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सौंदर्य दर्शन और प्रेम-प्रदर्शन का महोत्सव

तिरछी नज़र

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समय बदला है, मूल्य बदले हैं, पर शर्म का पानी शायद किसी पुरानी पनघट पर ही सूखकर रह गया है। प्रेम पवित्र है, किंतु उसकी सार्वजनिक प्रैक्टिकल परीक्षा ने संस्कारों को ‘एब्सेंट’ और दिखावे को ‘प्रेज़ेंट’ कर दिया है।

वसंत में मुहब्बत के संत सक्रिय हो जाते हैं। वैलेंटाइन सप्ताह में वैलेंटाइन बाबा का अवतार बन कर लव का टॉपअप रिचार्ज कराने में लग जाते हैं। 7 फरवरी रोज डे से विधिवत प्रारंभ आठ दिवसीय प्रेमोत्सव 14 फरवरी वैलेंटाइन डे के साथ समारोहपूर्वक संपन्न होता है। आधुनिकता की होड़ में प्रेमी-युगल इस सप्ताह को खास बनाने में लग जाते हैं। किंतु इन खास पराक्रम में दर्शन कम प्रदर्शन ज्यादा होता है।

कहते हैं इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते। जैसे लोकतंत्र में पारदर्शिता आवश्यक है, वैसे ही प्रेम में ‘पब्लिसिटी’ को अब अनिवार्य मान लिया गया है। आधुनिक प्रेमी ऐसे मिलते हैं, मानो ‘देखो, हम सिंगल नहीं रहे!’

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पार्क, मेट्रो, समुद्र तट की रेत से लेकर रेस्टोरेंट की कुर्सी तक, हर जगह प्रेमियों का ‘लाइव शो’ चालू है। कहीं घास पर बिछे दो दिल मिलते दिखाई देते हैं तो कहीं मेट्रो के डिब्बे में स्नेह का ऐसा प्रवाह बहता है कि बाकियों को सीट भले न मिले, दृश्य अवश्य मिल जाता है। प्रेम-प्रदर्शन की इस स्पर्धा में हीर-रांझा और मजनूं का जुनून भी ‘लो-क्वालिटी रोमांस’ प्रतीत होने लगता है।

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समाज भी अद्भुत है। पुरानी प्रेम-कथाओं में तोड़-फोड़ और पत्थरबाज़ी करने वाले लोग अब प्रेमियों की वीडियो रिकॉर्डिंग में विशेषज्ञ बन गए हैं। नंगी आंखों से देखने में जो मज़ा नहीं मिलता, वह ज़ूम करके कैद करने में आ जाता है। प्रेमी जोड़ों की मुद्राएं ऐसी कि खजुराहो की चित्रकला भी शरमा जाए और इतिहास यह सोचकर परेशान हो उठे कि—‘प्रेम कला में क्या हम आधुनिक और पारंगत नहीं थे?’

पार्कों का हाल यह है कि यहां कलियों से अधिक प्रेम-कलाएं खिलती हैं। पार्क की घास भी दुविधा में पड़ जाती है कि आखिर वह बिछी है या बिछाई जा रही है। सिनेमा हॉल में फिल्म कोई भी हो, पर कहानी अक्सर कार्नर सीट पर ही चलती है।

वह समय दूर नहीं जब ऐसे स्थानों पर ‘नो पार्किंग’ की जगह ‘नो रोमांसिंग’ वाले बोर्ड लगाए जाएंगे। यह और बात है कि तब भी लोग बोर्ड पढ़ते कम, तोड़ते ज्यादा मिलेंगे। आधुनिकता और दिखावे के इस युग में प्रेम अब भावना से अधिक ‘इवेंट’ बन चुका है। शर्म का पानी वाष्पीकृत हो चुका है और संस्कार बैकबेंच पर सो रहे हैं।

बहरहाल, समय बदला है, मूल्य बदले हैं, पर शर्म का पानी शायद किसी पुरानी पनघट पर ही सूखकर रह गया है। प्रेम पवित्र है, किंतु उसकी सार्वजनिक प्रैक्टिकल परीक्षा ने संस्कारों को ‘एब्सेंट’ और दिखावे को ‘प्रेज़ेंट’ कर दिया है।

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