मानवीय हस्तक्षेप से बाढ़ का विस्तार

मानवीय हस्तक्षेप से बाढ़ का विस्तार

भरत झुनझुनवाला

भरत झुनझुनवाला

बिहार समेत सम्पूर्ण पूर्वी भारत में बाढ़ से हालात बिगड़ते जा रहे हैं। हर वर्ष बाढ़ का स्वरूप अधिक आक्रामक होता जा रहा है। इसका मूल कारण यह है कि हम नदियों को केवल पानी लाने वाली एक व्यवस्था के रूप में देखते हैं और नदियों के द्वारा लायी जाने वाली गाद को नजरअंदाज करते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि हरिद्वार से कोलकाता तक देश का जो समतल भूखंड है, वह हिमालय से लायी गयी गाद से ही निर्मित हुआ है। गंगा हिमालय से गाद लाती है और उसे बाढ़ के रूप में जमीन पर फैलाती है, जिससे हमारा भूखंड ऊंचा होता जाता है। साथ-साथ वह अपने मुख्य चैनल में हर साल कुछ न कुछ गाद को जमा करती जाती है। भविष्य में पांच-दस साल बाद जब भारी बाढ़ आती है तो वह अपने चैनल में जमा गाद को अपने वेग से धकेल कर समुद्र तक ले जाती है। धकेली गई गाद का भी देश के भूखंड को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान होता है। जैसे पूर्व में किसी समय हमारा भूखंड कानपुर तक रहा होगा। समय क्रम में गंगा की बड़ी बाढ़ ने उस गाद को धकेला और उस गाद से प्रयागराज तक का भूखंड बना। फिर पटना बना और फिर सुंदरबन तक बना।

गंगा की इस पावन व्यवस्था में हमने दो प्रकार से छेड़छाड़ की है। पहली यह कि हमने टिहरी बांध बनाकर भारी मात्रा में गाद को बांध के तालाब में रोक लिया है। दूसरा परिवर्तन यह किया है कि भीमगोड़ा और नरोरा बैराज में बरसात के समय गंगा के पानी को सिंचाई के लिए निकालकर गाद का आगे जाना कम कर दिया है। इससे दो परस्पर विरोधी प्रभाव हुए। पहला यह कि गाद आगे कम जाने से गंगा का पानी जब फैलता है तो उसमें गाद की मात्रा कम होती है और गंगा के पेटे में गाद का एकत्रीकरण कम होता है। दूसरा प्रभाव यह हुआ है कि हमने टिहरी में भागीरथी के पानी को रोक लिया और मानसून के समय भीमगोड़ा और नरोरा में गंगा के कुछ पानी को निकाल लिया। इसलिए वेग से आने वाली बड़ी बाढ़ का आना बंद हो गया है। इन्हीं कारणों से कम मात्रा में आई हुई गाद अब नदी के पेटे में जमा होती जा रही है और बड़ी बाढ़ के अभाव में वह अब समुद्र तक नहीं धकेली जा रही है। फलस्वरूप बरसात के समय कम गति से आने वाला पानी पेटे में जमा गाद को धकेल कर समुद्र तक नहीं पहुंचा पा रहा है। गाद नदी के पेटे में ही पड़ी रह जाती है। भले ही वह कम मात्रा में ही क्यों न हो। इसका परिणाम यह हो रहा है कि नदी का चैनल उथला होता जा रहा है। जितना बाढ़ का प्रकोप पहले बड़ी बाढ़ में होता था, उतना ही प्रकोप अब छोटी बाढ़ में होने लगा है और प्रति वर्ष जनजीवन अस्तव्यस्त होने लगा है। जैसे यदि खेत की नाली में मिट्टी भर दी जाये तो नाली के उथला हो जाने के कारण थोड़ा पानी भी अगल-बगल ज्यादा बिखरता है।

