अंतर्मन

संदेह के खात्मे से विश्वास की शुरुआत

संदेह के खात्मे से विश्वास की शुरुआत

अमिताभ स.

अमिताभ स.             

तब 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं चल रही थीं। शायद पहला ही पेपर था गणित का। बहुत पढ़ा था, ख़ासा अभ्यास भी किया था। इसलिए पेपर सेटर पर ही शक कर बैठा। सवालों के जवाब समझते वक्त दिमाग में शक कौंधा कि पेपर इतना आसान हो ही नहीं सकता। श़की घोड़े दौड़ाए और सीधे-सादे सवालों को टेढ़ा या ट्रिकी समझने की भूल कर बैठा। 

पेपर देने के बाद बाहर सहपाठियों से पेपर डिस्कस करते-करते समझ आ चुका था कि शक खामख्वाह था। फिर बाकी विषयों के पेपर में शक के कीड़े को दिमाग से निकाल फेंका। दो महीने बाद परीक्षा परिणाम घोषित हुआ तो गणित में महज़ 50 फ़ीसदी के आसपास अंक आए लेकिन बाकी चारों विषयों का औसत करीब 75 फीसदी बैठा। आजकल की तरह तब भी कॉलेज दाखिले में बेस्ट ऑफ फोर के नंबरों के आधार पर लिस्ट जारी की जाती थी। सो, ख़ुशक़िस्मती से मेरा दाखिला देश के सबसे नामी कॉलेज में आसानी से हो गया। बस उस दिन से फिजूल में शक करना छोड़ दिया।  

दुविधा ही है कि शक करना चाहिए या नहीं? हालांकि माना जाता है कि शक बीमारी है, विकृति है। शक नकारात्मक सोच में जकड़ता है। दूसरों पर शक करने से अपनी तबाही होती है। सद‍्गुरु जग्गी वासुदेव शक और संदेह में फ़र्क समझाते हैं, ‘शक का अर्थ है कि तुमने फलां विषय पर निष्कर्ष निकाल रखा है। जबकि संदेह का मायने हैं कि तुम ढूंढ़ रहे हो, सच जानते नहीं हो। यह बेहतर अवस्था है, जिसमें तुम निरंतर ढूंढ़ रहे हो।’ उधर विचारक ओलिवर वेनडेल कहते हैं कि जब-जब संदेह हो, स्वयं करके या आजमा कर संशय दूर करो। या कहें कि संदेह करने में कोई हर्ज नहीं है। संदेह पूर्णविराम कतई नहीं है। यह विश्वास रूपी नए और अगले वाक्य की शुरुआत है क्योंकि संदेह दूर होते ही विश्वास जम जाता है। 

इनसान सदा सकारात्मक वस्तुओं को संदेह की निगाह से देखता है। मिसाल के तौर पर, अगर कोई सुनार से कहे कि मेरा सोना खरा है तो सुनार तसल्ली करने के लिए कसौटी पर कसने लगेगा। जबकि अगर कोई कहे कि मेरा सोना खोटा है तो वह झटपट मान लेगा। सयाने कहते हैं कि कुदरत के फ़ैसले पर कभी शक नहीं करना चाहिए। अगर सजा मिल रही है तो गुनाह तो किया होगा। हमेशा शक इनसान को पीड़ा देता है-कभी चाह और भय का भ्रम, कभी संस्कार और विचार का भ्रम, तो कभी रिश्तों का। शक दूसरों के प्रति नकारात्मक विचार है, भाव है। इसके ताप से सामने वाले के विचार भी नकारात्मक होते जाते हैं। जिससे आपका ही दोहरा नुकसान है। एक, आप नकारात्मक सोच और फिर तनाव में बंधते हैं और दूसरा, सामने वाला भी आपका हितैषी नहीं रहता।       

एक राजा बहुत बीमार हो गया। वैद्यों-हकीमों ने जवाब दे दिया। इसकी भनक एक सेठ को लग गई। उसने सोचा कि राजा के मरने पर प्रजा को चंदन की लकड़ी की आवश्यकता होगी। उसने ढेर सारा चंदन खरीद कर अपनी दुकान में भर लिया ताकि चंदन बिकेगा और उसे फ़ायदा होगा। सौभाग्य से कुछ दिनों में राजा निरोग हो गया। तब सेठ मन में सोचने लगा कि राजा मरे तो मेरा चंदन बिके। एक दिन राजा भ्रमण पर निकला। सेठ का मकान देख मंत्री से जानना चाहा कि यह मकान कितना ऊंचा है। कहीं आसपास के मकानों पर गिर कर जानमाल की हानि न कर दे? इसलिए इसे गिरवा दो। मंत्री सोचने लगा कि राजा के मन में ऐसा विपरीत विचार क्यों आया?            

अगले दिन मंत्री ने सेठ को बुलाकर पूछा कि सत्य कहो, तुम्हारे मन में राजा के प्रति कैसे भाव उमड़ते रहें हैं। सेठ ने अपने मन के सारे विचार सच-सच बता दिए और यह भी कि क्यों? तब मंत्री ने कहा कि मकान गिराने के हुक्म के पीछे तेरा विचार ही कारण है। फिर बोला-तुम अपना चंदन मुझे बेच दो और उसकी पूरी क़ीमत से ले लो। इसके बाद राजा के बारे में चंगा ही सोचना। उस दिन के बाद से सेठ राजा के हित की कामना करने लगा। कुछ दिन बाद राजा फिर भ्रमण पर निकला तो सेठ का मकान देख मंत्री से बोला-इसे मत गिरवाना, क्योंकि खासा ऊंचा होने के चलते शहर की शान है।     

समझदार व्यक्ति कम से कम दैनिक मामलों में अपने आसपास के लोगों पर विश्वास करता है। किसी को अविश्वास की नज़र से देखना मन की हिंसा ही है। तय है कि पुलिस और जासूस संदेह का सहारा लेकर ही विश्वास पर उतरते हैं। सुनार पुराने सोने को पहले संदेह के दायरे में लाते हैं, फिर कसौटी पर कस कर खरे-खोटे की पहचान करते हैं। संदेह के रास्ते से गुज़र कर ही किसी का पूरा विश्वास जमा सकते हैं। वरना विश्वास अंधविश्वास में तबदील हो जाएगा। जहां संदेह खत्म होता है वहां विश्वास शुरू होता है। संदेह के बग़ैर इनसान विश्वास के साथ आगे नहीं बढ़ सकता। ज़ाहिर है कि संदेह खरी कसौटी है, ज़ोरदार औज़ार है, बखूबी विश्वास तक पहुंचने का। 

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