आसमानी कहर टालने को तलाशें उन्नत तकनीक

आसमानी कहर टालने को तलाशें उन्नत तकनीक

यादवेंद्र

कुछ दिनों पहले ‘वेदर एंड क्लाइमेट एक्सट्रीम्स’ नामक जर्नल में भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित एक पर्चे में 1970 से लेकर 2019 तक के जलवायु आंकड़ों का इस्तेमाल करके यह निष्कर्ष निकाला गया था कि उष्णकटिबंधीय चक्रवात के कारण देश में मृत्यु दर में 94 फीसदी की कमी (पिछले 20 वर्षों में) आई है जबकि मृत्यु दर में तेज़ गर्मी के कारण 62.2 फीसदी और आकाशीय बिजली गिरने के कारण 52.8 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। चक्रवात के बेहतर और प्रामाणिक पूर्वानुमान लगाए जा सके इसी लिए मृत्यु दर में कमी हुई।

अभी-अभी सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि 2022 में तेज गर्मी/लू के 203 दिन रिकॉर्ड किये गए जबकि पिछले वर्ष यह संख्या महज़ 36 दिन थी यानी लगभग छह गुना वृद्धि। पर चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि सबसे ज्यादा लू का सामना उत्तराखंड को करना पड़ा - प्रमुख रूप से इस पहाड़ी राज्य में 28 दिन ऐसे थे, जिसमें पहाड़ी इलाकों का अधिकतम तापमान 30 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया और मैदानी इलाकों का 40 डिग्री (भारतीय मौसम विभाग ने तेज गर्मी/लू की ऐसी देशव्यापी परिभाषा निर्धारित की है)। सबसे ज्यादा गर्मी वाले अन्य अग्रणी राज्य राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, झारखण्ड और दिल्ली हैं। असम, हिमाचल और कर्नाटक को एक दिन भी तेज गर्मी का सामना नहीं करना पड़ा।

इस साल मार्च और अप्रैल महीना असाधारण गर्मी के लिए कुख्यात रहा जब गर्मी सामान्य से पांच डिग्री या ज्यादा ऊपर रही। मौसम विभाग के आंकड़ों के हवाले से बताया गया कि बताया गया कि पिछले 122 सालों में इस तरह की गर्मी नहीं पड़ी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने इस असामान्य स्थिति के बारे में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें बताया गया है कि तेज गर्मी के कारण गेहूं, चना, मक्का, लोबिया, सरसों की पैदावार में खासी कमी होने का अंदेशा है। इसके साथ-साथ फलों और सब्जियों की उपज में भी कमी आएगी। इसके चलते मवेशियों की सेहत भी प्रभावित होगी और दूध उत्पादन भी घटेगा।

यह जानना चकित करता है कि इस देश में प्राकृतिक आपदाओं के चलते होने वाली मौतों में सबसे ऊपर आकाशीय बिजली (तड़ित) का नाम आता है और दिनों दिन यह संख्या बढ़ती जा रही है। सरकार द्वारा जारी किये आंकड़े बताते हैं कि बरसात के दिनों में आकाश में बिजली चमकने और धरती पर गिरने की घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं। 1968 से लेकर 2004 के बीच इनसे मरने वालों की सालाना औसत 1500 की थी पर इसके बाद से अब तक के अठारह सालों में यह औसत संख्या बढ़ कर 2000 को पार कर गई है- अकेले पिछले साल आकाशीय बिजली से 2876 निर्दोष भारतीयों की जान असमय चली गई। सबसे दर्दनाक मौतों में आमेर का किला घूमने आये सोलह सैलानियों की एक साथ मृत्यु काले अक्षरों में इतिहास में दर्ज़ हो गई। 1970 की तुलना में 2019 आते-आते तड़ित आधारित मृत्यु दर में डेढ़ गुना से ज्यादा वृद्धि हुई।

1967 से 2019 के बीच बिजली गिरने से भारत में एक लाख से ज्यादा मौतें दर्ज़ की गई हैं। वैसे अलग-अलग जगहों पर प्रकाशित आंकड़े भिन्न सूचना देते हैं इसलिए मृत्यु के आंकड़े किस राज्य से सबसे ज्यादा आते हैं यह सही-सही बताना मुश्किल है। प्रकाशित खबरों को देखकर यह बताया जा सकता है कि आकाशीय बिजली के कोप से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले राज्यों में ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र इत्यादि अग्रणी हैं।