गाद के समुद्र तक न धकेले जाने के कारण हमारी धरती का भूखंड बढ़ने के स्थान पर अब घटने लगा है। समुद्र की गाद के लिए एक स्वाभाविक भूख होती है। जैसे आपको और हमको रोटी खाने की इच्छा होती है वैसे ही समुद्र को गाद खाने की इच्छा होती है। जब उसे नदी से गाद मिलना बंद हो जाती है तो वह हमारे तटीय क्षेत्रों को खाने लगता है। पूर्व में गंगा भारी मात्रा में गाद लाती थी। उससे वह भूखंड का निर्माण करती थी और समुद्र की भूख को भी पूरा कर देती थी और हमारा भूखंड भी बढ़ रहा था। अब गाद कम आने से समुद्र की भूख पूरी नहीं हो रही है, समुद्र की भूख का शमन नहीं हो रहा है, और आज समुद्र सुंदरबन को काटने लगा है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि टिहरी, भीमगोड़ा और नरोरा द्वारा गाद को रोकने और बाढ़ को रोकने के कारण हमारे देश का भूखंड कट रहा है। ऐसा कहा जा सकता है कि अप्रत्यक्ष रूप से टिहरी, भीमगोड़ा और नरोरा द्वारा देश की भूमि का भक्षण किया जा रहा है।

इस समस्या के पीछे फरक्का बैराज की भी बड़ी भूमिका है। वैज्ञानिक बताते हैं कि नदी पर एक पुल बनाने मात्र से ही नदी के प्रवाह के वेग में कमी आ जाती है। अतः यदि फरक्का बैराज के सब गेट खोल दिए जाएं तो भी गंगा का वेग कम ही होगा। वेग कम होने से गंगा द्वारा जो कम मात्रा में गाद लायी जा रही है, वह रास्ते में ही ठहर जाती है। पहले हमने बड़ी बाढ़ को बंद करके जो गाद जमा की थी, उसे धकेल कर हटाना बंद किया; फिर फरक्का बनाकर गाद का जमा करना बढ़ा दिया। कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि फरक्का के कारण पटना से लेकर फरक्का के बीच में गाद जमा हो रही है, जिसके कारण इस पूरे क्षेत्र में गंगा उथली हो गयी है और कम पानी में भी बाढ़ का प्रकोप अधिक हो रहा है। गंगा का वेग कम हो जाने से गंगा की गंडक और कोसी जैसी नदियों द्वारा लाये गये बाढ़ के पानी को वहन करने की क्षमता भी कम हो रही है, जिसके कारण बाढ़ पीछे भी बढ़ रही है।

टिहरी हाईड्रो डेवलपमेंट कारपोरेशन ने जब टिहरी बांध बनाया था तो उस समय आशा थी कि यह झील तीन सौ वर्ष में गाद से भरेगी। कारपोरेशन द्वारा हाल में कराए गये अध्ययन में यह बात सामने आई है कि झील 140 से 170 वर्ष में ही पूरी तरह गाद से भर जायेगी और इसके बाद टिहरी बांध में भागीरथी के पानी को रोकने की क्षमता शून्य हो जाएगी। और तब हमें बाढ़ के साथ जीना ही पड़ेगा। इसलिए हम टिहरी बांध का विकल्प तलाशें ताकि बाढ़ आना शुरू हो और गंगा द्वारा गाद को समुद्र तक धकेला जा सके; एवं फरक्का का विकल्प तलाशें कि गाद जमा होना कम हो। बाढ़ से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए हमें अपने गांवों को और शहरों को इस प्रकार बसाना चाहिए कि हम बाढ़ के साथ जीवित रह सकें। छोटी बाढ़ को रोकने में हमने अनायास ही बड़े संकट को मोल ले लिया है।

सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड ने बताया है कि उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्र में भूमिगत तालाबों में टिहरी की तुलना में पानी संग्रहण की तीस गुना क्षमता है। इस संग्रहण को बढ़ाकर टिहरी के बिना भी दिल्ली को पीने का पानी उपलब्ध कराया जा सकता है।

लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।

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