पहले अनपढ़ या कम शिक्षित लोगों ने सीमित संसाधनों में बड़े संयुक्त परिवारों की जिम्मेदारी उठाई। ‘जितनी चादर हो, उतने पैर पसारो’ मुहावरा चरितार्थ किया। तब समाज में लालच की भावना बहुत कम थी। समाज में पाप और पुण्य का भाव भी था।
पूरे समाज में भ्रष्टाचार पर एक अजीब-सा खोखला आदर्शवाद पसरा हुआ है। भ्रष्टाचार पर बात करते हुए इंसान को स्वयं का भ्रष्टाचार नहीं दिखता है, लेकिन वह दूसरों के भ्रष्टाचार पर उंगली उठाता रहता है। भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर भाषणबाजी तो बहुत हो रही है, लेकिन हम भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए किसी भी तरह का प्रयास नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक कदम आगे बढ़कर भ्रष्टाचार बढ़ाने में अपना सहयोग कर रहे हैं।
सवाल यह है कि हमारे अंदर भ्रष्टाचार करने का भाव कैसे पैदा होता है? भ्रष्टाचार करते हुए हमें डर क्यों नहीं लगता है? क्यों हमारी आत्मा भ्रष्टाचार का विरोध नहीं करती है? ऐसा नहीं है कि हमें पता नहीं होता है कि भ्रष्टाचार करना गलत है, फिर हम क्यों भ्रष्टाचार के इस चक्रव्यूह में फंस जाते हैं?
दरसअल, भ्रष्टाचार का मूल कारण लालच होता है। इंसान की प्रवृत्ति ही ऐसी है कि वह लालच को छोड़ नहीं पाता है। ऐसा नहीं है कि अभाव के कारण ही लालच की प्रवृत्ति पैदा होती है; जिन लोगों के पास सब कुछ होता है, वे भी लालची होते हैं। इसलिए लालच का अमीरी या गरीबी से कोई सीधा संबंध नहीं है। ऐसे इंसान भी होते हैं जो गरीब होने के बावजूद दूसरों के कल्याण की बात सोचते हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे इंसान भी हैं जो अमीर होने के बावजूद इस हद तक लालची होते हैं कि उन्हें सिर्फ अपना स्वार्थ ही दिखाई देता है।
निस्संदेह, समाज पहले की अपेक्षा ज्यादा प्रगतिशील हो गया है, लेकिन हमारे समाज में लालच की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है। इसका अर्थ यह है कि पढ़ाई-लिखाई और प्रगतिशीलता हमारे लालच को खत्म नहीं कर पाई है। इसलिए पहले से ज्यादा शिक्षित समाज में न केवल भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है, बल्कि भ्रष्टाचार के नए-नए तरीके भी खोजे जा रहे हैं।
पुराने जमाने में लोग अनपढ़ या कम शिक्षित होते थे, लेकिन उस समय भ्रष्टाचार नहीं था। उस समय अनपढ़ या कम शिक्षित लोगों ने सीमित संसाधनों में बड़े-बड़े संयुक्त परिवारों की जिम्मेदारी उठाई थी। ‘जितनी चादर हो, उतने पैर पसारो’ मुहावरा उन दिनों सच्चे अर्थों में चरितार्थ किया जाता था। यही कारण था कि समाज के अंदर लालच की भावना बहुत कम थी। समाज में पाप और पुण्य का भाव भी था, इसलिए लोग गलत काम करने से डरते थे। आज धार्मिक कर्मकांडों और धार्मिक क्रियाकलापों में लोगों की संलिप्तता तो बढ़ी है, लेकिन इसके साथ भ्रष्टाचार भी बढ़ता जा रहा है।
यह कटु सत्य है कि इस दौर में धर्म के नाम पर भी भ्रष्टाचार बढ़ा है। बड़े-बड़े मठाधीशों की जांच की जाए तो कई तरह के भ्रष्टाचार प्रकाश में आएंगे। अगर हम सच्चे अर्थों में धार्मिक हैं, तो हमारे मन में गलत भाव आने ही नहीं चाहिए। धार्मिक होने के बावजूद यदि हमारे मन में लालच पैदा हो रहा है, तो फिर हम धार्मिक कहां हुए? भ्रष्टाचार भी कई तरह के होते हैं। कुछ भ्रष्टाचार हमें ऊपर से दिखाई दे जाते हैं, लेकिन कुछ भ्रष्टाचार ऊपर से दिखाई नहीं देते हैं। हम अक्सर आर्थिक भ्रष्टाचार पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन एक नैतिक भ्रष्टाचार भी होता है। स्वयं यह देखा है कि यदि आप मंदिर में मुरमुरे का प्रसाद लेकर पंडित जी के पास जाते हैं, तो आपके साथ सामान्य व्यवहार होता है; इसके विपरीत, यदि आप देसी घी के लड्डू प्रसाद के रूप में पंडित जी को सौंपते हैं, तो आपके साथ विशिष्ट व्यवहार किया जाता है। यह भेदभाव भी एक तरह का नैतिक कदाचार ही है।
हालांकि, चाहे आर्थिक भ्रष्टाचार हो या नैतिक भ्रष्टाचार, यह सब नैतिकता की कमी की वजह से ही होता है। यानी सतही तौर पर तो सब कुछ साफ-सुथरा लगता है, लेकिन साफ-सुथरी सतह के नीचे कई तरह की गंदगी छिपी होती है। जब यह गंदगी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, तब इसका प्रभाव सतह पर दिखाई देने लगता है। यह आश्चर्यजनक ही है कि हम अपनी दैनिक जिंदगी में गंदगी को पसंद नहीं करते हैं और इससे दूर ही रहना चाहते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार रूपी गंदगी को स्वयं ही खुशी के साथ अपने जीवन में स्थान दे देते हैं। भ्रष्टाचार पर यह खोखला आदर्शवाद इस बात को सिद्ध करता है कि हम धन के लालच में गंदगी को भी स्वीकार कर लेते हैं।
हम भ्रष्टाचार के खिलाफ काफी उपदेश देते रहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ समाज में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ता रहता है यानी हमने भ्रष्टाचार के साथ रहने की आदत बना ली है। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह समाज वास्तव में भ्रष्टाचार खत्म करना चाहता है या फिर भ्रष्टाचार के साथ ही जीना चाहता है?
जब हमसे कोई इंसान सुविधा शुल्क के रूप में रिश्वत वसूलता है, तो हमें बुरा लगता है और अपने अधिकार याद आने लगते हैं। इसके विपरीत, जब हम किसी दूसरे इंसान से रिश्वत वसूलते हैं, तो हमें अपना कर्तव्य याद नहीं रहता। यानी दूसरों के भ्रष्टाचार पर तो हम भ्रष्टाचार करने वाले इंसान को पापी बताकर उपदेश देने लगते हैं, लेकिन अपने भ्रष्टाचार पर चुप्पी साध लेते हैं। यह सुविधाजनक चुप्पी ही इस समस्या की असली जड़ है।

