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पहले लत लगाओ, फिर जमकर कमाओ

तिरछी नज़र

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कोई सुविधा ‘बिलकुल मुफ्त’ मिले तो खुश होने से पहले एक सवाल जरूर पूछिए—कहीं ऐसा तो नहीं कि आज जो मुफ्त है, उसकी कीमत कल आपकी आदत वसूलने वाली है?

यूपीआई पर शुल्क और शुल्क पर भी जीएसटी की खबर ने कलमदास को कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है। ‘पहले आदत लगाओ, फिर जमकर कमाओ’—यह कोई घोषित स्लोगन नहीं है। न जाने कब से कमाई के दीवानों का यह मौन-मंत्र चला आ रहा है। इसे न मंच से बोला जाता है, न विज्ञापन में लिखा जाता है; बस मन ही मन दोहराया जाता है और पूरी निष्ठा से अमल में लाया जाता है।

सुना है, एक जमाने में लोगों को मुफ्त में चाय पिलाई जाती थी। लोगों ने बड़े चाव से पी। फिर चाय पीने की आदत लगी और चाय बिकने लगी। लोगों को शायद लगा भी होगा कि यह लत गलत लग गई है। मगर लत ही क्या, जिसे गलत समझ लेने भर से छोड़ा जा सके! आज चाय केवल पेय नहीं, जीवनशैली है। सुबह की शुरुआत चाय से होती है और कई महत्वपूर्ण फैसले भी उसके साथ ही होते हैं।

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वैसे गुरुत्वाकर्षण से कम शक्तिशाली ‘मुफ्ताकर्षण’ भी नहीं होता। मुफ्त का आकर्षण ऐसा है कि उसकी ओर खिंचने के लिए किसी को बहुत समझाने की जरूरत नहीं पड़ती। आनंद बख्शी ने ‘शमा-परवाना’ के माध्यम से एक अलग तरह के आकर्षण का वर्णन किया था। शमा मना करती रही, पर परवाना जलने के लिए चला आया। मुफ्त के मामले में तो शमा मना भी नहीं करती। वह तो हाथ फैलाकर बुलाती है—आइए, बिलकुल मुफ्त है! यही ‘बिलकुल’ मुफ्त को और आकर्षक बना देता है।

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चाय का उदाहरण अब पुराना हो चुका है। कुछ वर्ष पहले मुफ्त डेटा ने मोबाइल उपभोक्ताओं को ऐसा आकर्षित किया कि डेटा उनकी जरूरत से बढ़कर आदत बन गया। आज स्थिति यह है कि आटे से अधिक चिंता डेटा की होती है। कोई व्यक्ति भूखा रह सकता है, लेकिन ‘बे-डाटा’ रहना कठिन है।

फिर मुफ्त होम डिलीवरी आई। पहले दरवाजे तक सामान बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के पहुंचने की आदत डाली गई। जब आदत पक्की हो गई तो डिलीवरी शुल्क धीरे-धीरे प्रकट होने लगा। अब मुफ्त की दुनिया में नई-नई संभावनाएं दिखाई देती हैं। जो सुविधा कल तक मुफ्त थी, उसके साथ आज कोई छोटा-सा शुल्क जुड़ जाता है। कल वही शुल्क बड़ा हो सकता है और परसों उसके ऊपर कोई नया शुल्क भी आ सकता है।

उपभोक्ता तब याद करता है कि कभी यह सब मुफ्त था। लेकिन बाजार मुस्कुराकर कहता है—मुफ्त था, तभी तो आदत लगी थी। यूपीआई शुल्क को लेकर व्यवसायी भी यही सोच रहे हैं।

मुफ्ताकर्षण का सिद्धांत बड़ा सरल है—पहले ग्राहक को आकर्षित करो, फिर उसे अभ्यस्त बनाओ और अंततः उसकी आदत को अपनी आमदनी का साधन बना लो।

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