परिस्थितियों में उत्पादकता में वृद्धि देखी गई जबकि अन्य क्षेत्रों में नाइट्रोजन की कमी, प्रदूषण और पैदावार में कमी का अनुभव हुआ। नाइट्रोजन की असमान प्रतिक्रियाएं अब खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण में वैश्विक अंतर को गहरा कर रही हैं। कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता नाइट्रोजन को प्रभावित करती है। वैसे कार्बन डाइऑक्साइड का उच्च स्तर प्रकाश संश्लेषण में सुधार करके पौधों की वृद्धि को बढ़ाता है। गेहूं, चावल, मक्का और सोयाबीन सहित प्रमुख फसलों में अक्सर अधिक पैदावार देखी जाती है। अधिक कार्बन डाइऑक्साइड की स्थितियों में जंगल और घास के मैदान भी पौधों की सामग्री का अधिक उत्पादन करते हैं। पानी के इस्तेमाल की बेहतर क्षमता पौधों को हल्के सूखे के स्ट्रेस से निपटने में मदद करती है। लेकिन ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड होने पर पौधों के टिशू में नाइट्रोजन कम होती है। अनाज में प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे उसका पोषण मूल्य कम हो जाता है। पत्तियों और तनों में भी नाइट्रोजन की कमी दिखती है। दलहनी फसलें गैर-दलहनी प्रजातियों की तुलना में नाइट्रोजन की कमी का बेहतर प्रतिरोध करती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि लंबे समय तक नाइट्रोजन की कमी भविष्य की ग्रोथ और कार्बन स्टोरेज की क्षमता को कमजोर कर सकती है।
अध्ययन के सह-लेखक बाओजिंग गु ने कहा, ज्यादा कैलोरी का मतलब अपने आप बेहतर पोषण नहीं होता है। हम शायद ज्यादा बायोमास काट रहे हैं, लेकिन प्रति यूनिट नाइट्रोजन कम है, जो इंसानों के खाने और जानवरों के चारे दोनों के लिए मायने रखती है। गर्मी नाइट्रोजन के नुकसान को बढ़ाती है। बढ़ता तापमान नाइट्रोजन साइकलिंग को जटिल तरीकों से प्रभावित करता है। हल्की गर्मी जंगलों और घास के मैदानों में बढ़ने के मौसम को बढ़ाती है, जिससे पौधों की ग्रोथ बढ़ती है। खेती वाली जमीनें गर्मी के तनाव में ज्यादा जोखिम का सामना करती हैं। गर्म और शुष्क क्षेत्रों में मक्के की पैदावार तेजी से गिरती है। लगातार गर्मी के कारण कम अक्षांश वाले क्षेत्रों में गेहूं की पैदावार कम हो जाती है। अधिक तापमान मिट्टी में बैक्टीरिया और दूसरे जीवाणुओं की गतिविधि को तेज करता है। तेजी से अपघटन से नाइट्रोजन हवा और पानी में निकलती है। ऐसे में अमोनिया, नाइट्रस ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन काफी बढ़ जाता है। नाइट्रेट ज्यादा तेजी से भूजल और नदियों में मिल जाता है। ऐसी स्थितियों में वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और पानी का प्रदूषण बढ़ जाता है। कम संसाधनों वाले क्षेत्रों को नाइट्रोजन की कमी और खाद्य असुरक्षा से ज्यादा नुकसान होता है।
बारिश के पैटर्न होने वाले बदलाव नाइट्रोजन के व्यवहार को बहुत ज्यादा नियंत्रित करते हैं। बढ़ी हुई बारिश पानी के स्ट्रेस को कम करके सूखे क्षेत्रों में पौधों की ग्रोथ में मदद करती है। शुष्क क्षेत्रों में घास के मैदान ठोस उत्पादकता लाभ के साथ प्रतिक्रिया करते हैं। आर्द्र क्षेत्रों में ग्रोथ की प्रतिक्रियाएं छोटी होती हैं। लेकिन कम बारिश जीवाणु गतिविधि और जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण को सीमित करती है। नाइट्रोजन मिट्टी में फंसी रहती है जबकि पौधों की ग्रोथ धीमी हो जाती है। भारी बारिश नाइट्रेट को मिट्टी से बाहर निकालकर नदियों और झीलों में धकेल देती है, जबकि जलभराव वाली मिट्टी से नाइट्रोजन निकलती है। जैसे-जैसे बहुत अधिक बारिश की घटनाएं आम होती जा रही हैं, बड़े पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान का खतरा बढ़ रहा है।
वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में बताया कि जलवायु परिवर्तन नाइट्रोजन संतुलन में क्षेत्रीय अंतर को बढ़ा रहा है। इससे खाद्य असुरक्षित क्षेत्रों को ज़्यादा पैदावार के नुकसान और प्रदूषण के दबाव का सामना करना पड़ता है। सुदृढ़ नाइट्रोजन मैनेजमेंट पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करता है, साथ ही खाद्य उत्पादन में भी मदद करता है। कुशल उर्वरक का उपयोग नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में सुधार करता है। कार्बनिक और गैर रासायनिक खाद का उपयोग लंबे समय तक मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। नाइट्रोजन को फिक्स करने वाले पेड़ जंगलों को पोषक तत्वों की लगातार आपूर्ति बनाए रखने में मदद करते हैं।
नाइट्रोजन साइकिलिंग में प्रकाशित अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष है कि नाइट्रोजन को सिर्फ खेती के एक आवश्यक तत्व के तौर पर देखने के बजाय इसे वैश्विक पैमाने पर मैनेज करना शुरू करना होगा। अगर हम नाइट्रोजन को समझदारी से मैनेज करते हैं, तो हम एक ही समय में भुखमरी से निपटने, साफ पानी की रक्षा और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को सीमित करने में सक्षम हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि समन्वित कार्रवाई बढ़ते जलवायु परिवर्तन के तहत पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा कर सकती है, भोजन की गुणवत्ता में सुधार कर सकती है।
लेखक विज्ञान संबंधी मामलों के जानकार हैं।

