परदेस में भी सामंती सोच का दंश : The Dainik Tribune

परदेस में भी सामंती सोच का दंश

घरेलू हिंसा

परदेस में भी सामंती सोच का दंश

मोनिका शर्मा

मोनिका शर्मा

बीते दिनों बिजनौर की एक बेटी मनदीप ने अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में घरेलू हिंसा से तंग आकर खुदकुशी कर ली। यह अतिवादी कदम उठाने से पहले महिला ने रोते हुए एक वीडियो भी बनाया। वीडियो में पति पर मारपीट करने और मायके वालों से दहेज मांगने का आरोप लगाया है। वीडियो में महिला कहती दिख रही हैं कि ‘मैंने सब सहन किया। इस उम्मीद में कि वह एक दिन खुद में सुधार करेगा। आठ साल से मैं रोज मारपीट झेल रही हूं।’ इतना ही नहीं, वीडियो में महिला के साथ की जा रही मारपीट के दृश्य भी दिख रहे हैं। एक सोशल मीडिया मंच पर यह वीडियो साझा करने के कुछ देर बाद ही उसने पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली। वायरल हुआ यह वीडियो भारत ही नहीं, दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। महिला के मायके वालों का भी कहना है कि शादी के बाद से ही मारपीट और दहेज की मांग करने वाले मनदीप के पति ने दो बेटियां होने पर उसे और प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

दरअसल, यह दुखद वाकया बताता है कि दूर देश जा बसने भर से सोच में बदलाव नहीं आ जाता। अपनी पत्नी के साथ हिंसक व्यवहार करने, दहेज की मांग करने या बेटियां होने पर ताने-उलाहने देने की रूढ़िवादी सोच कहीं भी जा बसें, भीतर ही बैठी होती है। यही वजह है कि विदेशों में बसे भारतीय परिवार भी स्त्रियों के प्रति हद दर्जे की पुरातन सोच रखते हैं। उनके साथ दोयम दर्जे का दमनकारी व्यवहार करते हैं। इतना ही नहीं, बेटियों के जन्म को लेकर पुरातनपंथी सोच रखने वाले परायी धरती पर भी कम नहीं। भले ही वहां का समाज बेटे-बेटी के भेदभाव से परे हो, यह सोच वहां बसे कई भारतीय परिवारों में आज भी मौजूद है। दूर देश में भी मानसिकता के ऐसे कटु पहलू ही परदेश में ब्याही बेटियों के जीवन का दंश बने हुए हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, हर 8 घंटे में विदेशों में रहने वाली एक भारतीय पत्नी अपने घरवालों से फोन कर सहायता मांगती है। उनकी परेशानी की वजह अधिकतर, घरेलू हिंसा, दहेज की मांग, जीवनसाथी का विवाहेतर संबंध और अपमानजनक बर्ताव जैसी समस्याएं ही होती हैं।

दुनिया का हर इंसान सम्मान और सुरक्षा के मोर्चे पर अपने आंगन से सबसे ज्यादा उम्मीद रखता है। लाजिमी भी है क्योंकि आशाओं को पोषण देने वाले अपनों का साथ अस्मिता की रक्षा, अपमान एवं उपेक्षा की आंच से बचाने के लिए ही तो होता है। दुखद है कि प्रगतिशील समाज वाले मुल्कों में जाकर बसने के बाद भी बहुत-सी भारतीय महिलाओं को अपने ही घर में मनुष्यता का मान करने वाला माहौल नहीं मिलता। जबकि महिलाएं सात फेरों के साथ को निभाने और घर-परिवार सम्भालने की हरसंभव कोशिश करती हैं। इस मामले में भी कुछ समय पहले मनदीप के पिता ने अपने मित्रों की मदद से अमेरिका में शिकायत दर्ज कराई थी। लेकिन पति के अपने दुर्व्यवहार के लिए शर्मिंदा होने और माफी मांगने पर मनदीप ने समझौता कर लिया। हालांकि उसके बर्ताव में कोई परिवर्तन नहीं आया। संभवतः अपने घर को बचाए रखने के इरादे से ही समझौते के बाद वह मायके वालों से भी उसके दुर्व्यवहार की बातें छुपाने लगी। इतना ही नहीं, अमेरिका और भारत समेत कई देशों में मनदीप कौर को न्याय दिलाने के लिए मुहिम चल रही है। लेकिन हर मुहिम और जागरूकता अभियान से परे यह घटना इस सवाल को उठाती है कि देश हो या विदेश अपनी ही चौखट के भीतर यह वेदना महिलाओं के हिस्से क्यों आती है?

दरअसल, यह हिंसक व्यवहार लैंगिक भेदभाव की लीक पर चलने की सोच का ही परिणाम है। जिसके चलते पहले पत्नी को दोयम दर्जा देने की मानसिकता से उपजी प्रताड़ना और फिर बेटियों की सहज स्वीकार्यता न होने का व्यवहार। कहना गलत नहीं होगा कि रूढ़िवादी मानसिकता की इस जकड़न ने बहुत कुछ बदलकर भी कुछ न बदलने जैसे हालात बना रखे हैं। कुछ समय पहले आईं शिकायतों के आधार पर यह खुलासा हुआ था कि अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के नागरिक पत्नियों के साथ हिंसात्मक व्यवहार करने के मामले में सबसे आगे हैं। इन शिकायतों के मुताबिक बीते 7 वर्षों में अमेरिका में रहने वाले एनआरआई परिवारों से करीब 615 शिकायतें केंद्र सरकार के पास आई थीं। इतना ही नहीं, मिली जानकारी के मुताबिक एनआरआई पति द्वारा पत्नियों को छोड़ने और मारपीट करने के करीब 2 हजार मामले पिछले सात साल में सामने आए हैं। इस मामले में अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर संयुक्त अरब अमीरात और तीसरे नंबर पर सिंगापुर है।

हाल ही में आए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग एक-तिहाई महिलाओं ने शारीरिक या यौन हिंसा झेली है। हालत ऐसे हैं कि 11 राज्यों और 1 केंद्रशासित प्रदेश में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाओं ने तो घरेलू हिंसा के मामले में कभी किसी से मदद तक नहीं मांगी। ऐसे में दूर देश जा बसी महिलाओं की स्थिति आसानी से समझी जा सकती है।

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