अमेरिका जैसे विकसित देश में भी बरसात के मौसम में बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ रही हैं लेकिन उनसे भारत जैसी मृत्यु नहीं होती- इसका कारण है पूर्वानुमान की उन्नत तकनीक का उपलब्ध होना। अभी हाल में प्रकाशित एक लेख में बीबीसी ने बताया है कि अमेरिका में यदि तापमान 1 डिग्री बढ़े तो आकाशीय बिजली की घटनाओं में 12 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। यह तथ्य सिर्फ अमेरिका में नहीं बल्कि भारत सहित उन तमाम देशों के लिए भी सही हो सकता है जिनमें अनेक कारणों से औसत तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि देखी जा रही है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि इस देश में कुछ इलाके ऐसे हैं जहां सबसे ज्यादा मौतें साल-दर-साल बिजली गिरने से होती हैं। ऐसा ही एक गांव है पश्चिम बंगाल में कोलकाता से 120 किलोमीटर दूर समुद्र तट पर बसा हुआ फ़्रेजर गंज- इस गांव में हर साल औसतन 60 जानें बिजली गिरने से जाती हैं। तकनीकी शब्दावली में ऐसे स्थलों को ‘लाइटनिंग हॉटस्पॉट’ कहते हैं और इनसे बचाव के लिए भरसक प्रयत्न किए जाने चाहिए।

वैसे सरकारी स्तर पर बिजली गिरने के पूर्वानुमान के कथित ऐप को लेकर चाहे जो दावे किए जाते रहे हों, अपनी स्थानीय पहल पर गांववासी देसी तड़ित चालक बना कर मृत्यु दर कम कर रहे हैं। वे बांस के डंडों के ऊपर साइकिल के पुराने पहियों के रिम को तिरछा टांग देते हैं और उनमें धातु के तार बांध कर दूसरा सिरा जमीन में गड्ढा बना कर गाड़ देते हैं जिससे धातु का होने और ऊंचाई पर होने के चलते बिजली इनपर गिरे और तार से होती हुई जमीन में समा जाए। ग्रामीणों की इस मुहिम के सकारात्मक परिणाम आए हैं और मौतों में साठ फ़ीसदी तक की कमी देखी गई है।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है बिजली गिरने की घटनाएं सबसे ज्यादा मानसून के व्यापक प्रसार से पहले के महीनों में होती हैं- उस समय धरती की सतह का तापमान काफी ज्यादा होता है और हवा में नमी की मात्रा भी बहुत होती है, यही स्थिति आकाशीय बिजली की परिघटना को जन्म देने के लिए अनुकूल मानी जाती है।

परन्तु इस साल बिजली गिरने से सबसे ज्यादा मृत्यु जुलाई के महीने में हुई। इसका कारण यह बताया गया कि लंबे समय तक मानसून सक्रिय नहीं हुआ इसलिए बारिश नहीं हुई और धरती का तापमान बढ़ता रहा और उन से ही बिजली गिरने की घटनाओं में वृद्धि हुई।

कई अखबारों में मौसम विभाग के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक को उद्धृत किया गया, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जलवायु संकट के साथ बिजली गिरने की घटनाओं में वृद्धि को जोड़ा जा सकता है। उन्होंने तेजी से होते शहरीकरण और वृक्षों के विनाश को इसके लिए दोषी ठहराया। इतना ही नहीं, उन्होंने चेतावनी दी कि प्रकृति के साथ अविवेकी छेड़छाड़ के चलते आगे आने वाला समय लोगों के लिए ज्यादा संकट लेकर आएगा।

कुछ अन्य वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप धरती के तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि, ज्यादा बरसात होने के कारण हवा में ज्यादा नमी की मौजूदगी, वायु प्रदूषण के कारण हवा में एरोसॉल की अधिकता आकाशीय बिजली बनाने और विनाश करने के लिए अनुकूल स्थितियां पैदा करती है।

लेखक केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान के निदेशक रहे हैं।

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