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प्रगतिशील दृष्टि से देखें फिल्मों में अभिव्यक्ति

आहत मन और आफत

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लीक से हटकर जो किताबें और फिल्में होती हैं, वे हमारे चेतना-तंतुओं को झकझोरने का काम करती हैं। ऐसी किताबें और फिल्में अनेक तरह के सवाल तो उठाती ही हैं, कई पारम्परिक धारणाओं को भी तोड़ती हैं।

क्या हमारे समाज में जाति और धर्म के नाम पर असहिष्णुता और बढ़ रही है? क्या इस दौर में जाति और धर्म के नाम पर लोगों की भावनाएं कुछ ज्यादा ही आहत नहीं होने लगी हैं? ताजा मामला है ‘घूसखोर पंडत’ फिल्म का। हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट ने इस फिल्म का टाइटल बदलने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने विवेक से यह फैसला दिया है। इसलिए इस फैसले पर कोई सवाल नहीं है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अलग इस मुद्दे पर कई सवाल खड़े होते हैं। एक फिल्म का टाइटल यदि किसी समाज की भावनाएं आहत कर दे तो यह सवाल तो उठेगा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी क्या हम एक प्रगतिशील समाज बना पाए हैं?

एक काल्पनिक फिल्म और काल्पनिक किरदार यदि किसी समाज की भावनाएं आहत करने की हिम्मत रखता है तो यह सवाल भी उठेगा कि क्या हमारी भावनाएं भी तो काल्पनिक नहीं हो गई हैं। यह केवल ब्राह्मण समाज का मामला नहीं है। आए दिन किसी न किसी मुद्दे पर किसी जाति या किसी धर्म के लोगों की भावनाएं आहत होती रहती हैं। बहरहाल, अब इस फिल्म का टीजर और उससे जुड़ी सभी प्रमोशनल सामग्री नेटफ्लिक्स इंडिया के सोशल मीडिया अकाउंट और यूट्यूब से हटा ली गई हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में सूचना और प्रसारण मंत्रालय को नोटिस जारी कर दिया है। आयोग ने कहा है कि इस तरह के टाइटल और फिल्म सामग्री से न केवल समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ सकता है, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था को भी खतरा हो सकता है।

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हमारे देश में विभिन्न जातियों और धर्मों के लोग रहते हैं। सभी जातियों और धर्मों के लोगों ने इस देश के विकास में अपना योगदान दिया है। जिस तरह अन्य जातियों और समाज के लोगों ने देश में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है उसी तरह ब्राह्मण समाज के लोगों के योगदान को भी भूला नहीं जा सकता। इस फिल्म के टाइटल ‘घूसखोर पंडत’ पर कई लोगों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि ‘पंडित’ शब्द आम तौर पर ब्राह्मण समाज और धार्मिक विद्वानों से जुड़ा होता है लेकिन इसके साथ घूसखोर शब्द जोड़ना गलत है। लोगों का मानना है कि इसमें ब्राह्मण समाज को गलत तरीके से दिखाया है।

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सवाल यह है कि अगर फिल्म में किसी एक जाति या समाज से जुड़ा कोई इंसान घूसखोर है और उसे घूसखोर या भ्रष्टाचारी दिखाया गया है और इसका टाइटल भी घूसखोर रखा गया है तो इससे उस पूरी जाति या समाज का अपमान कैसे हो गया? यदि एक चरित्र को उसकी जाति से जोड़कर घूसखोर लिखा गया है तो यह उस चरित्र के बारे में हैं न कि उस पूरे समाज के बारे में है। सवाल यह है कि इसे जानबूझकर एक जाति या समाज से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है। इस दौर में हमारी भावनाएं इतनी जल्दी क्यों आहत होने लगती हैं? निश्चित रूप से यह समाज लगातार प्रगति की ओर अग्रसर है लेकिन क्या एक पढ़े-लिखे समाज में हमारी मानसिकता भी बड़ी नहीं होनी चाहिए? क्या संकुचित मानसिकता से वास्तव में हम प्रगतिशील समाज के दायरे में आ पाएंगे? इस दौर में क्या हमारी समझ छोटी हो गई है या फिर हम जानबूझकर समझना नहीं चाहते हैं? कभी कोई किताब हमारी भावनाएं आहत कर देती है तो कभी कोई फिल्म हमारा अपमान कर देती है। क्या वास्तव में हम 21वीं सदी का समाज कहलाने लायक हैं?

हर जाति और धर्म में अच्छे और बुरे लोग होते हैं। अगर अच्छाई और बुराई को हम किसी एक जाति या धर्म से जोड़कर देखने लगेंगे तो बहुत सारी समस्याएं पैदा हो जाएंगी। भ्रष्टाचार करने वाला इंसान किसी भी जाति या धर्म में हो सकता है। अगर किसी जाति या समाज का एक या कुछ इंसान भ्रष्टाचारी हैं तो इस आधार पर वह पूरा समाज भ्रष्टाचारी नहीं हो सकता। दरअसल, इस दौर में शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ। यह समाज पहले से अधिक पढ़ा-लिखा और प्रगतिशील है।

नि:संदेह, प्रगतिशील दौर में जाति कमजोर होनी चाहिए थी लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस दौर में जाति और मजबूत हो गई है। जाति आधारित संगठन भी मजबूत हो रहे हैं। यही कारण है कि हर जाति अपने अपमान की बात करने लगी है। हमें यह समझना होगा कि किसी एक क्रियाकलाप से भला पूरी जाति का अपमान कैसे हो सकता है। इस दौर में भी मजबूत होती जाति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाज में वैमनस्य पैदा कर रही है। आए दिन कहीं न कहीं जाति के अपमान के मुद्दे पर हंगामा होता रहता है। सवाल यह है कि क्या एक पढ़े-लिखे समाज में इस तरह की मानसिकता उचित है? निश्चित रूप से एक पढ़े-लिखे समाज से इस तरह के व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती।

आलोचना होती है, भारतीय समाज अभी तक भी किताबों को पढ़ने और फिल्मों को देखने की प्रगतिशील सोच की समझ विकसित नहीं कर पाया है। लीक से हटकर जो किताबें और फिल्में होती हैं, वे हमारे चेतना-तंतुओं को झकझोरने का काम करती हैं। ऐसी किताबें और फिल्में अनेक तरह के सवाल तो उठाती ही हैं, कई पारम्परिक धारणाओं को भी तोड़ती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हम अपने अंदर झांकने के बजाय ऐसी किताबों और फिल्मों को ही कठघरे में खड़ा करने लगते हैं। यही कारण है कि भावनाएं आहत होने के नाम पर या फिर समाज का अपमान होने के नाम पर किताबों और फिल्मों पर रोक लगाने की मांग अक्सर उठती रहती है। इस दौर में हमारे समाज में जाति और धर्म के नाम पर जिस तरह की नफरत फैलाई जा रही है, वह हमें अंधकार में धकेल रही है। अपनी मानसिकता को बदलकर ही भारतीय समाज इस अंधकार को दूर कर सकता है।

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