लोकतंत्र की गरिमा

स्वस्थ परंपराओं का निर्वहन करें पक्ष-विपक्ष

स्वस्थ परंपराओं का निर्वहन करें पक्ष-विपक्ष

विश्वनाथ सचदेव

पिछले दिनों हमने संविधान-दिवस मनाया था। 26 नवम्बर 1949 को देश ने अपना संविधान पूरा करके उस पर हस्ताक्षर किये थे। हमारे संविधान-निर्माताओं के ये हस्ताक्षर देश के हर नागरिक का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये हस्ताक्षर कुल मिलाकर इस बात की सहमति और स्वीकृति हैं कि देश का संविधान सर्वोपरि है। हमारे प्रधानमंत्री कई बार इसे ‘हमारा सबसे बड़ा’ धर्म ग्रंथ कह चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी जब सांसद बनकर पहली बार संसद भवन पहुंचे थे तो उन्होंने संसद भवन की सीढ़ियों पर शीश झुकाकर जनतंत्र के सर्वोच्च मंदिर को प्रणाम किया था। जनतंत्र का यह मंदिर और धर्म ग्रंथ, दोनों, हमारे देश की गरिमा के प्रतीक हैं। इनका सम्मान उन मूल्यों और आदर्शों का सम्मान है जो जनतांत्रिक व्यवस्था की महत्ता को रेखांकित करते हैं।

उस दिन जब संसद में संविधान-दिवस मनाया गया तो सांसदों को प्रधानमंत्री के अलावा राष्ट्रपति ने भी संबोधित किया था। एक चीज़ जो खलने वाली थी, वह कार्यक्रम का विपक्ष द्वारा बहिष्कार था। यह कार्यक्रम सरकार का नहीं था, पूरी संसद का था। संविधान में अपनी आस्था और निष्ठा प्रकट करने के इस अवसर को किसी भी पक्ष द्वारा राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति का माध्यम बनाना उचित नहीं कहा जा सकता। सरकार और विपक्ष दोनों का कर्तव्य बनता था कि वे इस अवसर की गरिमा और पवित्रता की रक्षा के प्रति सजग दिखाई देते। पर ऐसा हुआ नहीं। दोनों पक्षों की बराबर की भागीदारी होनी चाहिए थी इस कार्यक्रम में। सभी पक्षों को अवसर मिलना चाहिए था संविधान के प्रति अपनी निष्ठा को स्वर देने का। यह सहभागिता ही जनतांत्रिक व्यवस्था को महत्वपूर्ण बनाती है। गरिमा प्रदान करती है।

अच्छी बात है कि इस सहभागिता को संसद का सत्र प्रारंभ होने से पहले प्रधानमंत्री ने फिर से रेखांकित किया। पर इसे सुनिश्चित करने का काम भी मुख्यत: सत्ता पक्ष को ही करना होता है। पर, दुर्भाग्य से, संसद के पिछले कई सत्रों में सहभागिता की भावना का अभाव दिखाई दिया है। दोनों पक्ष इसके लिए एक-दूसरे को दोषी ठहरा सकते हैं, ठहराते भी हैं। लेकिन इस बात को नहीं भुलाया जाना चाहिए कि संसद की कार्रवाई सुचारु रूप से चले, इसका दायित्व मुख्यत: सत्तारूढ़ पक्ष पर ही होता है। 

जनतंत्र में यह अवसर संसद के कामकाज में सहभागिता से परिभाषित होता है। सहभागिता का अर्थ है विचार-विमर्श में हिस्सेदारी। मुद्दों पर बहस ही वह माध्यम है, जिससे सदन में सदस्यों की सहभागिता सुनिश्चित होती है। लेकिन, जिस तरह से संसद में विवादास्पद कृषि-कानूनों की वापसी का विधेयक पारित हुआ, वह इस सहभागिता को अंगूठा दिखाने वाला काम ही कहा जा सकता है। लोकसभा में सिर्फ तीन मिनट और राज्यसभा में नौ मिनट में इन कानूनों को वापस ले लिया गया। कानूनों की वापसी करने का निर्णय लेने में सरकार को पूरा एक साल लग गया, और मिनटों में कानूनों को निरस्त कर दिया गया। कोई बहस नहीं, कोई विचार-विमर्श नहीं। तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषणा भी प्रधानमंत्री ने सदन के बजाय मीडिया में राष्ट्र के नाम संदेश में करना बेहतर समझा। संसद को इस बारे में सरकार से सवाल-जवाब का अवसर मिलना ही चाहिए था। कानून वापस लेने के कुछ घंटे पहले ही प्रधानमंत्री ने यह कहा था कि सरकार खुले दिमाग से हर मुद्दे पर सभी सवालों के जवाब देने के लिए तैयार है। 

वे तो यह भी कह चुके हैं कि सीमित समय के लिए ही सही, कुछ बहस तो राजनीतिक छींटाकशी के बगैर भी होनी चाहिए। पर सिर्फ बातों से बात नहीं बनती। संसद की गरिमा और महत्व का तकाज़ा है कि सांसदों को गंभीर बहस का अवसर मिले। मुद्दों पर विचार-विमर्श हो। संसद के पिछले सत्र में पंद्रह कानून दस मिनट से भी कम समय में पारित हुए थे। स्पष्ट है, यह काम विचार-विमर्श के बिना ही हुआ होगा। कृषि-कानूनों पर ज़रूर दोनों सदनों में लगभग दो-दो घंटे तक बहस हुई थी, पर शायद पर्याप्त नहीं था इतना समय। समुचित समय मिलता तो शायद कोई स्वीकार्य कानून बन सकते। अब भी जब कृषि कानूनों को निरस्त करने वाला विधेयक पारित हुआ तो विपक्ष की बहस की मांग को ठुकरा दिया गया। 

बहरहाल, संसद के शीतकालीन सत्र का पहला ही कानून बिना किसी बहस के पारित हो, यह कोई शुभ संकेत नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों पक्ष, सरकार और विपक्ष, इस संदर्भ में अपने-अपने दामन में झाकेंगे। पर इससे भी महत्वपूर्ण बात उस मतदाता के सम्मान की है, जिसने दोनों को चुना है। कृषि कानूनों को वापस लेने के प्रधानमंत्री के निर्णय को उनके समर्थक ‘राष्ट्र-हित’ में लिया गया ‘महान’ निर्णय बता रहे हैं, लेकिन यह बात सदन में होती तो बेहतर होता। तब यह भी पूछा जा सकता कि कृषि-कानूनों के संदर्भ में वह क्या था जो राष्ट्र-हित में नहीं था? इस तरह के अवसर बहस से ही मिल सकते हैं। सत्तारूढ़ पक्ष और विपक्ष, दोनों को ऐसे अवसरों की संभावनाएं बढ़ाने के बारे में सोचना होगा। यह याद रखना ज़रूरी है कि बहस संसद की प्राणवायु है!

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