उम्मीदों की आंकड़ेबाजी से उपजी कोताही

उम्मीदों की आंकड़ेबाजी से उपजी कोताही

दिनेश सी. शर्मा

कोविड-19 वैश्विक महामारी को फैले अब 6 महीने हो चुके हैं। भारत में तस्दीकशुदा 55 लाख मामले दर्ज हुए हैं और सक्रिय केसों की गिनती 10 लाख को छू गई है। इससे वैश्विक सूची में भारत दूसरा सबसे ज्यादा प्रभावित मुल्क बन गया है। मौतों के आंकड़ों के मुताबिक भारत का स्थान तीसरा है। देश में वायरस के फैलाव को रोकने और स्वास्थ्य तंत्र को तैयार करने के मकसद से लॉकडाउन लगाना पड़ा था। संक्रमण-कड़ी तोड़ने के लिए लोगों को व्यावहारिक रूप से मास्क पहनने, शारीरिक दूरी बनाने और हाथों को लगातार धोते रहने के निर्देश दिए गए हैं। पिछले कुछ हफ्तों में हमने देखा है कि आर्थिक, व्यापारिक, हवाई यात्रा, रेल एवं जन-परिवहन समेत अन्य गतिविधियां फिर से शुरू करने को धीरे-धीरे लॉकडाउन में ढील दी गई है।

संक्रमण की रोकथाम में सबसे कारगर मुख्य हथियार मास्क और हाथों को धोना ही है। जैसे-जैसे आर्थिक गतिविधियां पुनः शुरू हो गई हैं और लॉकडाउन की बंदिशों को उठाया जा रहा है तो हमें सड़कों, पार्कों और अन्य सार्वजनिक जगहों पर फिर से बड़ी संख्या में लोग दिखाई दे रहे हैं लेकिन उनमें काफी ऐसे भी हैं जो सही ढंग से मास्क नहीं पहनते। दिल्ली में पिछले तीन महीनों में पुलिस ने दिशा-निर्देश का पालन न करने वाले 2.6 लाख लोगों को जुर्माना लगाया है, इनमें अकेले मास्क न पहनने वालों की संख्या 2.3 लाख थी। अन्य शहरों में भी मास्क न पहनने वालों की खासी सूचनाएं हैं। लोग बैंक कांउटरों, दुकानों और सड़क किनारे खोखों पर पहले की भांति साथ-साथ खड़े होकर जमावड़ा बना रहे हैं। यह दृश्यावली लॉकडाउन के आरंभिक हफ्तों में बने अनुशासन से भिन्न है जब लोग सतर्क होकर स्वतः स्फूर्त पालन कर रहे थे।

यह लक्षण है ‘व्यवहार बदलाव करने में आई उदासीनता’ का या इसे ‘पालन-अरुचि’ भी कह सकते हैं। आसान शब्दों में कहें तो ‘व्यवहार बदलने में आई उदासीनता’ बताती है कि लोगबाग नए आदेशों का पालन करने में थकने लगे हैं। आखिरकार घर से बाहर हमेशा अपना मुंह ढांपकर रखना या फिर दोस्तों से हाथ न मिलाने की आदत डालना इतना आसान भी नहीं है। चूंकि इस किस्म से लादे गए बदलाव स्थाई नहीं हो सकते, इसीलिए पुराने ढर्रे पर लौट आए लोग देखने को मिल रहे हैं। ‘पालन-अरुचि’ का अन्य कारण बदलावों को लेकर बनी अनिश्चितता है। यह दो स्तरों पर है-एक, यह सब कब तक चलेगा, जो आगे वैश्विक महामारी की मियाद को लेकर बनी असमंजसता से जुड़ा है, दूसरा स्तर है, मुंह को ढांपकर रखना और हाथ धोते रहने का उपाय वास्तव में है कितना प्रभावी?

