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विवाह के मौसम में उत्साहित बाराती और तुषारापात

तिरछी नज़र

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जिस तरह सज-धज कर दूल्हा राजा घोड़ी पे होके सवार कमरिया में बांधे तलवार, बाजे-गाजे और मय लाव-लश्कर चलता है, निस्संदेह ये सब राजाओं

वाले काम हैं।

एक बार फिर विवाह का मौसम आ गया। बिगड़ते पर्यावरण के कारण देश में बाकी मौसम आए न आए, बारातों के मौसम बारहों महीने आते रहते हैं बल्कि बने ही रहते हैं। इन दिनों जिधर देखो दूल्हे दिखाई दे रहे हैं। दुल्हनें भी। ‘राजा, दूल्हा हो जरूरी नहीं लेकिन दूल्हा राजा होता है, यह आप भी जानते हैं। राजा बनने के लालच में बच्चे क्या, बूढ़े भी खुशी-खुशी दूल्हे बनने को राजी हो जाते हैं, जवानों को तो खैर बनना ही होता है। न बनें तो उनकी जवानी किस काम की! जवानी में बाल और बुढ़ापे में दांत कई बार बनते रिश्ते बिगाड़ देते हैं। समाज ने दूल्हे को राजा की संज्ञा दी है। सही भी है क्योंकि जिस तरह सज-धज कर दूल्हा घोड़ी पे होके सवार कमरिया में बांधे तलवार, बाजे-गाजे और मय लाव-लश्कर चलता है, सैकड़ों लोगों को दावत देता है, नाचने-गाने वालों पर पैसे उड़ाता है, निस्संदेह ये सब राजाओं वाले काम हैं।

वैसे तो हर दूल्हा राजा ही होता है लेकिन गर सचमुच का राजा दूल्हा बनें तब तो कहने ही क्या! यह अखबार में खबर छपवाने और बाजार में पोस्टर लगवाने जैसा है। ...तो हुआ यूं कि गांव के राजा माने मुखिया जी का बेटा बनवारी लाल दूल्हा बना। फिर क्या था, सारा गांव वैवाहिक रंग में रंग गया। सबकी एक ही इच्छा, किसी तरह इस बहुप्रतीक्षित ब्याह के बाराती होने का सौभाग्य मिल जाए।

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कुछ ‘स्वागत प्रेमी’ टाइप लोग बारात जाने को इसलिए उत्सुक थे कि बड़े की बारात में जाओ तो अव्वल दर्जे का स्वागत-सत्कार होता है। कुछ ‘यात्रा प्रेमी’ इसलिए बारात जाना चाह रहे थे कि लक्जरी गाड़ियों में सफर और सेल्फी का आनंद लेंगे। ‘चाय-पान और यात्रा मुफ्त करने को मिलें तो ज्यादा मजा देती है।’ कुछ ‘नृत्य प्रेमी’ बड़े-बड़े डीजे और ढोल, देख बारात जाने का मन बना रहे थे। बारात जाने की इच्छा रखने वालों में एक धड़ा ‘दर्शन प्रेमियों’ का था, जो शाही शादी में भांति-भांति के नजारों के नयन-सुख की इच्छा के वशीभूत हो, कपड़ों पर डबल इस्त्री मार रहे थे।

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आखिर बारात वाला दिन भी आ गया। गांव चारों ओर से कारों से घिर गया। घर-घर से बराती तैयार हो गए। जात-परजात, अमीर-गरीब, बच्चे-बूढ़े। मुखिया जी ने विचारा इस तरह से बारात ले गए तब तो मेला लग जायेगा। सामने वाले ‘घरभरे’ हैं तो क्या हुआ! समधी जी की भी अपनी सीमाएं हैं। उन्होंने ताबड़तोड़ पर्चे छपवाए। लिखा स्वागत-सत्कार, घूमना-फिरना, नाच-गाना, देखना-परखना... सब कुछ रहेगा, ‘नोट : बारात में खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं रहेगी।’ गाड़ियों में आगे दूल्हे ने ‘रब ने बना दी जोड़ी’ तो पीछे पिताजी ने नोट वाले पर्चे लगवाए।

...फिर क्या था जो पर्चा पढ़कर गया वापस ही नहीं लौटा।

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