मानवीय स्वभाव और इसमें बदलाव, किसी खास विषय को लेकर बनी धारणा से संचालित होता है, मौजूदा मामले में यह वैश्विक महामारी की वजह से बनी मानसिकता है। धारणा आगे विभिन्न स्रोतों के जरिए लोगों को मिली जानकारी से आकृति लेती है-मसलन सरकार, मीडिया, मित्रमंडली इत्यादि से प्राप्त सूचनाएं। अगर लोगों को लगता है कि नवीन कोरोना वायरस एक सहन करने योग्य जोखिम है तो वे अपने पुराने व्यवहार पर वापस लौट जाएंगे। अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर मास्क नहीं पहनता है तो इसका मतलब है कि उसे यकीन है कि न तो खुद को कोई खतरा है और न ही वह दूसरों के लिए खतरनाक है। उसकी यह धारणा कुछेक स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं पर आधारित हो सकती है। मसलन टेलीविजन, व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया मंच, अखबारी खबरें या यूट्यूब अथवा सबको मिलाजुलाकर बनी कच्ची-पक्की जानकारी। इसीलिए कोविड-19 से संबंधित प्रमाणित सूचनाएं और खबरें, सावधानियां, उपचार के तरीके, रोकथाम इत्यादि की जानकारी बहुत महत्व रखती है। इस तरह इकट्ठी हुई सूचनाओं पर यकीन कर लोगबाग खुद को संक्रमण होने की संभावना का गुणा-भाग स्वयं करने लगते हैं और अपना व्यवहार उस मुताबिक ढाल लेते हैं। यही समस्या की जड़ है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, आईसीएमआर और अन्य आधिकारिक एजेंसियों द्वारा जारी विज्ञप्तियां लगातार भारत पर वैश्विक महामारी से हुए वास्तविक असर को घटाकर पेश रहे हैं, गढ़कर बनाए और ‘मन को झूठी तसल्ली’ देने वाले आंकड़ों पर बेजा जोर दिया जा रहा है और यह काम निरंतर हो रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा पत्रकार वार्ता में प्रवक्ता ने निम्न बिंदुओं पर जोर देते हुए कहा : ‘अभी तक देश में 5 करोड़ से ज्यादा कोविड टेस्ट किए गए हैं, 44 लाख मरीज ठीक हुए हैं, मृत्यु दर लगातार घट रही है जो वैश्विक दर 3.28% के मुकाबले 1.6% है।’ यह दावा उस दिन किया गया जब भारत दुनिया में संक्रमित लोगों की सूची में दूसरे स्थान पर पहुंचा था। उसके बाद से हर दिन नए मामले नाटकीय ढंग से बढ़ते जा रहे हैं। मंत्रालय ने यह भी जोरशोर से बताया था कि भारत में प्रति दस लाख पर मृत्यु दर केवल 53 है जो वैश्विक स्तर पर 115 मौतें प्रति दस लाख वाले अनुपात से कहीं कम है। यह भी कहा कि प्रति दस लाख व्यक्तियों पर दर्ज हुए 3102 केस दर के साथ विश्वभर में सबसे कम गिनती वालों में एक है। इसके अलावा भारत के 14 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश ऐसे हैं जहां सक्रिय मामले 5000 से कम हैं।

चूंकि मंत्रालय की प्रेस वार्ता का टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर सीधा प्रसारण किया जाता है, इसलिए लोगों तक जानकारियां सीधे पहुंच जाती हैं। अब आम लोग गहन तकनीकी शब्दावली मसलन सीएफआर या प्रति व्यक्ति अनुपात को क्या जानें। लेकिन उन तक मोटा-मोटा संदेश पहुंच जाता है ः ‘भारत अन्य देशों के मुकाबले काफी बेहतर कर रहा है’, इसे आधार बनाकर वे अपना व्यवहार उसके मुताबिक करने लगते हैं।

ठीक हुए लोगों की गिनती, टेस्ट संख्या और मृत्यु दर बताकर ‘मन को तसल्ली’ देने वाले आंकड़ों से की जाने वाली आधिकारिक जादूगरी के अलावा सोशल मीडिया के जरिए लोगों में यह संदेश प्रसारित किया जाता है कि कोविड-19 की वैक्सीन (रोगप्रतिरोधक दवा) बस आने वाली है। मौजूदा समय में विश्वभर में प्रतिरोधक दवा बनाने के 200 से ज्यादा यत्न चल रहे हैं। उनमें प्रत्येक को मिली मामूली सी सफलता को भी बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया जा रहा है, यह सब किसी दवा को विकसित करने से जुड़े अन्य पहलुओं जैसे कि क्लिनिकल टेस्टिंग, व्यावसायिक उत्पादन क्षमता, वितरण, टीकाकरण व्यवस्था और बाद में क्या करना होगा इत्यादि पर विचार किए बिना किया जा रहा है। खबरिया चैनल यूं प्रचारित रहे हैं मानो प्रतिरोधात्मक दवा बनना ही महामारी से निपटने का एकमात्र निदान है। इस किस्म की गलत अवधारणा और मन को तसल्ली देने की खातिर सरकारी एजेंसियों द्वारा की गई घोषणाएं न केवल नयी किस्म की व्यवहार संबंधी महामारी पैदा कर रही हैं बल्कि पालन-अरुचि भी पैदा कर रही हैं। हमें इन हरकतों को बूझने की जरूरत है और कोविड-19 उन्मूलन की बाबत आने वाली सूचनाएं, रणनीति और संदेशों को पहले सत्यापन के बाद ही मानने की सख्त जरूरत है। इससे जानें बचाई जा सकती हैं।

लेखक स्वास्थ्य संबंधी विषयों के टिप्पणीकार हैं।

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

ज़रूर पढ़ें

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके द्वंद्व

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके द्वंद्व

भाषा की कसौटी पर न हो संवेदना की परख

भाषा की कसौटी पर न हो संवेदना की परख